Thursday, October 14, 2021

जलियांवाला बाग पर महात्मा गांधी के प्रपौत्र और वीर सावरकर के पौत्र आए आमने-सामने, जमकर हुई बहस

जलियांवाला बाग के मुद्दे पर महात्मा गांधी के प्रपौत्र और वीर सावरकर के पौत्र के बीच काफी बहस हुई है। वीर सावरकर के पौत्र रंजीत सावरकर ने कहा कि 1919 में जब अमृतसर का जलियांबाला बाग कांड हुआ, उसके बाद गांधीजी ने सत्याग्रह वापस लिया और ब्रिटिश हुकूमत से माफी मांगी और कहा भारतीय लोगों ने गुजरात दंगों के दौरान शर्मनाक काम किया। इस कांड में कुछ ब्रिटिश सैनिक मारे गए थे।

न्यूज चैनल आज तक पर हुई इस डिबेट में महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने कहा कि झूठ मत बोलिए, वह जलियांवाला बाग नहीं था, वो चौरी-चौरा में हिंसा हुई थी।

रंजीत सावरकर ने कहा कि सभी क्रांतिकारी 1918 से 1921 के बीच छोड़े गए, केवल सावरकर को 1924 में छोड़ा गया, तो सावरकर को क्या फायदा हुआ, उन्हें तो 27 साल के लिए बंद करके रखा गया।

इस पर तुषार गांधी ने कहा कि रंजीत, गांधी द्वारा ब्रिटिश से माफी मांगने की जो बात कह रहे हैं और आंदोलन वापस लेने की बात कह रहे हैं, वह इतिहास में यूपी के चौरी-चौरा का मामला है। यूपी के एक गांव चौरी-चौरा में भीड़ ने पुलिसकर्मियों को पुलिस चौकी में जलाकर मार दिया था। जब ये घटना बापू को पता लगी थी तो उन्हें सदमा लगा था और उसे उन्होंने शर्मनाक बताया था और इस घटना की वजह से बापू ने आंदोलन वापस लिया था।

तुषार गांधी ने कहा कि अगर आप इतिहास पढ़ सकते हैं तो जरूर पढ़िएगा, ये चौरी-चौरा की बात थी, जलियांवाला बाग की बात नहीं थी।

बता दें कि इन दिनों वीर सावरकर को लेकर देश में फिर से बहस छिड़ी हुई है। दरअसल एक कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि सावरकर ने महात्मा गांधी के कहने पर अंग्रेजों के सामने दया याचिका लिखी थी।

उनके इस बयान के बाद सियासी गलियारों में बयानबाजी होने लगी थी। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि अगर इसी तरह चलता रहा तो एक दिन ये लोग महात्मा गांधी को हटाकर सावरकर को राष्ट्रपिता बना देंगे।

ओवैसी के इस बयान पर वीर सावरकर के पोते रंजीत सावरकर ने कहा था कि भारत जैसे देश का एक ही राष्ट्रपिता नहीं हो सकता। स्वतंत्रता की लड़ाई में हजारों ऐसे लोग हैं जिन्हें भुला दिया गया है।

रंजीत सावरकर ने कहा कि ‘राष्ट्रपिता’ की अवधारणा उन्हें स्वीकार्य नहीं है। कोई मांग नहीं कर रहा है कि वीर सावरकर को ‘राष्ट्रपिता’ कहा जाए क्योंकि यह अवधारणा स्वयं स्वीकार्य नहीं।”

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From: Jansatta

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