Sunday, November 28, 2021

शिथिलता और ढिठाई

मुंबई पर हुए आतंकी हमले को तेरह बरस बीत गए। उस हमले के सारे सबूत पाकिस्तान सरकार को सौंप दिए गए थे। उनमें स्पष्ट है कि उस घटना को पाकिस्तान की जमीन से अंजाम दिया गया था और उसे अंजाम देने वाले वहीं से प्रशिक्षित होकर समुद्र के रास्ते आए थे। मगर इतने साल बीत जाने के बावजूद न तो पाकिस्तान ने उन आरोपियों के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई की है और न उसे लेकर अदालत में चल रही सुनवाई में तेजी लाने का प्रयास किया है। उसका मुख्य आरोपी आज भी पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहा है।

मुंबई हमले की तेरहवीं बरसी पर भारत सरकार ने पाकिस्तान उच्चायोग के एक वरिष्ठ अधिकारी को तलब करके राजनयिक नोट सौंपते हुए कहा है कि पाकिस्तान इस मामले की सुनवाई में तेजी लाए और अपनी जमीन का उपयोग आतंकी हमलों के लिए न होने दे। पाकिस्तान पर शायद ही इसका कोई असर पड़े। ऐसे नोट और दस्तावेज भारत की तरफ से कई मौकों पर सौंपे जा चुके हैं, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी मुंबई हमले से जुड़े सबूतों को दिखाया जा चुका है। कुछ देशों ने उसे फटकार भी लगाई है, मगर उसकी वही पुरानी ढिठाई हर बार देखने को मिलती रही है। उसका बहुत पुराना तरीका है कि भारत की तरफ से सौंपे गए सबूतों को वह सिरे से खारिज कर देता है।

मुंबई हमला पूरी तरह से पाकिस्तान प्रायोजित था। उसमें फिदाइनों को पाकिस्तान से फोन पर लगातार निर्देश दिए गए थे। उन्होंने पूरे इत्मीनान से जगहों की पहचान करके और घूम-घूम कर गोलियां बरसाई थी। उसमें एक सौ छियासठ लोग हताहत हुए थे। एक आतंकी जिंदा पकड़ा गया था, जिसने पूछताछ में साफ कबूल किया था कि उसे पाकिस्तान में प्रशिक्षित किया और हमले के लिए भेजा गया था।

वे सारे सबूत भारत ने पाकिस्तान को सौंप दिए थे। अगर कोई उदारवादी और आतंकवाद के खिलाफ जंग का हिमायती देश होता, तो इस तरह दूसरे देश में अंजाम दी गई घटना पर सख्त कदम उठाता। मगर पाकिस्तान से ऐसी उम्मीद भला कब की जा सकती है। वह तो इस बात को मानने को ही तैयार नहीं कि मुंबई पर हुए हमले में उसके देश के नागरिक शामिल थे। यहां तक कि फांसी के बाद अजमल कसाब का शव तक लेने से उसने इनकार कर दिया था।

हालांकि मुंबई हमले को लेकर तत्कालीन सरकार के शिथिलता भरे रवैए पर भी स्वाभाविक असंतोष जताया जाता रहा है। सरकार ने उस घटना की जांच आदि में तो तत्परता अवश्य दिखाई थी, मगर पाकिस्तान पर उसे कैसे और कितना दबाव बनाना है, इसे लेकर वह उचित पैमाना नहीं तय कर पाई थी। केवल दस्तावेज सौंप देने और अदालती कार्रवाई का इंतजार करने भर से पाकिस्तान के मंसूबे नहीं तोड़े जा सकते।

मुंबई हमले को लेकर पाकिस्तान सरकार की स्पष्ट जवाबदेही बनती है। मगर जैसे वह हमेशा से आतंकवादी घटनाओं में अपनी जमीन के इस्तेमाल को लेकर नकार की मुद्रा अपनाए रहता है, भारत सरकार की शिथिलता के चलते उसने मुंबई हमले में भी वही रवैया अपनाया। इसलिए अभी जो सरकार ने उसे राजनयिक नोट सौंपा है, उसे वह कितनी गंभीरता से लेगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। अब भी उस हमले के पीड़ित परिवार न्याय की आस लगाए हुए हैं। काफी देर हो चुकी है, पर ठीक से दबाव बनाया जाए, तो पाकिस्तान इस मामले में कोई आशाजनक निर्णय तक पहुंचने को बाध्य हो सकता है।

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From: Jansatta

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