अमेरिका के सबसे बड़े धान उत्पादक राज्य कैलिफोर्निया में 1990 के दशक में पराली जलाने से निकले धुएं ने जब लोगों की सेहत और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना शुरू किया था, तब वहां के प्रशासन ने पराली जलाने के मसले पर सख्त कदम उठाए थे। लेकिन जब ठोस कामयाबी नहीं मिली तब यह निर्णय लिया गया था कि पराली का इस्तेमाल बिजली संयंत्रों में बायोमास के रूप में किया जाएगा। इसके साथ पराली का उपयोग मिट्टी का क्षरण रोकने के लिए भी किया जाने लगा और सड़कों के किनारे पराली लगाई जाने लगी, ताकि मिट्टी सूख कर हवा के साथ न उड़े।
अमेरिका की आयोवा स्टेट विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डान हाफस्ट्रैंड के मुताबिक, हम जिस पराली को परेशानी समझ रहे हैं, वह ऊर्जा का बेशकीमती स्रोत है। धान, मक्का, गेहूं जैसी फसलों के अवशेष का इस्तेमाल फाइबर बोर्ड और कागज बनाने में किया जा सकता है। अगर कागज उद्योग में इसका इस्तेमाल हो तो कागज बनाने के लिए जरूरी फाइबर का लगभग चालीस फीसदी हिस्सा फसलों के अवशेष से मिल सकता है।
केंद्र और राज्य सरकारों को मिलजुल कर पराली संभालने के लिए प्रयास करने चाहिए। पंजाब सरकार ने पराली के प्रबंधन के लिए मशीनरी पर काफी सबसिडी दे रखी है, लेकिन इसे प्राप्त करने के लिए शायद किसानों को जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता होगा। शायद इसीलिए बहुत से किसान पराली प्रबंधन की मशीनरी हासिल करने के बजाय पराली को खेतों मे ही जला देते होंगे। सरकार को इस पर विचार गंभीरता से करना चाहिए। पराली की समस्या में ही इसका समाधान छिपा हुआ है। इसमें सबसे प्रचलित समाधान बायोमास संयंत्र भी है। पराली प्रदूषण के लिए निपटने के लिए कुछ लोग सलाह देते हैं कि किसानों को धान की जगह अन्य फसलें उगानी चाहिए, लेकिन वे भूल जाते हैं कि गेहूं के अवशेष भी जलाए जाने पर प्रदूषण बढ़ता है, तो क्या गेहूं की खेती भी बंद कर देनी चाहिए? शायद नहीं।
’राजेश कुमार चौहान, जलंधर
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