पूनम पांडे
कुछ दिनों पहले रेल यात्रा के दौरान एक नन्हे बालक को देखा। उम्र दस-ग्यारह महीने रही होगी। वह पारदर्शी बैग से झांक रहे एक तैयार ‘बेबी फूड’ को देखता और बार-बार हाथ मारता। मां उसे देख कर हंस देती। बगैर यह सोचे कि बालक भूखा है या नहीं, वह एक कटोरे में उस पाउडर को दूध में मिला कर बच्चे को खिला देती। बच्चा ताली बजाते हुए कुछ निगल लेता, कुछ गिरा देता। फिर मां बच्चे को निप्पल लगी पानी की बोतल थमा देती। मां अपने मोबाइल में मगन हो जाती। बालक को व्यस्त देख कर कहती, वाह! आधुनिक समय के उत्पाद बहुत आराम दे रहे हैं।
सुन कर सहयात्री भी हां मे हां मिलाते। यह यात्रा सात घंटे में पूरी हुई और इतनी देर में बच्चे ने कई बार यही सब खाया-पीया। उसने भोजन के साथ कुछ खेल जैसा किया। एक बात और, जो सबने देखी, कि खुद मां ने भी इतनी देर में केला, सेब या रोटी नहीं, बल्कि उस आधुनिक रेलगाड़ी में पिज्जा मंगवाया, उसे कुतर कर खाया, टिश्यू पेपर से हाथ साफ कर लिए, बस हो गई खुराक। यह है हमारा बाजार, जिसने भूख के प्राकृतिक अहसास को, उस आनंद को ही रसहीन कर दिया है।
आदमी को बाजार के तौर-तरीकों ने ऐसा बना दिया है कि वह किसी बात को अपने तरीके से सोच ही नहीं पाता। मसलन, आलू के व्यंजन घर पर बनाने के बजाय स्मार्ट और खूबसूरत गृहिणी कहती है, ये लो पांच रुपए के ब्रांड वाले चिप्स, इसमें है आलू का असली मजा। कुल मिला कर इस मुनाफाखोर बाजार ने उपभोक्ता का दिमाग ही कुंद कर दिया है- न कोई तर्क, न कोई व्यावहारिक बात, न सोचने का मौका, बस एक बनावटी-सी जरूरत वाला भ्रम और बाजार से खाना, पीना सब कुछ इतनी तीव्र महक के साथ पलक झपकते हासिल हो जाता है कि अब कोई अपनी पाचन ग्रंथियों को हरकत में आने नहीं देना चाहता।
कुछ दिनों पहले एक छोटी-सी पहाड़ी यात्रा में जाना हुआ। वहां कुछ युवक-युवतियों का दल भी साथ-साथ चढ़ाई कर रहा था। यह एक साधारण और सरल पहाड़ी थी, पर हम लोग अपनी हंसी नहीं रोक पा रहे थे कि उन सबने दुर्गम पहाड़ी की जरूरत के हिसाब से ट्रैकिंग सूट-बूट और छड़ी सहित अनेक उपकरण लाद रखे थे। उस पहाड़ी पर चढ़ने और उतरने के मार्ग अलग-अलग थे, लेकिन वह ट्रैकिंग वाली पहाड़ी बहुत लोकप्रिय है, यह बात बाजार की सूची में थी, इसलिए इक्कीस युवक-युवतियां किसी पेड़-पौधे की खुशबू या उनकी अन्य उपयोगिता को जानना तक नहीं चाहते थे।
उनको भूखा-प्यासा देख किसी ने कहा भी कि ‘आप लोग भूखे हैं, यह देखो कढ़ी पत्ते के कितने पेड़ हैं, यह चबा लो तो भूख और प्यास दोनों मिट जाएगी।’ पर वे सब तो किसी का इंतजार कर रहे थे। उतरने वाले रास्ते पर अचानक गणवेश में डिब्बे लाद कर दो आदमी आए और उनको पर्याप्त हाट डाग्स, बर्गर, पिज्जा, शीतल पेय देकर चले गए। वह दल एक चट्टान पर बैठ कर फास्ट फूड कुतरने लगा।
शीतल पेय पीते हुए वे सब कह रहे थे कि ‘वाह! क्या स्वाद है, क्या जायका है!’ जबकि एक ग्रामीण दल ने वहीं आग जलाई, चाय उबलने रख दी, उसी आग में खूब सारे आलू डाल दिए। थोड़ी देर बाद वे स्वाद लेकर आलू-नमक खाने लगे। उन भुने आलुओं की महक से माहौल महक उठा था। यह देख कर दिल को सुकून मिला कि चलो, किसी को तो पता है कि प्रकृति के पास रह कर असली आनंद होता क्या है और उसको पाया कैसे जाता है। वरना आज तो आदमी का दिमाग इस तरह से कब्जाया जा चुका है कि उसकी पूरी दिनचर्या पर बाजार की जकड़ हो गई है।
जरा-सा धूप लगती है तो बाजार विज्ञापन में कह देता है कि अब आपको सिर दर्द तो होगा ही, पर इससे पहले यह दवा खा लो। आपको सर्दी लगी, बुखार आ रहा है, बदन टूट रहा है तो एक साथ चार-पांच गोलियां गटक लो और हर तरह की ठिठुरन, पीड़ा, कसक, कसमसाहट सबको भूल जाओ। बाजार हर चीज की मनचाही कीमत तय कर रहा है।
इतना ही नहीं, स्नेहिल बंधनों को भी भुनाना या महंगे उपहार थोप कर निभाना जरूरी है। आशिष या शुभकामना से काम नहीं चलेगा, हर रिश्ते में नगदी दो, यह भोंपू बजा कर हर सड़क के होर्डिंग पर बाजार कह रहा है और सब लाचार हैं। किसी संबंध को उपहार से ही जाहिर करो, चाहे मन में प्यार हो न हो। मतलब, ओस चाट कर प्यास बुझा लो। बाजार कह रहा है कि बस आराम और सुकून से रहो, जबकि जीवन केवल आराम तो नहीं है। जीवन तकलीफ से होकर गुजर जाने का नाम है। समस्या से जूझने और फिर आनंद में डूब जाने का नाम है। पर इस कुटिल बाजार ने यह सब सच कहीं पर्दे के पीछे छिपा दिए हैं।
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