Thursday, November 25, 2021

सड़क दुर्घटनाएं और वित्तीय बोझ

प्रवीन कुमार

सड़क दुर्घटना देश में मृत्यु और विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक है, जिसकी देश को भारी सामाजिक-आर्थिक लागत चुकानी पड़ती है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटनाओं के कारण होने वाला नुकसान देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग तीन प्रतिशत है। व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्तर पर सड़क सुरक्षा के महत्त्व को समझते हुए सभी हितधारकों के सामूहिक प्रयास से सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है।

सड़कें देश के विकास एजेंडे और अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हालांकि सड़कें विकास में तभी योगदान दे सकती हैं जब वे यात्रियों के लिए सुरक्षित हों। हर दिन लाखों लोग एक्सप्रेसवे से लेकर ग्रामीण सड़कों का उपयोग करते हैं। दुर्भाग्य से, उनमें से कुछ सड़क दुर्घटना के शिकार होकर गंभीर रूप से घायल या असमय काल का ग्रास बन जाते हैं। दुनिया में, सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या में भारत पहले स्थान पर है, इसके बाद चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका का स्थान है। 2018 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट, ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट आन रोड सेफ्टी, के मुताबिक भारत में सड़क दुर्घटनाओं में प्रति वर्ष लगभग डेढ़ लाख लोगों की मौत दर्ज होती है। प्रति एक लाख जनसंख्या पर तेईस लोगों की मौतें होती हैं, जो कि दुनिया में सड़क दुर्घटना से संबंधित मौतों का लगभग ग्यारह प्रतिशत है।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा प्रकाशित वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्ग देश के सड़क नेटवर्क का 2.13 प्रतिशत हिस्सा साझा करते हैं, लेकिन 2015 से 2019 तक की वार्षिक औसत सड़क दुर्घटनाओं और मौतों में 29.6 प्रतिशत हिस्सा है। इसी प्रकार राज्य राजमार्ग और प्रमुख जिला सड़कें देश के सड़क-तंत्र का क्रमश तीन और तिरासी प्रतिशत हिस्सा साझा करते हैं, जबकि वार्षिक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का 43.4 और 27 प्रतिशत हिस्सा साझा करते हैं। ग्रामीण सड़क दुर्घटनाओं में मौतें शहरी सड़कों की तुलना में लगभग दोगुनी हैं। 2019 में लगभग सड़सठ फीसद सड़क दुर्घटनाएं और साठ फीसद मौतें ग्रामीण इलाकों में हुर्इं। यानी ये हादसे न केवल बड़ी तादाद में जनक्षति की वजह बनते हैं, बल्कि इनसे देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान होता है।

उपरोक्त आंकड़े इसलिए चिंताजनक हैं, क्योंकि इतने लोग आपदाओं, आतंकवादी हमलों या फिर अन्य संघर्षों में भी नहीं मारे जाते, जितने सड़क दुर्घटनाओं में असमय अपनी जान गवां बैठते हैं। फर्क यह है कि आतंकी हमलों जैसी घटनाओं में मारे गए लोगों की गिनती होती है, लेकिन हादसों में जान गंवाने वालों के आंकड़े हमें परेशान नहीं करते। विधि आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर सड़क दुर्घटना के एक घंटे के भीतर घायलों को अस्पताल पहुंचा दिया जाए या उन्हें आपात चिकित्सा मिल जाए तो करीब पचास प्रतिशत की जान बचाई जा सकती है। लेकिन जागरूकता के अभाव में बहुत सारे लोगों की जान इसलिए चली जाती है कि घटनास्थल पर मौजूद लोग कानूनी कार्रवाई के डर से घायल व्यक्ति को समय रहते आपातकालीन चिकित्सीय सुविधा प्रदान कराने में हिचकते हैं।

प्रमुख तौर पर सड़क हादसों के पीछे तेज गति और लापरवाही से वाहन चलाना, यातायात नियमों की अवहेलना को कीरण माना जाता है। इनके अलावा टूटी-फूटी सड़कें, विषम और मिश्रित यातायात की स्थिति, निगरानी के बुनियादी ढांचे की अनुपस्थिति, अनुचित सड़क डिजाइन, खराब दृश्यता, विशेषकर रात को और कोहरे के मौसम में, सड़क सुरक्षा उपादान (साइन बोर्ड, रोड मार्किंग, कै्रश बैरियर, रिफ्लेक्टर आदि) का अभाव भी सड़क दुर्घटना का बड़ा कारण हैं।

सड़क परिवहन की मांग को पूरा करने के लिए वाहनों की संख्या और सड़क नेटवर्क की लंबाई में बीते वर्षों में काफी वृद्धि हुई है। देश में सड़क नेटवर्क के विस्तार, गाड़ियों की संख्या में वृद्धि और शहरीकरण का नकारात्मक पक्ष सड़क दुर्घटनाओं में हो रही वृद्धि के रूप में सामने आया है। सड़क दुर्घटना देश में मृत्यु और विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक है, जिसकी देश को भारी सामाजिक-आर्थिक लागत चुकानी पड़ती है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटनाओं के कारण होने वाला नुकसान देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग तीन प्रतिशत है। व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्तर पर सड़क सुरक्षा के महत्त्व को समझते हुए सभी हितधारकों के सामूहिक प्रयास से सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा सड़क सुरक्षा में सुधार और लोगों में सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता लाने के लिए विभिन्न स्तरों पर योजनाएं कार्यान्वित हैं। इनके अलावा राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा नीति के तहत कुछ नीतिगत उपायों को अमली जामा पहनाया गया है, जैसे सड़क सुरक्षा सूचना डेटाबेस की स्थापना, बुनियादी ढांचे को उन्नत बनाना, सुरक्षा कानूनों का प्रवर्तन आदि किया गया है। पर अब भी कुछ बेअदब लोग अपनी अवांछनीय गतिविधियों से बाज नहीं आते और सड़क पर जाने-अनजाने खुद की और दूसरे लोगों की जान जोखिम में डालते हैं।

सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सुढृढ़ करते हुए और उचित वैज्ञानिक साक्ष्य आधारित परिवहन नीतियों के माध्यम से लोगों के सफर को सुगम और सुरक्षित बनाया जा सकता है। अगर व्यक्ति शराब पीकर गाड़ी चलाता है तो इलेक्ट्रानिक सेंसर के माध्यम से गाड़ी के इंजन को बंद किया और संभावित दुर्घटना को होने से बचाया जा सकता है। दुपहिया सवारों द्वारा हेलमेट और दिन के समय हेडलाइट्स के अनिवार्य उपयोग की अधिसूचना और प्रवर्तन के माध्यम से सड़क हादसों पर अंकुश लगाया जा सकता है। चौपहिया वाहन चालकों और सहयात्री के लिए सीट-बेल्ट उपयोग करने हेतु नीति निर्धारण और प्रवर्तन से सड़क उपयोगकर्ताओं को असमय काल का ग्रास बनने से बचाया जा सकता है। चूंकि सड़क सुरक्षा एक सामूहिक जिम्मेवारी है, बशर्ते सरकार और संबंधित विभाग की ईमानदार कर्तव्य परायणता के साथ-साथ बतौर सड़क उपयोगकर्ताओं को अपने व्यवहार में परिवर्तन लाना अपेक्षित है।

सड़कों की योजना, डिजाइन, संचालन और ढांचागत परिवर्तनों के साथ-साथ चिकित्सीय और प्रवर्तन व्यवस्था को सुढृढ़ करने के बाद आमजन के बीच सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता पैदा कर संभावित सड़क हादसों और मृत्यु दर को कम किया जा सकता है। राज्य पुलिस बल और परिवहन विभाग द्वारा अमूमन जनवरी माह में सड़क सुरक्षा सप्ताह या सड़क सुरक्षा माह आयोजित किया जाता है, जिसके अंतर्गत स्कूली और कालेज विद्यार्थियों के बीच विभिन्न प्रतियोगिताओं, एक्सटेंशन लेक्चर के माध्यम से जागरूकता फैलाई जाती है। इस अभियान को और प्रभावी बनाने के लिए अन्य योजनाओं की तरह न केवल सप्ताह भर या एक माह तक सीमित कर, लंबी अवधि तक चलाना होगा।

सोशल मीडिया पर विज्ञापन के माध्यम से युवाओं को सड़क सुरक्षा के प्रति युवाओं को जागरूक किया जा सकता है। सिनेमा हाल में फिल्म शुरू होने से पहले फीचर फिल्म के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा सकता है। ग्रामीण अंचल में लोक कलाकार सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ सड़क सुरक्षा के महत्त्व को लोकमंच से ग्रामीण वयस्कों और वृद्धों को समझा सकते हैं।

महिलाओं को जागरूक करने के लिए टेलीविजन धारावाहिक में विज्ञापन, सड़क सुरक्षा संबंधित खेलकूद प्रतियोगिता, गीत-संगीत प्रतियोगिता, लघु-नाटक प्रतियोगिता आदि से सड़क सुरक्षा के महत्त्व को समझाया जा सकता है। क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण को सड़क सुरक्षा और आपातकालीन सेवाओं के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए इलाके के हर प्रमुख स्थान पर सड़क सुरक्षा संदेश युक्त होर्डिंग लगानी चाहिए और साथ ही बस, टैक्सी, आटो पर सड़क सुरक्षा स्टिकर्स चिपकाने चाहिए, जिसे देख कर लोगों में सड़क सुरक्षा के महत्त्व की भावना जाग्रत हो सके।

हर छोटे-बड़े हादसे पुलिस विभाग के प्राथमिकी रजिस्टर में दर्ज हों, इसके लिए लोगों को प्राथमिकी दर्ज करवाने के लिए उचित प्रोत्साहन द्वारा प्रेरित किया जा सकता है। क्योंकि सड़क हादसों के रिकार्ड का विश्लेषण कर सुधार करने और वैज्ञानिक ज्ञान और साक्ष्य आधारित नीति निर्धारण करने सहयोग मिलता है। इसे एक गंभीर मुद्दा मानते हुए सभी हितधारकों द्वारा एकजुट होकर सड़क सुरक्षा के नियमों के प्रति सभी को जागरूक करना चाहिए, तभी हम देश में हो रहे सड़क हादसों पर रोक लगा पाएंगे।

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From: Jansatta

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