Tuesday, November 30, 2021

गुटबंदी में उलझी कांग्रेस

उत्तराखंड में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव मुहाने पर खड़े हैं और पांच साल तक विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी सत्ता में आने का सपना संजोए हुए है। पर जहां भाजपा के दो राष्ट्रीय नेता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा उत्तराखंड का तूफानी दौरा कर चुके हैं और चार दिसंबर को देहरादून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी बिगुल बजाने आ रहे हैं, वहीं अभी तक कांग्रेस के किसी भी राष्ट्रीय नेता ने उत्तराखंड की सुध तक नहीं ली है। जबकि यहां तक कि इस दौरान आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया भी उत्तराखंड का बीते तीन महीने में तीन बार तूफानी दौरा कर चुके हैं।

दरअसल, आगामी विधानसभा चुनाव के तीन-चार महीने पहले ही भाजपा और आम आदमी पार्टी कांग्रेस से चुनावी प्रचार में काफी आगे निकल चुकी है जबकि उत्तराखंड कांग्रेस के नेता एक दूसरे की टांग खिंचाई से बाज नहीं आ रहे हैं। कांग्रेस नेता कई गुटों में बंटे हैं। आलम यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति के मुखिया हरीश रावत और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और कांग्रेस समन्वय समिति के प्रभारी किशोर उपाध्याय के बीच जमकर बयानबाजी चल रही है।

किशोर उपाध्याय ने 2017 के विधानसभा चुनाव में देहरादून जिले की सहसपुर विधान सभा सीट से उन्हें जबरन चुनाव लड़ाने और उन्हें हराने का आरोप हरीश रावत पर लगाया। साथ ही उन्होंने कहा कि इससे पहले उन्हें टिहरी से 2012 के विधानसभा चुनाव में विजय बहुगुणा ने दगा देकर चुनाव हराया था और बहुगुणा ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें चुनाव हराने वाले कांग्रेस के बागी निर्दलीय उम्मीदवार दिनेश धने को उनसे सलाह किए बिना ही कैबिनेट मंत्री बना दिया था। हरीश रावत ने भी मुख्यमंत्री बनने के बाद निर्दलीय विधायक दिनेश धने को ज्यादा महत्त्व दिया।

उपाध्याय ने अपना दर्द बयां करते हुए यह आरोप भी लगाया कि हरीश रावत 17 बार उनसे सियासी दगा कर चुके हैं और उन्हें अब धमकी देने की भाषा में उतर आए हैं जबकि उन्होंने राजीव गांधी से कहकर राजनीतिक वनवास भोग रहे हरीश रावत को कई बार राजनीतिक जीवनदान दिलवाया। इतना ही नहीं, उन्होंने नौ नवंबर, 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन होने पर हरीश रावत को सोनिया गांधी के दरबार में पैरवी कर राज्य का पहला प्रदेश अध्यक्ष बनवाया और 2013 में हरीश रावत को उन्होंने मुख्यमंत्री बनवाने में अहम भूमिका निभाई। तब उपाध्याय पार्टी के उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष थे और उन्हें हरीश रावत का दाहिना हाथ माना जाता था।

जब हरीश रावत की सरकार कांग्रेस के कई विधायकों ने बगावत करके गिराई तब पार्टी हाई कमान हरीश रावत को हटाकर इंदिरा हृदयेश या प्रीतम सिंह को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने पर राजी हो गया था ताकि पार्टी में एकता बनी रहे। पर तब किशोर उपाध्याय ने हरीश रावत का दूत बनकर सोनिया दरबार में रावत की जमकर पैरवी की रावत की कुर्सी बचाने में अहम भूमिका निभाई। इसके एवज में हरीश रावत ने किशोर उपाध्याय को राज्यसभा में भेजने का वादा किया था। हालांकि जब 2016 में हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहते हुए राज्यसभा के चुनाव आए तो हरीश रावत ने पलटी मारते हुए अपने खास विश्वासपात्र प्रदीप टम्टा को राज्यसभा का टिकट दिलवा दिया।

कद्दू-छूरी का खेल समझाते हुए हरीश रावत किशोर उपाध्याय के आरोपों का जवाब देते हुए कहते हैं कि 2017 में किशोर की पसंद पर ही उनको सहसपुर से विधानसभाा चुनाव लड़ाया गया था, जबकि वे ऋषिकेश, डोईवाला, रायपुर या टिहरी किसी एक जगह से भी विधानसभा चुनाव का टिकट लेना चाहते रहे थे, हम उनको लड़ाने को राजी थे और जब वे सहसपुर गए तो पार्टी ने इस पर भी हामी भरी।

इस पर उपाध्याय कहते हैं कि 17 बार उन पर छुरी चलाकर उनको लहुलुहान कर चुके लेकिन संबंधों की मर्यादा के पालन का दिखावा करते हुए हरीश रावत उन्हें अनन्य सहयोगी कह रहे, जिसके लिए वे उनके आभारी हैं। साथ ही उन्होंने रावत पर उन्हें धमकाने का आरोप भी लगाया। चुनाव से पूर्व उत्तराखंड में कांग्रेस विभिन्न गुटों में विभाजित है। इस गुटबाजी के कारण पार्टी हाईकमान ने राज्य से मुंह मोड़ रखा है और पार्टी को स्थानीय नेताओं के हाल पर ही छोड़ दिया है। दलित नेता यशपाल आर्य और उनके विधायक बेटे संदीप आर्य के पार्टी में वापस आने से राज्य कांग्रेस में कुछ जान आई थी पर कांग्रेस के बड़े नेताओं की आपसी लड़ाई ने सारा खेल खराब कर दिया।

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From: Jansatta

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