Monday, November 8, 2021

मीथेन उत्सर्जन व वन संरक्षण: ग्लासगो में क्यों बंध गए हाथ

ग्‍लासगो में भारत समेत कई विकासशील देशों पर आर्थिकी के सवाल हावी रहे। ग्लासगो में सौ देशों ने मीथेन प्रतिज्ञा पर दस्तखत कर कहा कि 2030 तक मीथेन गैस के उत्सर्जन को एक तिहाई तक कम करना है। लेकिन भारत समेत बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक कई विकासशील देश उसमें शामिल नहीं हुए। वन संरक्षण प्रतिज्ञा को लेकर भी यही स्थिति रही। विकासशील ही नहीं, इसमें चीन, रूस और आस्ट्रेलिया जैसे देश भी शामिल हैं। भारत में विशेषज्ञों का मानना है कि वन कटाई और मीथेन उत्सर्जन रोकने के लिए हुए समझौतों में भारत इसलिए शामिल नहीं हुआ क्योंकि इससे उसके कृषि और व्यापार क्षेत्र प्रभावित होंगे। कृषि और मवेशियों का भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अहम योगदान है और उन्हें प्रभावित होने से बचाना जरूरी है। भारत की 27 खरब डालर की अर्थव्यवस्था का 15 फीसद से ज्यादा हिस्सा कृषि से आता है।

मीथेन उत्सर्जन कितनी बड़ी चुनौती

कार्बन डाईआक्साइड के बाद मीथेन गैस को तापमान बढ़ने का कारक माना जाता है। लेकिन 100 साल की अवधि में यह कार्बन डाईआक्साइड से 29 गुना ज्यादा प्रभावी होती है और 20 वर्ष की अवधि में इसका असर 82 गुना ज्यादा होता है। मीथेन का उत्सर्जन आठ लाख साल में इस वक्त सबसे अधिक है। मीथेन गैस के उत्सर्जन में कमी होने से तापमान में हो रही वृद्धि पर फौरन असर होगा। इससे पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा ना बढ़ने देने का लक्ष्य हासिल करने में मिलेगी। मीथेन उत्सर्जन के लिए सबसे बड़ा कारक कृषि क्षेत्र है। उसके बाद तेल और गैस उद्योग का नंबर आता है और इसमें कटौती ही उत्सर्जन को सबसे तेजी से कम करने का जरिया है।

उत्पादन और परिवहन के दौरान अगर तेल और गैस उद्योग में गैस लीक को काबू किया जा सके तो बड़ा असर सामने आ सकता है। संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण संस्थान यूएनईपी ने हाल ही में वैश्विक स्तर पर ‘मीथेन असेसमेंट मंच’ शुरू किया है। यूएनईपी का कहना है कि तेल और प्राकृतिक गैस क्षत्र में मीथेन गैस के उत्सर्जन को 75 फीसद तक कम किया जा सकता है और इसमें से आधी कटौती तो बिना अतिरिक्त खर्च के हो सकती है। यूएनईपी के मुताबिक, मीथेन के उत्सर्जन को 45 फीसद तक कम करने से हर साल 2.55 लाख आकस्मिक मौतें टाली जा सकती हैं।

कम हिस्सा, ज्यादा असर

जलवायु परिवर्तन पर अधिकांश बहस कार्बन डाइआक्साइड में कटौती से जुड़ी है। मीथेन की चर्चा कम होती है। लेकिन इसकी चुनौती बड़ी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 1750 से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में मीथेन का हिस्सा सिर्फ तीन फीसद का है, फिर भी तापमान में 23 फीसद वृद्धि की जिम्मेदार यह गैस है। एक सदी के दौरान एक टन मीथेन में 28 टन कार्बन डाइआक्साइड के बराबर तापमान बढ़ाने की ताकत है। दुनिया हर साल 57 करोड़ टन मीथेन गैस का उत्सर्जन करती है। इंसान इसमें से 69 फीसद के लिए जिम्मेदार हैं।

कृषि क्षेत्र से वैश्विक तापमान उतना ही बढ़ता है जितना कि करीब 79 करोड़ कारों से। इस मामले में दूसरा नंबर आता है जीवाश्म र्इंधन से चलने वाले उद्योगों का। तीसरे नंबर पर है कचरा। जीवाश्म र्इंधन का बुनियादी ढांचा मीथेन का प्रमुख स्रोत है। जर्जर और खराब देखरेख वाले गैस पाइपों के छेदों और दूसरी प्रक्रियाओं से गैस रिसने लगती है। अगर इनका रखरखाव बेहतर होता, तो 1.83 अरब टन कार्बन डाइआक्साइड के बराबर की बचत हो जाती।
वन क्षेत्र का सवाल

वन क्षेत्र अपने आप में भारत के लिए ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं है लेकिन जलवायु सम्मेलन में वन कटाव रोकने पर हुए समझौते में एक धारा ऐसी है जिससे भारत को दिक्कत थी। यह धारा वन क्षेत्र पर आधारित व्यापार को सीमित करती है। पर्यावरण मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, चूंकि हमारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार तेजी से हमारी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बन रहा है, तो जाहिर है कि हम व्यापार पर कोई धारा नहीं चाहते थे।

हम व्यापार का कोई जिक्र तक नहीं चाहते थे क्योंकि हमारा रुख यह है कि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर किसी भी प्रतिबद्धता में व्यापार का जिक्र नहीं होना चाहिए। भारत विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य है और उसका मानना है कि व्यापार से संबंधी कोई भी मसला संगठन के तहत ही सुलटाया जाना चाहिए। ग्लासगो के सीओपी 26 में 2030 तक जंगलों की कटाई पर रोक लगाने का संकल्प, इस साल के जलवायु सम्मेलन में सुर्खियां बटोरने वाला पहला समझौता था।आदिवासी समुदायों का सवाल

प्राथमिक वनों की अधिक क्षति वाले देशों में ब्राजील, कांगो, इंडोनेशिया और पेरू शामिल हैं। ‘वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट’ के मुताबिक अकेले 2020 में करीब एक करोड़ 20 लाख हेक्टेयर पेड़ों वाला इलाका गंवा दिया गया था। एक तिहाई पेड़ उमस भरे उष्णकटिबंधीय प्राथमिक वनों में गायब हुए, जिसकी वजह से सालाना 57 करोड़ कारों के जितना कार्बन उत्सर्जन हुआ था। जंगल, मूल निवासी समुदायों के घर भी हैं और समझौते में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि ऐसे समुदाय वनों के संरक्षक होते हैं।

मूलनिवास मामलों के लिए अंतरराष्ट्रीय कार्यदल के मुताबिक, दुनिया की आबादी का छह फीसद होने के बावजूद, मूलनिवासी समुदाय दुनिया की एक चौथाई भूमि की सुरक्षा करते हैं। इसमें महत्त्वपूर्ण जैव विविधता वाले इलाके भी शामिल हैं। लेकिन ग्लासगो घोषणापत्र में स्थानीय या मूलनिवासी समुदायों के क्षेत्रीय या स्वामित्व अधिकारों के बारे में विशेष रूप से कोई संदर्भ दर्ज नहीं है। वे वनों की कटाई या अन्य गतिविधियों के लिए अपनी जमीनों से बेदखल किए जाते रहे हैं।

क्या कहते हैं जानकार

भारत से हर साल 277 अरब किलो कचरा निकलता है यानी प्रति व्यक्ति करीब 205 किलो कचरा। मीथेन का सबसे बड़ा स्रोत। इसमें से 70 फीसद ही इकट्ठा किया जाता है, बाकी जमीन और पानी में फैला रहता है। कुल कचरे के सिर्फ पांचवें हिस्से का पुनर्चक्रण हो पाता है।

  • सुनील कुमार, प्रमुख वैज्ञानिक, नेशनल इंवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट

अब भी भारत के पूरे कचरा प्रबंधन और पर्यावरण संकट के बहस को देखा जाए तो हम औद्योगिक और नागरिक इलाकों- दोनों ही क्षेत्रों में अन्य देशों से बहुत पीछे हैं। भारत में पर्यावरण संकट के ज्यादातर आंकड़े सही नहीं हैं क्योंकि इन्हें केंद्रीय स्तर पर इकट्ठा नहीं किया गया है।

  • अमिय कुमार साहू, अध्यक्ष, नेशनल सालिड वेस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया।

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From: Jansatta

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