Tuesday, November 23, 2021

जीवन का नया नजरिया

मीना बुद्धिराजा

अपने बारे में हम जितनी धारणाएं और छवियां निर्मित करते हैं, वे वास्तव में हमारी अपनी व्यक्तिगत पहचान या स्वतंत्र अस्मिता नहीं हैं। ये अधिकतर दूसरों के प्रभाव, स्वार्थ, महत्त्वाकांक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा, सत्ता-सुविधा, प्रतिस्पर्धा, बाजार के दबाव आदि के माध्यम से हमें विवश करने की प्रक्रिया है। यह इतने गहरे स्तर पर समाज की संरचना में समाहित हो चुकी है कि इसी को सहज, स्वाभाविक मान कर इस छवि की मानसिक गुलामी के हम अभ्यस्त हो जाते हैं।

यह हमारी सचेतन और स्वतंत्र इच्छा नहीं होती, बल्कि पूरे समाज पर थोपी गई कृत्रिम व्यवस्था है, जो व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन का एक हिस्सा बन कर आती है। बाजार और उपभोग से प्रभावित अत्यंत तीव्र, संवेदनहीन और अंधाधुंध दौड़ में इस आरोपित पहचान को अनजाने में हम अपने साथ लेकर चलते हैं, जिसमें अपने अस्तित्व की वास्तविकता और उद्देश्य को समझ पाना बहुत कठिन हो जाता है।

उपभोग इस सदी की सभ्यता का सबसे बड़ा मूल्य है, जिसका कोई विकल्प अभी दिखाई नहीं दे रहा है। लेकिन इस उपभोगवादी व्यवस्था की चरम सीमा तक पहुंच कर अब मनुष्य को बहुत से कृत्रिम संसाधनों की नहीं, ठहर कर अपनी वास्तविक स्थिति को पहचानने की जरूरत है, आतंरिक और बाह्य जगत के सत्य पर विचार और अपने अनुभवों को समझने की आवश्यकता है। सूचना, विज्ञापन से आक्रांत और आभासी गति से बदलते क्षणिक बदलाव में रुक कर आत्मालोचन की भी कि अब अपने अस्तित्व की सार्थकता के लिए हमें क्या चाहिए। बाजार इसी सच का आवरण बन कर उस निर्मम यथार्थ को ढक देना चाहता है, जो जनसाधारण की नियति है, जो उसकी मूलभूत समस्याएं हैं।

इस यथार्थ को अनुभव करने के लिए किसी बाह्य माध्यम की नहीं, अपने विवेक की जरूरत है। उपभोक्ता प्रधान व्यवस्था की कुटिलता यही है कि वह पहले से उपस्थित स्मृति और मानवीय सत्य को नकार कर उस छद्म, कृत्रिम और जड़ सच्चाई को समाज को दिखाना चाहता है, जिसकी मनुष्य की चेतना को जरूरत है ही नहीं। भौतिकता की चकाचौंध से, असीमित महत्त्वाकांक्षाओं से अधिक अन्याय, शोषण और विषमता के प्रतिरोध में जागरूक तथा सामाजिक स्तर पर वैचारिक और बौद्धिक उपकरणों की आज के परिवेश में निस्संदेह कहीं ज्यादा उपादेयता सिद्ध हो सकती है।

विचारों के द्वंद्व की सक्रिय चेतना से ही मानवता का विकास होता है और बाजार की उपभोग आधारित व्यवस्था व्यक्ति की असहमति, लोकतांत्रिक सजग विवेक की धार को कुंठित कर उसे अपने और सत्ता के व्यावसायिक हितों के लिए प्रयोग करना चाहती है। व्यक्ति को वस्तु में रूपांतरित करने की इस प्रक्रिया में उसकी स्वतंत्र अस्मिता और निरपेक्ष अवधारणा को पूरी तरह अदृश्य कर दिया है, जो एक विचारशील समाज के बौद्धिक निर्माण में अपनी भूमिका निभाती है।

यही जीवन और यथार्थ के प्रति ठोस दृष्टिकोण का आधार होती है और मनुष्य के अस्तित्व की गरिमा को बाजार की आरोपित परिस्थितियों से, मानसिक पराधीनता से मुक्त करके समय के अंतर्विरोधों से, प्रतिकूलताओं से, चुनौतियों और संघर्ष का जीवंत सबंध स्थापित करके उसे विकसित करती है। यथार्थ और आदर्श का विराट अंतर्संघर्ष ही नए मूल्यों और विकल्पों की खोज करके स्वंतत्र तथा आत्मिक रूप से समृद्ध समाज का रास्ता दिखाता है। एक ऐसी विचारसंपन्न सामाजिक व्यवस्था, जिसकी विचारधारा संकीर्णता और स्वार्थ से मुक्त पूरी मानवता के लिए सार्थक सोच के साथ प्रतिबद्ध होकर उसका दायित्व ले सके।

यह मुक्त और संशय रहित दृष्टि जीवन को ऊपरी और सतही नजरिए से नहीं, बल्कि यथार्थ को, समस्याओं को गहरे और आंतरिक संपर्क के आधार पर देखती है। इसलिए वह बाजार और सत्ता द्वारा निर्धारित काल्पनिक और आरोपित सत्य को नहीं, अपने व्यावहारिक अनुभवों, चुनौतियों के धरातल पर उसका आकलन करती है, जो अधिक स्थायी और विश्वसनीय हैं। इस दृष्टिकोण में कोई भी विचार, व्यक्ति और विषय पूर्वनिर्धारित तरीके से नहीं, बल्कि लीक से हट कर अपना नया और सार्थक रास्ता बनाने में है, जो साधारण होते हुए भी असाधारण और मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।

इस विचार पद्धति में सिर्फ उपभोग ही लक्ष्य हो, जरूरी नहीं। सामूहिक मानवीय चेतना के कल्याण के लिए कुछ त्याग कर भी कोई नया विकल्प संभव हो सकता है, जो इस निर्मम, आत्मकेंद्रित समय में समाज को मानवीय संबंधों और संवेदनाओं को नई जीवनी शक्ति दे सकता है। इस उपलब्धि को किसी भौतिक सुविधा के प्रतिमानों पर, सफलता- विफलता की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। इस उन्मुक्त, विशाल दृष्टि के उच्चतम स्तर तक पहुंचने के लिए कुछ संकीर्ण और सीमित चीजों को छोड़ कर आगे बढ़ना ही किसी व्यक्ति के जीवन को उसके व्यापक आयामों के साथ समझने का नजरिया प्रदान करता है।

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From: Jansatta

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