सुभाष मेहरा
कांगड़ा जिले के फतेहपुर हलके की उपचुनावी जंग में सत्ता के साथ भिड़ रहे बेदखल भाजपाई डाक्टर राजन सुशांत का अपनी मातृ पार्टी के साथ जितना भीषण संग्राम होगा कांग्रेस के भवानी सिंह पठानिया का रास्ता उतना ही आसान होगा। भाजपा के संंस्थापक अगुआ और पुराने संघी रहे सुशांत के लिए पार्टी ने चिरकाल से सारे दरवाजे बंद कर रखे हैं लिहाजा आपातकाल में उपजे युवा तुर्क सुशांत अब सौतेले बेटे के रूप में इस उपचुनाव में भाजपा के साथ गिन-गिन कर बदला लेने पर आमादा हैं। भगवा और कांग्रेस जैसे संगठनात्मक दलों से बतौर निर्दलीय जूझ रहे सुशांत की बदौलत दिलचस्प तिकोणे में तब्दील हुए इस मुकाबले में राजन के आक्रमण ने भाजपाइयों को निहत्था बना रखा है।
कांंग्रेस विधायक सुजान सिंह पठानिया के निधन से रिक्त हुए इस हलके में अभी तक सुशांत या पठानिया के एक छत्र वाले राज के बीच ब्राह्मण बनाम राजूपती संघर्ष में दोनो प्रतिद्वंदियों ने अभी तक किसी तीसरे के यहां पैर नही लगने दिए हैं। कह सकते हैं कि फ तेहपुर के नेताओं पर भरोसा करने की बजाय भाजपा ने उधार के प्रत्याशी बलदेव ठाकुर पर दांव खेल कर एक तरह से सुजान सिंह के सियासी वारिस भवानी पठानिया और सुशांत के पैतृक क्षेत्र में बहुत बड़ा जोखिम उठाया है। लिहाजा घूम फि र चुनावी प्रचार का मसला उस सुशांत पर आकर टिक रहा जो इमरजंसी से ठीक पहले मंच पर तत्कालकीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ भिड़ने के बाद चर्चित हो गए थे।
गौरतलब है कि टिकट बंटवारे को लेकर धर्मशाला की चुनाव समिति की बैटक में स्थानीय नेता को मैदान में उतारने के लिए प्रेम कुमार धूमल और रश्मिधर सूद की ओर से इस बाबत कोई फ ार्मूला तय करने का सुझाव आया था। मगर भाजपा आलाकमान के साथ कृपाल परमार की नजदीकियों से खिन्न खाने वालों ने धूमल व रश्मि की राय को दरकिनार कर दिया और चार बरसों से फ तेहपुर के लोगों का सुख-दुख बांट रहे परमार को घर बिठाकर टिकट पड़ोस के जवाली से बलदेव को परोस दिया। नतीजतन पेंशन बहाली, पोंग विस्थापित मसले के साथ स्थानीय मुद्दों को लेकर गुजरे सात महीनों से घर से बैरागी होकर धरना चला रहे एक तरफ सुशांत तो दूसरी ओर ठेठ पहाड़ी बोली के अंदाज वोट मांगने की भवानी की कला ने भाजपा नेताओं की नींद उड़ा रखी है।
सनद रहे विधानसभा के 2017 के चुनाव में भी जब सुशांत का भाजपाई राजनीतिक वनवास नही टूटा तो नए उम्मीदवार के बावूजद कांग्रेस के सुजान सिंह के साथ सीधे मुकाबले में परमार के लिए यह सीट महज 1294 वोट से छूटी थी जब पार्टी से विद्रोही हुए बलदेव मैदान में डट गए थे। अब कहा यह जा रहा है कि उपचुनावी टिकट के मामले में धरती दिखाने के बाद परमार की सियासी हसरतों की बलि ले ली और पिछली बगावत के सरदार को भाजपा ने तोहफ ा दे दिया।
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From: Jansatta
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