Sunday, November 14, 2021

बेरोजगारी का बढ़ता संकट

सरोज कुमार

देश में साठ लाख से अधिक सरकारी पद खाली हैं। अकेले केंद्र सरकार में 8.72 लाख से अधिक रिक्तियां हैं। इन्हें भरने से ही आर्थिक विकास की नई और ऊंची राह निकलेगी। हमें आर्थिक अस्थिरता को सामाजिक अस्थिरता में बदलने का इंतजार नहीं करना चाहिए।

बेरोजगारी देश की ऐसी समस्या बन गई है, जिसका न तो समाधान दिखाई पड़ता है, न ही समाधान की कोई सोच ही सामने है। बेकाबू बेरोजगारी सरपट दौड़ रही है और हम यंत्रवत खड़े देख रहे हैं। पिछले महीने यानी अक्तूबर में पचपन लाख लोग बेरोजगार हो गए। बेरोजगारी सिर्फ व्यक्ति के भविष्य को ही बर्बाद नहीं करती, बल्कि उसके आश्रितों, अर्थव्यवस्था और अंत में देश के भविष्य को भी तबाह करती है। यह बाहर से जितना प्रभावित करती है, उससे कहीं ज्यादा भीतर से खोखला करती है। यह मन मस्तिष्क को तोड़ कर रख देती है। टूटे मन के साथ कोई देश अपनी सदी का कौनसा अंतिम स्वरूप गढ़ेगा, जरा कल्पना कीजिए।

यह सच है कि बेरोजगारी का संकट आज का नहीं है। लेकिन बड़ा सच यह है कि आज यह संकट विकराल हो चुका है। जबकि संकट की गंभीरता त्वरित कार्रवाई की मांग करती है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) की पहली तीन रपटें बताती हैं कि बेरोजगारी की हालत महामारी से पहले ही गंभीर हो चुकी थी। मई 2019 में जून 2017-जुलाई 2018 के लिए पीएलएफएस की जब पहली रपट आई तो हंगामा मच गया।

बेरोजगारी दर पैंतालीस साल के सर्वोच्च स्तर 6.1 फीसद पर पहुंच गई थी, जो तथाकथित आर्थिक सुधारों नोटबंदी और जीएसटी के बाद की थी। पीएलएफएस की बाद की दो वार्षिक रपटों में बेरोजगारी दर में थोड़ा सुधार जरूर दिखा और यह जुलाई 2018-जून 2019 के दौरान 5.8 फीसद, जुलाई 2019-जून 2020 की अवधि में 4.8 फीसद दर्ज की गई थी। भारत जैसे विकासशील देश के लिए बेरोजगारी की इतनी दर भी किसी महामारी से कम नहीं थी। लेकिन कोरोना महामारी से ठीक पहले फरवरी-2020 में बेरोजगारी दर 7.8 फीसद चढ़ गई। लोगों ने इसे ऐतिहासिक मान लिया था। लेकिन महामारी के दौरान यह प्रागैतिहासिक बन गई। तब से अब तक बेरोजगारी दर कम से कम ऐतिहासिक स्तर पर बनी हुई है।

सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआइई) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले महीने यानी सितंबर में बेरोजगारी दर छह महीने बाद पहली बार 6.86 फीसद के निचले स्तर पर आई थी। उम्मीद जगी थी कि त्योहारी मौसम में अक्तूबर अतिरिक्त रोशनी लेकर आएगा। लेकिन बेरोजगारी दर ने अमावस की रात को और घना कर दिया और यह 7.75 फीसद की ऊंचाई पर पहुंच गई। यह स्थिति तब है जब देश में बेरोजगार सिर्फ उसे माना जाता है, जिसके पास सप्ताह में एक घंटे का भी रोजगार नहीं होता। अक्तूबर की बेरोजगारी दर रोजगार बाजार की खस्ताहाली का आईना भी है, क्योंकि बेरोजगारी दर में यह वृद्धि श्रम बाजार में श्रमबल भागीदारी दर (एलपीआर) घटने के बावजूद हुई है। यह एक खतरनाक रुझान है।

सितंबर में श्रम बाजार में श्रमबल भागीदारी 40.7 फीसद थी, जो अक्तूबर में घट कर 40.4 फीसद हो गई। श्रमबल भागीदारी दर घटने से बेरोजगारी दर नीचे जानी चाहिए थी, क्योंकि बेरोजगारी दर की गणना बाजार में उपलब्ध कुल श्रमबल यानी रोजगार में लगे और रोजगार के लिए प्रयासरत लोगों की कुल संख्या के आधार पर ही की जाती है। त्योहारी मौसम में, खासतौर से दिवाली पर बाजार में मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। लेकिन अक्तूबर में लगभग पचपन लाख लोग बेरोजगार हो गए।

सितंबर में रोजगाररत लोगों की कुल संख्या लगभग चालीस करोड़ बासठ लाख थी, जो अक्टूबर में घटकर चालीस करोड़ सात लाख सत्तर हजार हो गई। यह अलग बात है कि शहरी क्षेत्र में सात लाख से अधिक नए रोजगार तैयार हुए। लेकिन ग्रामीण इलाके में संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में साठ लाख से अधिक बेरोजगार हो गए। अक्तूबर में ग्रामीण बेरोजगारी दर सितंबर के 6.06 फीसद से बढ़ कर 7.91 फीसद हो गई। जबकि शहरी बेरोजगारी दर सितंबर के 8.62 फीसद से घट कर 7.38 फीसद पर आ गई।

ग्रामीण इलाकों में अधिकतर रोजगार असंगठित क्षेत्र के हैं और असंगठित श्रमिकों का हिस्सा देश की कुल श्रमशक्ति में लगभग बानवे फीसद है। असंगठित श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा कृषि और मनरेगा से जुड़ा है। लेकिन अक्तूबर में कृषि क्षेत्र में चौबीस लाख श्रमिक बेरोजगार हो गए। रबी की बुआई का मौसम होने के बावजूद कृषि क्षेत्र में श्रमिकों का बेरोजगार होना महंगाई के दबाव का संकेत है। कमाई घटने और महंगाई बढ़ने के कारण खेती की लागत घटाना किसान की मजबूरी बन गई है। बेशक इसका असर उत्पादन पर होगा। लेकिन इसी महीने किसानों की संख्या नब्बे लाख बढ़ गई। यानी बाजार में रोजगार न मिलने के कारण खेती की तरफ लोगों का लौटना जारी है। इसका एक कारण किसानों के खातों में हर साल पहुंचने वाला छह हजार रुपया भी है।

ग्रामीण इलाकों में रोजगार उपलब्ध कराने वाला दूसरा सबसे बड़ा माध्यम मनरेगा है। लेकिन मौजूदा वित्त वर्ष में इस योजना के नाम 73,000 करोड़ रुपए ही आवंटित किए गए। यह पैसा छह महीने में ही खाली हो गया और मनरेगा श्रमिकों की दिवाली काली हो गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 29 अक्तूबर तक राज्य इस मद में कुल 79,810 करोड़ रुपए खर्च कर चुके थे। कुल इक्कीस राज्यों में मनरेगा का पूरा बजट खत्म हो गया, कई राज्यों ने तो बजट से अधिक खर्च कर डाला। अब संसद के शीतकालीन सत्र में मनरेगा के लिए अनुपूरक बजट आवंटित होगा, रोजगार तभी उपलब्ध हो पाएगा।
मनरेगा अकुशल कामगारों को प्रत्यक्ष रोजगार मुहैया कराने के लिए केंद्र सरकार की एकमात्र और सबसे बड़ी रोजगार योजना है।

लेकिन मनरेगा मजदूरी बाजार के मुकाबले जैसे ही कम हुई, यह योजना चमक खोने लगी। अलग-अलग राज्यों में मनरेगा की मजदूरी का अलग-अलग हिसाब है और यह न्यूनतम एक सौ तिरानवे रुपए (छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश) से लेकर अधिकतम तीन सौ अठारह रुपए (सिक्किम) है। यानी एक मनरेगा मजदूर साल में अधिकतम 31800 रुपए ही कमा सकता है। इतने में कोई एक परिवार कैसे चलेगा, यह बड़ा सवाल है। पढ़े-लिखे कुशल नौजवानों की बेरोजगारी की अलग कहानी है। श्रमशक्ति के इस हिस्से के लिए सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र साफ होने के कगार पर है और निजी क्षेत्र नई नौकरियां पैदा करने की परिस्थिति में नहीं है।

आइएचएस मार्किट इंडिया का पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआइ) लगातार ऊपर चढ़ रहा है। अक्तूबर में विनिर्माण पीएमआइ 55.9 पर पहुंच गया, जो सितंबर में 53.7 पर था। महामारी से ठीक पहले फरवरी 2020 में विनिर्माण पीएमआई 54.5 था। यानी विनिर्माण क्षेत्र की आर्थिक सेहत महामारी के पूर्व के स्तर से आगे निकल चुकी है, लेकिन अस्थिर आर्थिक वातावरण नए निवेश के रास्ते में रोड़ा है। कंपनियां जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि यहां नई नौकरियां पैदा नहीं हो पा रही। हां, सेवा क्षेत्र में दिवाली का माहौल जरूर है, और इसी के बल अक्टूबर में शहरी क्षेत्र की बेरोजगारी दर नीचे आई है।

यह तय है कि आर्थिक वातावरण स्थिर होने तक निजी क्षेत्र नया निवेश नहीं करने वाला है। ऐसे में सरकार की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह स्थिर आर्थिक वातावरण बनाने के लिए विकास दर की कवायद छोड़ नौकरियों में निवेश करे। नई नौकरियां न भी पैदा करे, तो कम से कम रिक्त पदों को ही भर दे। इससे बाजार में एक टिकाऊ मांग की स्थिति बनेगी, फिर निजी क्षेत्र में भी नई नौकरियां आएंगी। देश में साठ लाख से अधिक सरकारी पद खाली हैं। अकेले केंद्र सरकार में 8.72 लाख से अधिक रिक्तियां हैं। इन्हें भरने से ही आर्थिक विकास की नई और ऊंची राह निकलेगी। हमें आर्थिक अस्थिरता को सामाजिक अस्थिरता में बदलने का इंतजार नहीं करना चाहिए।

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From: Jansatta

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