Sunday, October 17, 2021

सशक्त महिला सरपंच

सरकार महिलाओं को हर संभव मदद कर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। गांवों में उनके अपने दम पर काम कर आगे बढ़ने का हौसला है। आंगनबाड़ी केंद्र, गांव सरपंच और आशा सहयोगिनी के क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व कायम है। गांवों में निरक्षर महिला सरपंच अपने दम पर लोगों की समस्याओं का निराकरण कर रही हैं। बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां त्रिस्तरीय पंचायती राज में पचास फीसद आरक्षण है। नीतीश सरकार की महिलाओं के लिए बहुत बड़ी भेंट है। महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। इस आरक्षण ने महिलाओं को घर की दहलीज के पार एक विस्तृत फलक दिया है। जहां वे चूल्हा-चौके से अलग अपनी सशक्त क्षमताओं से समाज से रूबरू हो रही हैं।

कई राज्यों में महिला सरपंच के पति और भाई पंचायत की जिम्मेदारी उठाते थे। अब सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। अगर महिला सरपंच है, तो वह स्वयं फोन उठाएगी और जवाब देगी। आज निरक्षर महिला भी अपनी समझ से जवाब देती है। पहले बैठकों से लेकर पंचायत तक सारे निर्णय इनके पतियों द्वारा ही लिए जाते थे, अब स्वयं महिला सरपंच लेती है। इससे यह बदलाव देखने में आया है कि महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है। अब वे पुरुष नौकरशाहों के साथ भी मुखर होकर संवाद करती हैं। स्वयं सहायता समूह के जरिए समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। देश में अन्य सरकारें भी पंचायत में आरक्षण बढ़ा कर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करें, ताकि महिलाओं में आत्मविश्वास का संचार हो।
’कांतिलाल मांडोत, सूरत

धन की होड़

वर्तमान भौतिकवादी युग में धनप्राप्ति की महत्त्वाकांक्षा की भागमभाग में पारिवारिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों को विस्मृत कर मानवीय आदर्शों का छीजना चिंताजनक है। यह सही है कि धनप्राप्ति से ही परिवार का भरण-पोषण संभव है और आवश्यक वस्तुओं को पाने हेतु धन ही मूल है। पर आवश्यकता से अधिक धन संचय की प्रवृत्ति के फलस्वरूप स्वार्थवश व्यक्तिवादिता का जन्म होता है। ज्यों-ज्यों यह प्रवृत्ति बढ़ती है त्यों-त्यों व्यक्ति की अपने परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय सद्भावना और कल्याण से उन्मुखता क्षीण होती चली जाती है।

आज उद्योगपति, व्यापारी, धन्नासेठ, नौकरशाह, राजनीतिज्ञ आदि हर वर्ग धन-लिप्सा में रत है, फिर चाहे उसके साधन अनैतिक ही क्यों न हों? धन कमाने की होड़ में आज मानव मानव से दूर होता जा रहा है। संतुलित आहार, सुरक्षित आवास और वस्त्रों के लिए धन की आवश्यकता समझ में आती है, पर उसी को सब कुछ मान कर अपनी मनुष्यता, जीवन-मूल्यों, आदर्शों, अपने धर्म, सिद्धांतों आदि को दांव पर लगा देना कहां की बुद्धिमत्ता है?
’नीरज मानिकटाहला, यमुनानगर, हरियाणा

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From: Jansatta

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