इंटरनेट के जमाने में किस्सागोई की विधा और परंपरा प्रस्तुति के खास अंदाज के साथ पूरी दुनिया में नए सिरे से लोकप्रिय हो रही है। यह लोकप्रियता इस बात को साबित करती है कि किस्सों के साथ जुड़े रहने की हमारी प्रवृत्ति सहज तो है ही, पारंपरिक भी है। अच्छी बात यह है कि अलग-अलग दौर में लेखकों ने इस पारंपरिकता के साथ कुछ यादगार प्रयोग किए हैं। ऐसा ही कालजयी प्रयोग किया है आरके नारायण ने। भारतीय गांव के यथार्थ को उन्होंने अपनी कल्पना में ऐसा बुना-बसाया कि उससे जुड़ी कहानियों को लोग आज भी याद करते हैं। ऐसा करते हुए नारायण ने जहां गांव को शहर और कस्बे के बीच की शक्ल दी, वहीं ग्रामीण सामाजिकता में आम आदमी से जुड़े नए-पुराने जीवन मूल्यों के द्वंद्व को बखूबी स्थान दिया।
उनका जन्म 10 अक्तूबर, 1906 को मद्रास में हुआ था। उनका पूरा नाम रासीपुरम कृष्णास्वामी नारायणस्वामी है। उनके पिता तमिल भाषा के शिक्षक थे। नारायण ने 1930 में अपनी शिक्षा पूरी कर ली थी। इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक शिक्षण कार्य किया, लेकिन जल्द ही वे पूरी तरह से लेखन में जुट गए। उन्होंने अपना लेखन अंग्रेजी में शुरू किया और यह निर्णय आगे भी बना रहा। उनका पहला उपन्यास ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ 1935 में आया। यह उपन्यास एक स्कूली लड़के स्वामीनाथन के स्कूली जीवन की बेहद मनोरंजक घटनाओं पर आधारित है।
इसके बाद 1937 में उनका ‘द बैचलर ऑफ आर्ट्स’ उपन्यास प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने एक संवेदनशील युवक चंदन के माध्यम से उसकी पढ़ाई, प्रेम और विवाह संबंधी पश्चिमी विचारों को अपने सामाजिक ढांचे के बीच उठते सवालों में दर्शाया। उपन्यासों का यह सिलसिला आगे भी बना रहा। अच्छी बात यह रही कि अपने प्रयोगधर्मी लेखन के लिए नारायण ने एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार किया, जिन्हें उनका लिखा भाता था, जिन्हें उनकी नई किताब का इंतजार रहता था। द डार्क रूम, द इंग्लिश टीचर, मिस्टर संपथ, द फाइनेंशियल एक्सपर्ट, वेटिंग फार द महात्मा, द गाइड, द मैन इटर आफ मालगुडी, द वेंडर आफ स्वीट्स, द पेंटर आफ साइंस, द वर्ल्ड आफ नागराज आदि उनके ऐसे ही उपन्यास हैं।
नारायण ने कई निबंध भी लिखे हैं। इनमें प्रमुख हैं- नेक्स्ट संडे, रिलक्टेंट गुरु, द वर्ल्ड आफ स्टोरीटेलर आदि। मालगुडी डेज, अ हार्स एंड गोट्स एंड अदर स्टोरीज, अंडर द बैनियन ट्री एंड अदर स्टोरीज जैसे उनके कहानी संग्रहों को भी लोगों ने हाथोंहाथ लिया। नारायण ने अपने कथा शिल्प में कल्पना का नए सिरे से जरूर विनियोग किया पर वे यह बात बखूबी समझते थे कि भारतीय लोक चेतना की निर्मिति में पौराणिक कथाओं की बड़ी भूमिका है। इसलिए उन्होंने काफी मेहनत से रामायण और महाभारत का संक्षिप्त आधुनिक गद्य संस्करण तैयार किया।
नारायण ने आमतौर पर मानवीय पहलुओं पर दैनिक जीवन में घटित घटनाओं का चित्रण किया हैं, जिसमें एक तरफ शहरी जीवन और पुरानी परंपराओं का टकराव है तो वहीं दूसरी तरफ आधुनिक भारतीय समाज की मनोरचना को देखने-समझने की दृष्टि है। शालीन भाषा में सुसंस्कृत हास्य बोध और दिलचस्प संदर्भों के रेखांकन की उनकी शैली काफी सम्मोहक है।
‘मालगुडी डेज’ पर बने दूरदर्शन धारावाहिक की बात हो कि ‘द गाइड’ पर बनी फिल्म की, नारायण हर कहीं सराहे गए। वे 1964 में पद्म भूषण और 2000 में पद्म विभूषण से सम्मानित किए गए। इससे पहले उपन्यास ‘द गाइड’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका था। साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। वे सोसायटी आफ लिटरेचर के फेलो और अमेरिकन एकेडमी आफ आर्ट्स एंड लेटर्स के मानद सदस्य भी रहे।
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From: Jansatta
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