Saturday, November 6, 2021

बिहार में बढ़ सकती है जहरीली शराब से मौतों की संख्या; कांग्रेस नेता का आरोप – सरकारी अफसर ही कराते हैं तस्करी

शराबबंदी वाले बिहार में जहरीली शराब के सेवन करने से मरने वालों का आंकड़ा बढ़कर 38 हो गया है। एक दर्जन से ज्यादा लोग अभी अस्पताल में हैं, इससे संख्या और बढ़ने की आशंका है। जो लोग बच गए हैं, उनकी आंखों की रोशनी जाने का खतरा है। भागलपुर के विधायक और विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता अजित शर्मा ने इन मौतों के लिए सरकार को दोषी ठहराया है। कहा है कि जनता सरकार को कभी माफ नहीं करेगी। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल ने भी शराबबंदी कानून की नए सिरे से समीक्षा कराए जाने की जरूरत बताई है।

अजित शर्मा का कहना है कि बिहार में शराबबंदी के नाम पर लोगों को धोखा दिया जा रहा है। कई सरकारी अफसर दूसरे राज्यों से अवैध रूप से शराब मंगाकर बिकवा रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की कि शराब की कीमतें तीन गुनी कर राजस्व जुटाना चाहिए। और उस कमाई से कारखाने लगा बेरोजगारों को रोजगार दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर बनाई गई शराब जहरीली होती है। राज्य के गांव-देहात में यह खुलेआम बेची जा रही है। उनके मुताबिक इस साल जहरीली शराब पीने से 84 मौतें हो चुकी हैं। सरकारी सूत्रों के मुताबिक अक्तूबर महीने तक 90 मौतें हो चुकी है। इस महीने हुई मौतों की संख्या जोड़ी जाए तो आंकड़ा सवा सौ पार कर गया है। इसी दिवाली पर जहरीली शराब पीने से दो दर्जन से ज्यादा परिवारों में अंधेरा छा गया है। जहरीली शराब का पहला बड़ा मामला शराबबंदी कानून लागू होने के चार महीने बाद अगस्त 2016 में सामने आया था। उस वक्त गोपालगंज ज़िले के खजुरबानी के लोग शिकार हुए थे।

ताजी घटना भी इसी गोपालगंज और पश्चिम चंपारण ज़िले की है। 2016 की घटना के 13 मुजरिमों को पांच साल बाद मार्च 2021 में अदालत से सजा मिल सकी है। इनमें नौ लोगों को फांसी और चार लोगों को उम्रकैद की सजा मिली है।

पांच साल के दौरान जहरीली शराब पीने से बिहार के नौ ज़िलों में मौतें हुई हैं। गोपालगंज, पश्चिम चंपारण, मुजफ्फरपुर, नवादा, सिवान, वैशाली, कैमूर, बेगूसराय,और रोहतास है। ये ज़िले झारखंड, यूपी और नेपाल की सीमा से सटे है। जहां शराब का अवैध कारोबार हो रहा है। शराब माफिया दूसरे राज्यों हरियाणा, झारखंड, यूपी, पश्चिम बंगाल और नेपाल से लाने का तरीका बदलते रहते है।

गैस सिलेंडर, एम्बुलेंस, पेट्रोल-डीजल और दूध ढोने वाले टैंकरों से भारी मात्रा में शराब की बोतलें बरामद हो चुकी है। यहां तक कि ट्रेनों की पैंट्री कारों के जरिए शराब लाई गई और पकड़ी गई है। गांवों में देसी शराब का धंधा फलफूल रहा है। इसकी मिसाल जहरीली शराब से हुई मौतें है।

शराबबंदी कानून बनने के बाद राज्य में चार लाख लीटर से ज्यादा शराब बरामद की गई है। 60 हजार वाहन जब्त हुए है। दो लाख के करीब मामले दर्ज हुए और करीब तीन लाख लोग गिरफ्तार हुए। मगर सजा कुछ सौ लोगों को ही हो सकी है। दिलचस्प बात यह है कि इतने लोग आपातकाल में भी गिरफ्तार नहीं हुए थे। तीन सौ से ज्यादा पुलिस, आबकारी व सरकारी कर्मी बर्खास्त किए जा चुके है। फिर भी शराब की तस्करी जारी है।

इतना ही नहीं हाल में हुए बिहार विधानसभा के उपचुनाव और पंचायत चुनाव में वोटरों को लुभाने के लिए शराब का खूब इस्तेमाल हुआ। पंचायत चुनाव अभी जारी है। गोपालगंज जैसी घटना फिर न हो जाए, इसका आशंका बनी हुई है। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। शराबबंदी की सफलता के लिए लगातार समीक्षा बैठक करते रहे है।

छठ पर्व के बाद फिर समीक्षा करेंगे। इससे पहले प्रमंडलीय आयुक्त, डीआईजी, डीएम, एसएसपी, एसपी स्तर की बैठक कर आलाधिकारी हालात का जायजा लेंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए शराबबंदी की सफलता उनका प्रमुख एजेंडा में से एक है। हालांकि विरोधी दलों और एनडीए के सहयोगी दलों के नेताओं के बयान उन्हें असहज कर रहे है।

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From: Jansatta

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