Sunday, November 21, 2021

कांटों भरी राह

चेतनादित्य आलोक

ऊंची उड़ान के सपने देखना, समाज द्वारा निर्मित-निर्धारित घेरों से बाहर कदम रखने की पहल करना और गैर-पारंपरिक कार्य-व्यापारों में हाथ डालना कांटों पर चलने जैसा होता है। इस रास्ते में आगे गड्ढा होता है और पीछे गहरी खाई होती है। जरा-सी चूक हुई कि गए। हालांकि कई गड्ढे समाज की वे पारंपरिक आंखें होती हैं, जो हमें गैर-पारंपरिक रास्तों पर जाने से रोकती हैं। हमें बांधती हैं परंपराओं की बेड़ियों से। लेकिन खाई हमारी अपनी ही आंखें होती हैं, जिनमें गिर कर संभलना और फिर उठ कर फिर चल पड़ना बेहद कठिन होता है। इसलिए उन कांटों भरे रास्तों पर चलने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में हमें खाई में नहीं गिरना है।

कांटों भरे रास्तों पर चलते हुए यह ध्यान रखना आवश्यक होता है कि सफलता हमें अचानक नहीं मिल जाती। मनुष्य के लिए अपनी आदतों को अचानक छोड़ पाना आसान नहीं होता, बल्कि उसके लिए लगातार कठिन परिश्रम करना पड़ता है, व्यक्ति को भीतरी लड़ाई भी लड़नी पड़ती है, एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

पीटी ऊषा, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, पीबी सिंधू से लेकर भारतीय हाकी की नई परिभाषा गढ़तीं, उसे नए आयाम तक ले जातीं हुनरमंद बेटियां अचानक सफल नहीं हो गई होंगी। उन्हें भी निश्चित रूप से उन्हीं रास्तों से होकर गुजरना पड़ा होगा, जहां सदियों से परंपरावादी पुरुष वर्ग का सुरक्षा कवच और सलाहों का घेरा मौजूद है। उन्हें अपने घर वालों को मनाना पड़ा होगा।

रिश्तेदारों से जूझना पड़ा होगा। जरा सोचिए कि उनके माता-पिता पड़ोसियों और रिश्तेदारों से कैसे निबटे होंगे! फिर अहम बात यह कि हमारी बेटियों और उनके माता-पिता ने अपने भीतर का संघर्ष कैसे जीता होगा, अपनी बाहर की यात्रा पर निकलने से पहले, क्योंकि सबसे बड़ी लड़ाई तो वही होती है, जो भीतर में लड़ी जाती है। उसे जीत लिया तो समझना चाहिए कि आधी लड़ाई जीत ली गई है। शेष आधी लड़ाई बाहर के मैदान में जीती जाती है, जो अपने भीतर के मैदान में लड़ी गई लड़ाई से कहीं आसान होती है।

हालांकि हमारे देश में हमेशा से ऐसा नहीं था। वैदिक-पौराणिक काल में महिलाओं की उपलब्धियां काफी बड़ी रही हैं। ‘अर्थशास्त्र’ में वर्णन है कि शासकों की सुरक्षा में तैनात रहने वाली महिलाएं मार्शल आर्ट, कुश्ती, तलवारबाजी और तीरंदाजी आदि में निपुण होती थीं। इसके अलावा, सुरक्षा के अतिरिक्त जासूसी के दुष्कर और प्रभावशाली कार्यों में भी महिलाओं को शामिल किया जाता था।

महिलाओं के सशक्तिकरण का यह क्रम ईसा पूर्व 320 ईस्वी से लेकर 550 ईस्वी तक यानी गुप्तकाल में भी जारी रहा। सुरक्षा और जासूसी के कार्य करने वाली सभी महिलाएं आमतौर पर स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त बने रहने के लिए प्राचीन काल में हमारी माताओं-बहनों जैसी ही योग-प्राणायाम, आसन, ध्यान आदि का न केवल अभ्यास करती थीं, बल्कि उनमें निपुण भी होती थीं। मौर्य काल के दौरान भारत की यात्रा पर आने वाले यात्री मेगास्थनिज ने भी हमारे समाज में महिलाओं की उन्नत और सशक्त स्थितियों का वर्णन किया है। लेकिन क्या कारण है कि आज हमारी महिलाओं को विभिन्न प्रकार की बेड़ियों-बंधनों में जकड़कर रखा जाता है।

हालांकि जब कभी अवसर मिला, आधुनिक युग की भारतीय महिलाओं ने भी खुद को साबित किया है। इतिहास साक्षी है कि उन्नीसवीं सदी में भी हमारे देश की बेटियों ने अनेक क्षेत्रों में अपने झंडे गाड़े और दुनिया को अपने हुनर से दांतों तले उंगलियां दबाने पर मजबूर किया। कला, साहित्य और संगीत आदि क्षेत्रों में तो वे सदा से आगे रही ही हैं, विज्ञान में भी पुराने जमाने से लेकर आधुनिक दौर तक में तमाम ऐसी महिलाएं रही हैं, जिन्होंने अपने वक्त में और आज भी समूचे समाज के लिए खास उपलब्धियां अर्जित कीं।

भारतीय महिलाओं ने अपने इसी हौसले को अन्य क्षेत्रों में भी अंजाम तक पहुंचाया है। वह कोई मशहूर टीवी शो हो या वन्यजीवन के क्षेत्र में काम करने वाली स्वनिर्भर महिलाएं या फिर साहस के नए मानक गढ़तीं भारत-नेपाल सीमा पर तैनात सशस्त्र सीमा बल में अहम पदों पर अपनी सेवा से सबको चमत्कृत करने वाली महिलाएं, सबने यह साबित किया है कि बस मौका मिलने भर की देरी होती है, वे खुद को मुख्यधारा के तमाम पुरुषों की बराबरी करने को तैयार हैं। मैं अपने आसपास भी ऐसी तमाम नई लड़कियों को देखता हूं, जो ऊर्जा से भरी हुई हैं और किसी भी क्षेत्र की चुनौती स्वीकार करने तैयार खड़ी हैं।

हजारों-लाखों महिलाएं समाज में व्याप्त परंपरा की बेड़ियों-कवचों को तोड़कर जब कभी पहली बार आगे बढ़ी होंगी, तब उन्होंने सोचा भी न होगा कि यह विशाल आकाश एक दिन उनके हौसले के आगे नतमस्तक होगा। यह कतई आसान नहीं था। जहां बड़े-बड़े सूरमा पराजय के भय से थर-थर कांपने लगते हों, वहां बहादुर बेटियां नित नए प्रतिमान गढ़ रही हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि एक दिन ऐसा आएगा, जब हमारे देश की महिलाओं को कुछ नया और अलग करने के पहले हर बार अपने भीतर कोई लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी… समाज के रूढ़ ‘कवचों’ से दो-दो हाथ नहीं करना होगा।

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From: Jansatta

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