Saturday, November 6, 2021

लोकतंत्र से भयभीत लोकतंत्र

सोशल मीडिया पूरी तरह से आजाद था। अब उसकी आजादी नियंत्रित है, क्योंकि कई सरकारों और गणमान्य विशेषज्ञों का कहना था कि आजादी बेलगाम हो गई थी, जिसकी वजह से वैश्विक समुदाय से लेकर स्थानीय गुटों तक पर कुछ अवांछनीय तत्त्व हावी हो गए थे। वे सोशल मीडिया का उपयोग अपने हानिकारक क्रियाकलापों को विस्तार देने के लिए कर रहे थे। आतंकवाद से लेकर अश्लील चीजें सोशल मीडिया पर चलने लगी थीं। इनसे समाज को गहरा खतरा पैदा हो गया था।

समाज सुधार या लोक कल्याण हम सब की साझी जिम्मेदारी है, पर सरकार खासतौर पर तब सक्रिय हो जाती है जब सोशल मीडिया पर उसके कारनामों पर तरह-तरह की टिप्पणी होने लगती है। ऐसे में आजादी को घेरे में लेना उसके लिए जरूरी हो जाता है। प्रभावशाली लोग मानते हैं कि आजाद खयाली बंद मुठ्ठी में मचले-खेले तो अच्छा है। उसको हथेली से बाहर नहीं फुदकना चाहिए।

वैसे सोशल मीडिया काफी अल्ट्रा सोशल है। अगर उस पर पचास तरह के लोग हैं, तो उनकी पचपन राय हैं। एक व्यक्ति एक राय वाला सिद्धांत यहां लागू नहीं होता है, जैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक व्यक्ति, एक वोट वाला सिद्धांत लागू होता है। ट्वीटर या फेसबुक के पोलिंग बूथ में कोई व्यक्ति कभी यह बटन दबाता है तो कभी कोई दूसरे बटन पर अंगुली मार देता है। उसका मत कभी इधर तो कभी उधर जाता रहता है। कभी कभी तो सिर्फ मजा लेने के लिए कोई फेसबुकिया मशीन के सारे बटन दबा डालता है।

सोशल मीडिया की आजादी मजे लेने के लिए नहीं है। सोशल मीडिया एक बेहद गंभीर मुद्दा है, जिस पर हमारे विचरण की वजह से सरकारें और प्रभावशाली व्यक्ति असुरक्षित हो जाते हैं। थोड़ी-सी भी आलोचना से उनको अपने अस्तित्व पर शक हो जाता है। वे विचलित हो जाते हैं। सोशल मीडिया किसी को विचलित करने के लिए नहीं बना था। वह हां में हां मिलाने, अच्छी-अच्छी बातें करने के लिए भी नहीं बना था।

सैद्धांतिक सवालों पर चर्चा के लिए पहले काफी हाउस होते थे। वहां पर की गई चर्चा पांच दस लोगों के बीच रहती है, सोशल मीडिया की तरह तुरंत हर तरफ नहीं फैल जाती हैं। काफी हाउस और उसमें बैठे व्यथित बुद्धिजीवी ठीक थे। दोनों हमारी वैचारिक परंपरा का अटूट हिस्सा थे। जब गांव के पीपल की छांव में हुक्का गुड़गुड़ाते बुद्धिजीवी शहर में आकर काफी हाउस में बैठने लगे थे, तो कोई खास परेशानी की बात नहीं थी।

मुठ्ठी भर लोग थे। उनकी कोई पहुंच नहीं थी। वे बड़े से तवे पर कटोरी भर डोसे का पेस्ट थे। सोशल मीडिया ने कटोरी घुमा कर विशालकाय डोसा बना दिया है, जो थाली के बाहर फैल गया है और कड़क भी हो गया है। एक जंबो डोसा कइयों पर भारी पड़ रहा है। उसको अकेले निपटाना टेढ़ी खीर हो गया है। और तो और, सोशल मीडिया की कटोरी साधारण से विशिष्ट पर एक तरह से चलती है। सबको समानता से फैलाती है। सबकी कही सबको सुनाती है; हर से प्रतिक्रिया की गुहार करती है और फिर प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया लेकर नानी की चक्की की तरह दिन-रात जन मानस के अथाह महासागर को नमकीन करती है।

सबके चावल पीस कर सोशल मीडिया ने सामाजिक-राजनीतिक दर्शन का लोकतंत्रीकरण कर दिया है। हर सोशल मीडिया का उपभोक्ता ज्ञान का विशिष्ट उत्पादक बन गया है। उत्पादन इतना है कि मीडिया पर ज्ञान बांटने वाले असंख्य लंगर लग गए हैं। स्वयं निर्मित तथ्यों को घरेलू सम्मति के घी का छौंक लगा कर वे लंगर बांट रहे हैं।

वास्तव में, मानव इतिहास में औद्योगिक स्तर पर ज्ञान उत्पादन पहली बार हुआ है। समस्त ब्रहम ज्ञान ट्विटर के एक क्षण के बराबर है, ऐसा आज के महाज्ञानियों का कहना है। ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की वजह से लोकतंत्र को खतरा उत्पन्न हो गया है। दूसरे शब्दों में, लोकतंत्र ने लोकतंत्र को भयभीत कर दिया है। ट्वीटर ट्रेंड में जब लोक भाव उभरता है तो वह लोकतांत्रिक व्यवस्था को कालिया नाग की तरह लगता है, जिसका दहन होना जरूरी हो जाता है।

यह बड़ी विडंबना है कि लोक-व्यवस्था लोकतंत्र के लिए विष है। विष को कंठ में संग्रहित रखना, उसको शरीर में न फैलने देने की कुव्वत लोकतंत्र में नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि मात्रा से अधिक औषधि विष हो जाती है। सोशल मीडिया जनतंत्र की मात्रा से अधिक वाली औषधि है। पर मात्रा को कौन तय करेगा? जहां सरकार ट्रोल आर्मी चलाती हो, पर आम लोगों की राय से शत्रु भाव रखती हो, वहां पर आजाद सोशल मीडिया में सिर्फ डंका बजाओ मीडिया ही चल सकता है।

दूसरी ओर, सोशल मीडिया के मालिक उसको बाजार का गुलाम बना कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने पर उतारू हैं। उनके लिए हमारी उपयोगिता आंकड़े से अधिक नहीं है। ऐसे में कौन आजाद, कैसे आजाद और कितना आजाद यक्ष प्रश्न हैं। उत्तर न होने के वावजूद हमें एक आम नागरिक के रूप में आजादी की कस्तूरी ढूंढ़ते रहना है। कस्तूरी हमारे अंदर है, शायद हमें उसका बोध भी है, पर हम उसे तलाशते हैं, क्योंकि हमें उसे प्रत्यक्ष देखने की लालसा है। यह लालसा कुछ हद तक पूरी भी हुई है- विधान, कार्य और न्याय पालिका के जरिए- पर अभी और काम बाकी है।

सोशल मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का द्योतक है। बहुत-सी कमियां हैं उसमें, जिन पर जानकार लोग अपना उपदेश जरूर दे सकते हैं, पर इन उपदेशों को ग्रहण करके उन पर क्रिया करना हर व्यक्ति का अपना व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए। समाज में आम सम्मति धीरे-धीरे, प्राकृतिक रूप से बनती और आगे चल कर मर्यादाओं में परिवर्तित होती है। उसको शासनादेशों से धकेला नहीं जा सकता है।

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From: Jansatta

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