Sunday, October 3, 2021

सुधार की दरकार

संयुक्त राष्ट्र में सुधार को लेकर ज्यादातर राष्ट्र लंबे समय से आवाज उठाते रहे हैं। लेकिन अब तक इस दिशा में ऐसा कुछ भी होता नहीं दिखा है, जिससे यह संकेत मिलता हो कि बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों में यह निकाय खुद को भी बदलेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना को पचहत्तर साल हो चुके हैं। तब से अब तक दुनिया में बड़े बदलाव आ चुके हैं। विश्वयुद्ध, शीतयुद्ध जैसे भयानक दौरों से दुनिया गुजर चुकी है। महाशक्तियों के मायने और स्वरूप बदल चुके हैं। ऐसे में दुनिया को वैश्विक व्यवस्था में बांधे रखने की जिम्मेदारी निभाने वाले संयुक्त राष्ट्र में सुधार की जरूरत है। मगर हैरानी की बात है कि आज जिन देशों का इस निकाय पर नियंत्रण बना हुआ है, वे सुधार की बात तो करते हैं, पर उस दिशा में कदम बढ़ाने से बचते रहे हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र में सुधार की गाड़ी कैसे बढ़े, यह बड़ा सवाल है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के छिहत्तरवें सत्र के अध्यक्ष अब्दुल्ला शाहिद ने सुरक्षा परिषद में सुधार के मुद्दे पर कदम बढ़ाने की बात कही है।

सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा दरअसल सदस्यता से जुड़ा है। इस वक्त सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन हैं। लेकिन ये देश किसी और देश को स्थायी सदस्य के रूप में घुसने देने को राजी नहीं दिखते। इन देशों को वीटो का अधिकार मिला हुआ है। इसलिए तमाम मुद्दों पर ये देश वीटो के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अहम फैसलों में भी बाधा खड़ी कर देते हैं। इसलिए भी सुरक्षा परिषद का विस्तार एक जटिल मुद्दा बन गया है। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता आया है। वैसे चीन को छोड़ दें तो बाकी स्थायी सदस्य भारत की दावेदारी का समर्थन करते आए हैं। हाल में समूह चार देशों- भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील ने भी इस मुद्दे को उठाया। चारों ही देश दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्तियों में शामिल हैं। इनकी क्षेत्रीय हैसियत भी कम नहीं है। वैश्विक स्तर पर बड़े समूहों में भी शामिल हैं। भारत और ब्राजील ब्रिक्स समूह के सदस्य हैं, जिसमें रूस और चीन भी हैं। जापान और भारत क्वाड देशों के समूह में हैं, जिसकी कमान अमेरिका ने संभाली हुई है। जर्मनी यूरोप की बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है। ऐसे में इन देशों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

आज दुनिया आतंकवाद, गृहयुद्ध, अलगाववादी हिंसा, शरणार्थी समस्या, जलवायु संकट, परमाणु हथियारों की होड़ जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे वक्त में संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक भूमिका बढ़नी स्वाभाविक है। वरना कैसे यह निकाय ज्यादा प्रभावी और प्रासंगिक बन पाएगा? महासभा की हर साल होने वाली बैठकों में सुरक्षा परिषद में सुधार का एजेंडा प्रमुख रूप से छाया रहता है। लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों का रुख इस सुधार में एक बड़ी बाधा के रूप में सामने आता रहा है। आज अमेरिका और चीन के बीच जो टकराव बना हुआ है, उसमें दुनिया फिर से दो ध्रुवों में बंटने लगी है। ऐसे में सुरक्षा परिषद के भीतर सुधार के मुद्दे पर ये देश कैसे बढ़ेंगे, यह बड़ा सवाल है। अगर दुनिया के बड़े देशों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता नहीं मिलती है तो कई देश संयुक्त राष्ट्र जैसा दूसरा समांतर वैश्विक संगठन खड़ा करने से जरा भी नहीं झिझकेंगे। ऐसे में प्रतिस्पर्धा और टकराव और बढ़ेंगे ही।

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From: Jansatta

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