Friday, November 26, 2021

कुदरत का मायाजाल

बदलते दौर में बहुत कुछ बदला और बदलते-बदलते आदमी भी बदल गया। अब सांसारिक पदार्थों में उलझे आदमी की आंखों में शर्म बमुश्किल नजर आती है। एक प्रकार से हम सब विसंगतियों के दौर में जी रहे हैं। मोमबत्ती को फूंक मारकर हम नए जीवन की ज्योत जलाना चाहते हैं। परिवार में हम सब एक साथ भी तभी रह पाते हैं, जब सेल्फी की प्रक्रिया को मूर्त रूप दिया जा रहा हो। इसके तत्काल बाद सब अपने-अपने में उलझ कर रह जाते हैं।

परिवार के मुखिया और कर्ताधर्ता को परिवार के जीवनयापन के लिए कोल्हू के बैल की तरह जुतना पड़ता है। लेकिन बेहिसाब खर्च करने वालों के खर्चे में कोई फर्क नहीं पड़ता। एक प्रकार से जमाने में बनावट का ताना-बाना बुनने में जिंदगी हाथ से निरंतर फिसलती जाती है, लेकिन दम भर को भी कभी कोई सुकून नहीं मिलता। जहां तक राजनीति की बात है, भरपूर दुहाई तो नीति और सिद्धांतों की दी जाती है, लेकिन इसे भी ताक से कभी-कभी ही उतारा जाता है। सत्ता की मदहोशी और सत्ता पाने की बेचैनी, राजनीति में किसी भी शख्सियत को चैन से नहीं बैठने देती।

अगर राजनीति में दावों और प्रतिदावों पर विश्वास किया जाए तो इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि बहुत विकास हो लिया। हकीकत यह है कि विकास एक अनवरत प्रक्रिया है। इसका कारण बड़ा साफ है कि तृष्णा का कहीं अंत नहीं है। जो जितना घर भर सकता हो, मौका मिलने पर उतना भर लेता है। बावजूद इसके कभी मन भरता नहीं। यही कारण है कि राजनीति में स्थापित शख्सियत जनता को वर्तमान हाल पर छोड़ कर भी अपनी आने वाली पीढ़ियों के इंतजाम में घुली जाती है। जब, जिसे, जहां और जैसे ही मौका मिलता है, उस मौके को भुना लिया जाता है।

दुनिया को दस्तूर की दृष्टि से दो भागों में बांटा जा सकता है। एक वर्ग होता है जो भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त होता है। दूसरा वर्ग वह होता है, जिसे कभी भ्रष्टाचार करने का कोई मौका न मिला हो। ऐसा भी नहीं है कि जमाने से हर कोई संतुष्ट है। दरअसल, जिसने जितना पा लिया, उसकी प्यास उतनी ही तीव्र गति से गुणोत्तर क्रम में बढ़ती चली जाती है। इस दृष्टि से दुनिया भर के रईस कंगाल नजर आते हैं। किसी जमाने में सिकंदर ने दुनिया को समझाया था कि देखो मैं खाली हाथ जा रहा हूं, लेकिन यह दो और दो चार जैसी आसान बात आज तक किसी के समझ में नहीं आई। जिनको समझ में आई उसे जमाने ने प्रचलन से ही बाहर कर दिया।

हालांकि जानते सब हैं कि यह संसार कुदरत का मायाजाल है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि कोई भी इस जाल से मुक्ति पाना नहीं चाहता। जिनको देखो, उनको सांसारिक पदार्थों के पीछे भागते देखा जा सकता है। हम इन्हें तिरछी नजर से देख नहीं सकते, तो कारण बड़ा साफ है कि इन्हें किसी की ‘नजर नहीं लगती’!
’राजेंद्र बज, देवास, मप्र

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From: Jansatta

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