Friday, October 15, 2021

कश्मीर कथा

नम-दीदा हैं मासूम सी कश्मीर की आंखें
हसरत से उन्हें तकती हैं तदबीर की आंखें
-सईद नजर
आजादी के बाद से ही हिंदुस्तान की सियासत में कश्मीर के मसले को दिल्ली दरबार ने अपने फायदे के हिसाब से हल करना चाहा। भाजपा ने कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटाने का मजबूत फैसला किया भी तो उसे हिंदी पट्टी में वोट मांगने का राजनीतिक रोमांच बना कर पेश कर दिया। कश्मीर जब ऐतिहासिक बदलाव के दौर में था तो हिंदी पट्टी के ऐसे नेता को वहां का प्रतिनिधि बना कर भेजा, जिन्हें कश्मीर की जमीन पर काम करने का कोई अनुभव नहीं था। अपने राजनीतिक रोमांच में केंद्र ने कश्मीर को उसकी स्थानीयता से ही काट देना चाहा। कश्मीर में राजनीतिक इच्छाशक्ति से ज्यादा राजनीतिक रोमांच की इस किश्त पर
बेबाक बोल।

ये जो हालात में आप मुझसे ये सवाल पूछ रहे हैं न इसका जवाब देने से सब डरेंगे। उस महकमे में भी इनटालरेंसी हो गई है अब। आपको लगता है कि ये सवाल पूछने की जरूरत है कि ये फेलियर है। दिनदहाड़े किसी स्कूल में जाकर दो टीचरों की हत्या होती हैं। बिंदरू की लोकेशन आपको पता है। ये सबको पता है कि दो-तीन हफ्ते से केमिस्ट को लक्ष्य बनाया गया है। आपको कहीं पुलिस की विजिबल लोकेशन दिखी’।

कश्मीर में हुई हत्याएं क्या प्रशासनिक नाकामी है, मीडिया के इस सवाल पर श्रीनगर नगर निगम के मेयर, जुनैद अजीम मट्टू कहते हैं, ‘क्या आपको ये सवाल पूछने की जरूरत है?’ बीते अगस्त में अन्य के साथ हिंदी पट्टी के राजनीतिक हलकों से जुड़े लोगों ने मंदिर और कश्मीर मसले पर सफलता की दिवाली अयोध्या में मनाई थी। ये दिवाली उस कश्मीर के लिए मनाई गई जहां आधुनिक दुनिया के इतिहास में सबसे बड़ी इंटरनेट बंदी रही।

कश्मीर आजाद भारत के पहले और बाद, दोनों समय का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। इस संवेदनशील भूगोल को हमेशा राजनीतिक असंवेदनशीलता से ही हल करने की कोशिश की गई। आजादी के बाद की सरकारों ने कश्मीर को प्रयोगशाला की तरह ही माना है। केंद्रशासित प्रदेश बनने के बावजूद उसके राजभवन को सेवानिवृत्त राजनीतिज्ञों के पुनर्वास केंद्र की तरह ही देखा गया।

2019 में भाजपा की प्रचंड लहर में पार्टी के जिन चेहरों को जनता ने नकार दिया था, उनमें मनोज सिन्हा भी थे। जो नेता अपनी सीट भी नहीं बचा सके थे केंद्र सरकार ने उन्हें कश्मीर का उप राज्यपाल बना कर भेज दिया। कश्मीर में मनोज सिन्हा की नियुक्ति से ही अंदाजा लग गया था कि संसद में अनुच्छेद-370 के खात्मे जैसे मजबूत फैसले करने वाली सरकार आगे वादी में इतनी मजबूती नहीं दिखा पाएगी।

यह अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता है कि मनोज सिन्हा को कश्मीर के बारे में उतना ही मालूम है, जितना एक आम भारतीय पर्यटक के रूप में जानता है। कश्मीर से दूर आम भारतीयों की मानसिकता तभी पता चली थी जब 370 के खात्मे के बाद लोग वहां से गोरी दुलहन लाने के ख्वाहिशमंद हुए थे। बिहार के नेता एलान कर रहे थे कि वे डल झील के किनारे छठ पूजा करेंगे।

यह दूसरी बात है कि सोशल मीडिया पर तैरती तस्वीरों में वे अपने बिहार के घर की छत पर मन चंगा तो कठौती में गंगा का भाव लिए ही छठ पूजा कर रहे थे। लगा था कि हिंदी पट्टी के सारे लोग कश्मीर जाकर जमीन खरीद लेंगे और वहां का पूरा माहौल ही बदल जाएगा। लेकिन संसद में अगस्त, 2021 में दिए एक सवाल के जवाब में सरकार ने माना कि 370 के खात्मे के बाद कश्मीर में सिर्फ दो बाहरी लोगों ने जमीन खरीदी है।

मनोज सिन्हा को अब तक पता चल गया होगा कि कश्मीर यश चोपड़ा की रोमानी फिल्मों से बिल्कुल अलग है। केसर, डल झील, कालीन और लाल चौक की दुकानों के अलावा कश्मीर क्या है इसका जवाब अभी भी सिन्हा के पास नहीं होगा। अपने दो कार्यकाल में भाजपा ने कश्मीर को राजनीतिक रोमांच की तरह लिया।

यूरोपीय सांसदों के भ्रमण से लेकर मनोज सिन्हा तक के राजनीतिक भ्रमण से यही साबित होता है। लेकिन कश्मीर को लेकर जो आपका राजनीतिक रोमांच है कि हम ऐसा ठीक कर देंगे, वो नेता जाकर वैसा ठीक कर देगा, इसका खमियाजा किसको भुगतना पड़ता है? इसका राजनीतिक हर्जाना भुगतती है वो सतिंदर कौर जो अपनी आधी तनख्वाह गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए देती है।

वो एक मुसलमान बच्चे को गोद लेती हैं। बच्चा अपने धर्म से दूर न हो जाए इसलिए उसे तब तक एक मुसलिम परिवार के संरक्षण में दे दिया, जब तक कि वे वयस्क न हो जाए। इसका खमियाजा उस कश्मीरी पंडित को भुगतना पड़ता है जो 1990 में सीना ताने बैठ कर कह रहा था, ये मेरा कश्मीर है, मैं नहीं भागूंगा।

आज उसे गोलियों से भून दिया जाता है। जुनैद अजीम मट्टू कहते हैं-निहत्थी लड़की जो स्कूल तालीम फराम करने जा रही है हमारे बच्चों को उस बच्ची को कोई मारे, माशरे से गुजारिश रहेगी कि इखलाकी फर्ज बनता है कि हम बाहर आएं। माखनलाल बिंदरू ने क्या बिगाड़ा है किसी का, वीरेंद्र पासवान गोलगप्पे वाले ने क्या बिगाड़ा है।

ये जो सिख समुदाय है इसने अपने कश्मीरी मुसलमान भाई का हाथ तब थामे रखा जब हालात ऐसे थे कि लोग सोचते थे कि ये यहां पर कायम कैसे हैं। भाजपा अपने राजनीतिक रोमांच का हाल बंगाल में देख चुकी है, जहां उसने हिंदी पट्टी से ऊर्जा लेकर जय श्रीराम के नारे से ही चुनावी मंच लूटना चाहा था। लेकिन ममता बनर्जी के चंडी-पाठ ने साबित कर दिया कि भाजपा को अभी राजनीतिक ट्यूशन की खासी जरूरत है।

भारत का भूगोल ऐसा है कि आप कश्मीर को उत्तर प्रदेश की तरह नहीं देख सकते हैं। ऐसा करने का नतीजा यह हुआ है कि आप पर उत्तर प्रदेश को नया कश्मीर बनाने के आरोप लग रहे हैं जहां किसी हादसे के बाद विपक्ष के नेताओं के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी जाती है। इस तरह के रुख को राजनीतिक इच्छाशक्ति तो नहीं ही माना जा सकता है, क्योंकि आलोचनाओं के बाद लोकतांत्रिक चेहरा बचाने के लिए आपको पलटना पड़ता है।

किसी भी अशांत प्रदेश को दुरुस्त करने के लिए सरकार को कैसे मजबूत कदम उठाने पड़ते हैं इसके लिए इतिहास का पन्ना पलटा जा सकता है। जिस पंजाब ने आज भाजपा को इतना परेशान कर रखा है, वह उसी पंजाब से राजनीतिक इच्छाशक्ति का ककहरा पढ़ सकती है। जिन्हें पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया गया था उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति थी पंजाब से आतंकवाद खत्म करने की।

जब तक पंजाब में राष्ट्रपति शासन रहा, वह अशांत रहा। अंतत: पंजाब को ठीक किया बेअंत सिंह ने। बेअंत सिंह की हत्या इसलिए की गई क्योंकि उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति को किसी भी तरह से कमजोर नहीं किया जा सका था।

आप सिर्फ प्रशासनिक दबाव और कथित बदलाव के लकदक से कश्मीर के मसले को नहीं सुलझा सकते हैं। आपने दावा कर दिया कि वादी में आतंकवाद खत्म हो गया। लेकिन नए कश्मीर में जो हत्या करने के लिए निकले हैं उनकी पहचान तो अभी आतंकवादी के तौर पर हुई ही नहीं थी।

वे अभी आतंकवादी संगठनों के संपर्क में आए हैं जिन्हें जांचने के लिए भेजा गया है कि कितनी दहशत फैला सकते हैं। आपने कश्मीर की समस्या को तात्कालिक और एकांगी नजरिए से देखा। जैसे, आतंकवाद की समस्या सिर्फ आतंकवादियों द्वारा पैदा की जाती है। आपने वहां के असंतोष को सम्मिलित किए बिना, वहां की पूरी स्थानीयता को खारिज किया।

कश्मीर में मौजूद पहले से सब कुछ को भ्रष्ट और दलाल बताकर आपको लगा कि राष्ट्रपति शासन के जरिए आप उसे पूरे देश से जोड़ देंगे। आरोपित शांति ज्यादा दिनों तक नहीं चली। कश्मीरी पंडित बनाम घाटी के मुसलमान की हिंदी पट्टी वाली राजनीति का क्या हुआ? कितने लोगों को वहां बसाया गया।

इस समय कश्मीर के रणनीतिकारों को एक बार फिर सोचना पड़ेगा। कहां हुआ वह निवेश जिसके बारे में बड़ी-बड़ी बातें की जा रही थी। स्थानीय सेवाओं से जुड़े लोग विभिन्न बहानों से इस्तीफे दे रहे हैं। विकास की कोई नीति वहां की स्थानीयता को समझे और वहां के जनप्रतिनिधियों को सहभागी बनाए बिना नहीं हो सकती। वहां अलगाववादी ताकतें अब भी हर तरफ मौजूद हैं।

आप कश्मीर में इतिहास रचने की दिवाली मना चुके हैं। आपको वहां का हिसाब देना ही होगा, आपसे सवाल पूछे ही जाएंगे। बेहतर है कि अब आप राजनीतिक रोमांच को छोड़ कर राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ काम करें। हर जगह नायक बनने की हड़बड़ी कहीं आपको इतिहास की खलनायकी के खाते में न डाल दे।

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From: Jansatta

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