Thursday, November 18, 2021

ढाई आखर

कुंदन कुमार

समय किसी के इंतजार में नहीं रुकता। भावनाओं को भी समय के सांचे में ढालना पड़ता है। यह शाश्वत सत्य है कि जिंदगी बहुत छोटी है। आज हम हैं, कल यादों में होंगे, कौन देख आया है? एक हादसा हमारे वर्तमान को अतीत बनाने के लिए काफी है। वर्तमान जब अतीत बन जाए, तब हम यादों के सहारे जीते हैं।

यादें एक ऐसी दवा हैं, जिसकी नियमित खुराक से जिंदगी सदाबहार रहती है। हमारे जीवन में बहुत लोग आते-जाते हैं। कुछ लोग अपने व्यवहार और कर्म से अपने जीवन में उस मुकाम तक पहुंच जाते हैं कि दुनिया छोड़ने के बाद भी लोग उनके व्यवहार की प्रशंसा करते नहीं थकते और उनके जाने के बाद भी वे लोगों के प्रेरणास्रोत बने रहते हैं।

कुछ तो ऐसे लोग होते हैं, जो हमारे जीवन को व्यापक स्तर पर प्रभावित करते हैं। सबकी लालसा होती है कि उसे ऐसा साथी नसीब हो जो जीवन के संघर्षों में साथ दें, जो धूप-छांव की भांति गम और खुशी में साथ हो। कुछ की आंकाक्षाएं पूरी होती हैं तो कुछ बेहतर जीवन साथी के इतंजार में ताउम्र अकेलेपन में गुजार देते हैं।

जीवन में प्रेम पाने की चाहत सबको होती है। प्रेम जीवन के हर मर्ज की सस्ती दवा है। लोगों की मान्यता कि प्रेम करने वाले दीवानों को असहनीय दर्द का सामना करना है। यह सच है कि प्रेम का दीपक किसी व्यक्ति के जीवन के अंधियारे को खत्म कर उस व्यक्ति को सफलता तक पहुंचाता है। प्रेम का पुजारी जीवन के संघर्षों के कठोर पथ में भी प्रेम का गुणगान करते आगे बढ़ता जाता है और एक स्तर पर वह खुद के लिए अजनबी हो जाता है।

प्रेम का पथिक यों कभी अवसादग्रस्त नहीं होता, लेकिन ऐसा कहीं सुनने या देखने को मिलता है तो यह समझ लेना चाहिए कि प्रेम स्वार्थ के बंधनों से जकड़ा हुआ था और स्वार्थ की पूर्ति न होने से प्रेम का स्वांग रचने वाला व्यक्ति अवसादग्रस्त हो जाता है। बहुतेरे ऐसे गीत, गजल, कविता, शायरी लेखकों के द्वारा रचे गए हैं, जो प्रेम में धोखा खाए प्रेमी-प्रेमिकाओं के दर्द को बयां करते हैं।

प्रेम संवेदना की ही एक अभिव्यक्ति है, लेकिन इसके स्वरूप और इसकी प्रकृति को परिभाषित करना आसान कभी नहीं रहा। विद्वानों ने इसे देश, काल, परिस्थिति के हिसाब से परिभाषित किया है। किसी ने प्रेम को ज्ञान का द्योतक माना तो किसी के लिए प्रेम शांति, अहिंसा और सत्य रुपी अस्त्र बना। मीरा,कबीर और रविदास जैसे विद्वानों ने प्रेम की एक खास ज्योति जलाई। हमारे समाज में लोक मान्यताओं, किस्सों और कहानियों में भी प्रेम की महिमा का गुणगान सर्वत्र कहने-सुनने को मिलता है। प्रेम की महत्ता का गुणगान गाते हुए कबीर कहते हैं कि ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढा़ई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होए।’ यानी कबीर का मानना था कि प्रेम या प्यार का ढाई अक्षर ही वास्तविक रूप से पढ़ लें तो वह सच्चा ज्ञानी हो सकता है।

दरअसल, करुणा, दया और अहिंसा प्रेम के ही अंग हैं। प्रेम के पथ पर चलने वाला पथिक कभी दुराचारी, अन्यायी, हत्यारा नहीं हो सकता। वर्तमान परिदृश्य में भौतिकता ने प्रेम के स्वरूप को भी परिवर्तित कर दिया है। वर्तमान समय में प्रेम के मायने बदल गए हैं। अब प्रेम सांसारिक सुखों को भोगने तक सीमित हो गया है। आजकल के लड़के-लड़कियों का अक्सर दिल टूटता है, जिससे उनका व्यवहार परिवर्तित हो जाता है। वे निराशा के भंवर में इस कदर डूब जाते हैं कि निराशा के चलते उत्पन्न अवसाद उन्हें अपना ग्रास बना लेती है। दरअसल, जब कोई किसी को टूटकर प्यार करता है, उसका खयाल रखता है, उसके सुख-दुख में साथ होता है तो लगता है कि वह जीवन के संघर्ष में वह पराजित नहीं होगा। जैसे ही एकाएक उसका साथी साथ छोड़ देता है, तब ऐसा महसूस होता है कि उसकी जिंदगी ही खत्म हो गई।

प्रेम के विरह में प्रेमियों की हालत उस सांप की तरह होती है, जिसका मणि उससे छीन लिया गया हो। प्रेम अगर निस्वार्थ हो तो कभी साथ नहीं छोड़ता। निस्वार्थ प्रेम भरोसा और विश्वास की कसौटी पर हमेशा खड़ा उतरता है। स्वार्थ के वशीभूत धन, सुंदरता या ज्ञान के आकर्षण में पड़ कर किसी को चाहना प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम स्वार्थ के बंधनों से सर्वथा मुक्त होता है। जहां स्वार्थ है वहां प्रेम कदापि नहीं हो सकता।

प्रेम रूप, रंग, उम्र, धर्म, जाति, संप्रदाय आदि बंधनों से भी मुक्त होता है। जो किसी से प्रेम करता है, वह उसे जीवन के बुरे वक्त में कभी अकेला नहीं छोड़ता, भले ही वक्त के साथ हम सभी चीजों को बिसरा कर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन हमें अपने जीवन का बुरा वक्त भुलाए नहीं भूलता। प्रेम कभी परिणाम से भयभीत नहीं होता। इसके वास्तविक पथिक तमाम बाधाओं से दो-दो हाथ करते हुए दुनिया से बेखबर समय के साथ गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। यहां तक कि उन्हें किसी के साथ चलने या छोड़ देने का भी फर्क नहीं पड़ता। प्रेम के अनुयायी हमेशा अपने जीवन में प्रेम ही बांटेंगे।

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From: Jansatta

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