देश के विभिन्न राज्यों में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे वरिष्ठ नागरिक मिल जाएंगे जो वृद्ध आश्रम, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड या ऐसे ही सार्वजनिक स्थलों पर अपना जीवन यापन व्यतीत करने को मजबूर हैं। इनमें ज्यादातर ने तो सोचा भी नहीं होगा कि उम्र के जिस पड़ाव पर उन्हें किसी सहारे की आवश्यकता होगी, उस वक्त इस तरह से भटकने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। सवाल इस बात का है कि इस प्रकार से प्रत्येक राज्य के शहरों और महानगरों में इस प्रकार के वृद्ध आश्रमों में जो बुजुर्ग अपना जीवन काट रहे हैं, उनमें बड़े स्तर के सेवानिवृत्त अधिकारियों से लेकर हर तरह के लोग हैं।
किसी ने जीवन भर मजदूरी की, तो किसी ने निजी कार्य करके अपने परिवार का लालन-पालन किया और बच्चों को पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाया। लेकिन जब बुढ़ापे में उन्हें बच्चों के सहारे की जरूरत पड़ी तो बच्चों ने हाथ झाड़ लिए। ऐसे मामले भी कम नहीं हैं जिनमें लोगों को उनके बेटे-बहुओं ने या बेटियों ने परिवार पर बोझ बनते देख घर से उनको निकाल दिया, या फिर संपत्ति विवाद को लेकर घर से बेदखल कर डाला। हालांकि ऐसे मामलों से निपटने के लिए सरकार ने कानून बनाए हैं।
बुजुर्गों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए पुलिस को भी जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन जब भी ऐसे मामले सामने आते हैं तो देख कर पीड़ा से मन भर जाना स्वाभाविक ही है। गहराई से सोचें तो लगता है कि क्या बुजुर्गों ने हमें इसी दिन के लिए बड़ा किया और योग्य बनाया। ऐसे परिवारों की भी कमी नहीं है जिनके बच्चे विदेश में रह रहे हैं, खूब कमा रहे हैं, लेकिन उनके बुजुर्ग कोठियों में अकेले जीवन काट रहे हैं। ऐसी भी घटनाएं देखने में आई हैं जिनमें बुजुर्ग अकेलेपन में ही दम तोड़ देते हैं तो कई दिन तक पता भी नहीं चलता।
परिवार का साथ न मिलने के कारण ज्यादातर बुजुर्ग मानसिक व्याधियों का शिकार हो जाते हैं। ये घटनाएं हमें बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारियों के बारे में सोचने को मजबूर करती हैं। ऐसा नहीं कि वृद्धाश्रमों की हालत कोई अच्छी है। सरकारी वृद्धाश्रमों में भी अव्यवस्था, कुप्रबंधन और यहां तक कि बुजुर्गों के उत्पीड़न के मामले सामने आते ही रहते हैं।
मध्यप्रदेश में तो ऐसा हृदय विदारक मामला सामने आ चुका है जिसमें कई बुजुर्गों को गाड़ियों में भर कर सरयू नदी के किनारे छोड़ दिया गया था। ऐसी कोई एकाध घटना नहीं, बल्कि ढेरों घटनाएं मिल जाएंगी। दरअसल वृद्धाश्रम की अवधारणा भारत की नहीं है, बल्कि यह चलन पश्चिम का है। लेकिन दुख की बात है कि हम अंधे होकर अपनी सामाजिक व्यवस्था में इसका तेजी से अनुसरण कर रहे हैं और एक समय बाद चाहते हैं कि वृद्धों को आश्रमों में भेज दिया जाए। ऐसा नहीं है कि बुजुर्ग पीढ़ी हमारे लिए किसी काम की नहीं है। हम चाहें तो उनके अनुभवों से ही काफी कुछ सीख सकते हैं। आज की पीढ़ी को इस बारे में सोचना होगा।
विजय कुमार धानिया, दिल्ली
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