कई लोग कृषि कानूनों को वापस लेने के प्रधानमंत्री के फैसले से खुश नहीं हैं। कहा जा रहा है कि अगर कृषि कानून वापस लेने ही थे तो किसानों के दबाव में आकर हाथ खड़े क्यों किए? इसी तरह एक बड़े वर्ग का मानना है कि भविष्य में पंजाब, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सरकार ने यह फैसला मजबूरी में किया। ऐसी तमाम मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।
पर सौ बात की एक बात है। राजनीति सत्ता का खेल है। जो इस खेल में हैं, उनके लिए आत्मा की आवाज, निर्णय-समझौते, दबना-धमकाना आदि कुछ मायने नहीं रखता। अगर कुछ मायने रखता है तो सिर्फ यही कि येनकेन-प्रकारेण सत्ता को संभाले रखना और चुनाव जीतते की जुगत में लगे रहना। हर सरकार ऐसा ही करती है। दिल पर हाथ रख कर दो सेकेंड के लिए सोचा जा सकता है कि हम यदि ऐसी जगह पर होते तो क्या करते?
’शिबन कृष्ण रैणा, दुबई
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