पर्यावरण एवं जैवविविधता संरक्षण के सन्दर्भ में वर्तमान समय “भारतीय वन्यजीव सप्ताह” का चल रहा है। वन्यजीव सप्ताह भारत में प्रतिवर्ष अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में मनाया जाता है। वन्यजीव सप्ताह मनाने का प्रमुख उद्देश्य भारतीय वन्यजीवों, पक्षियों, सरीसृपों, स्तनधारियों आदि प्राणियों की जैवविविधता एवं उनके प्राकृतिक पर्यावास को संरक्षित करना तथा जैवविविधता के प्राकृतिक महत्व के प्रति लोगों को जागरूक करना है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि धरती ग्रह पर जीवन का उद्विकास पर्यावरण के अनुकूल ऐसे माहौल में हुआ है जिसमें जल, जंगल, जमीन और जीव-जंतु सभी आपस में एक-दूसरे से परस्पर जुड़े हुए हैं। प्रकृति ने धरती से लेकर वायुमंडल तक विस्तृत जैवविविधता को इतनी खूबसूरती से विकसित एवं संचालित किया है कि यदि उसमें से एक भी प्रजाति का वजूद खतरे में पड़ जाये तो सम्पूर्ण जीव-जगत का संतुलन बिगड़ जाता है। सृष्टि में मानव सहित समस्त जीव-जंतुओं का वजूद परस्पर एक दूसरे के सह-अस्तित्व पर टिका हुआ है।
वन्यजीवों एवं पक्षियों का प्राकृतिक जैवविविधता के संचालन तथा हमारे प्रकृति-ज्ञान के सन्दर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान है। पक्षियों के आहार जुटाने, नीड़ बनाने, शिकार करने जैसी विभिन्न गतिविधियों को निरन्तर देखकर हमें प्राकृतिक घटनाओं के बारे में अनुभवजन्य ज्ञान मिलता है। पक्षी, पौधे, कीट-पतंगे पर्यावरण के मूल संकेतक हैं। जैसे जैसे तापमान व जलवायु में मौसम के अनुसार परिवर्तन होता है पक्षियों, स्तनधारियों, कीट-पतंगों की जैविकीय गतिविधियां बदलती रहती है अतः उनके बायोलॉजिकल बदलाव हमें बारिश, आंधी, शरद-ग्रीष्म ऋतु आदि प्राकृतिक नियमबद्ध घटनाओं का अनुभवजन्य ज्ञान देते रहते हैं। मेंढक, चींटियां, गिरगिट, चातक अपनी जैविक गतिविधियों से हमें मानसून के बारे में ज्ञान देते हैं। खंजन पक्षी शीत ऋतु के आगमन की जानकारी देतें हैं। कास फूलने से वर्षा ऋतु के समापन का आभास होता है। हर वन्यजीव और वनस्पतियाँ मानव-प्रजातियों को अपने कुदरती हुनर से कुछ ना कुछ सीख हमेशा देते रहते हैं।
प्रकृति में स्वपोषी, शाकाहारी, मांसभक्षी, सर्वाहारी आदि अनेकों जीवधारियों के मध्य स्थापित खाद्य श्रृंखला जैवविविधता के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बाज, शिकरा, चील आदि पक्षी तथा रैट स्नेक (धामन), सैन्ड बोआ आदि सांप चूहों और कीट-पतंगों का भक्षण कर हमारी फसलों की सुरक्षा करते हैं। पैंगोलिन नामक जीव दीमकों एवं चींटियों की आबादी का नियंत्रण कर जैवविविधता के संतुलित संचालन में सहायक होता है। मेंढक जैसा उभयचर प्राणी मच्छरों को खाकर मलेरिया रोग के प्रकोप को कम करता है। प्रकृति में चहुंओर विस्तृत जैवविविधता से ही पृथ्वी ग्रह पर जीवन का अस्तित्व कायम है।
आज आधुनिकीकरण की दौड़ में मानव-सभ्यताओं ने जंगल, आर्द्रभूमि जैसे प्राकृतिक परिस्थितिकी तंत्र को उजाड़ कर स्वयं के वजूद पर संकट खड़ा कर दिया है। वन्यजीव सप्ताह कागजों पर नहीं सफल होगा बल्कि हमें वन्यजीव एवं जैवविविधता के प्राकृतिक महत्व को स्वयं के अस्तित्व से जोड़कर देखना होगा। वन्यजीव संरक्षण तभी संभव होगा जब हम पक्षियों, सरीसृपों, वनस्पतियों की सही पहचान कर उनके पारिस्थितिकीय महत्व को समझेंगे। हमें खुद वन्यजीव और प्रकृति के बारे में जूलाजी, बाटनी आदि बिषयों का अध्ययन कर उनके फूड चैन एवं बायोलॉजिकल महत्व को जानना चाहिए।
जब तक लोग Black drongo (कोतवाल) को कोयल तथा Hoopoe (हुदहुद) को कठफोड़वा समझते रहेंगे वो पक्षियों के वास्तविक ज्ञान तथा उनकी पहचान में असमर्थ रहेंगे। जब तक हम कामन सैन्ड बोआ जैसे विषहीन सर्प को अज्ञानता वश रसेल वाइपर समझकर मारते रहेंगे हम जैवविविधता को बचाने में अक्षम रहेंगे। जब हम अंधविश्वासों में पड़कर उल्लू जैसे शानदार परिंदों की बलि देंगे और उनका शिकार करेंगे तब तक हम बायोडायवर्सिटी का विनाश कर चुके होंगे। जब तक हम बाघ, चीता, तेंदुआ, जगुआर, शेर के बीच के अन्तर को नहीं समझेंगे हम वन्यजीव संरक्षण अधिनियम को व्यावहारिक रूप नहीं दे सकेंगे। आप केवल दो-चार पेड़ ही लगा दीजिए जैवविविधता फलती-फूलती रहेगी, आक्सीजन मिलती रहेगी। सबसे महत्वपूर्ण है स्वयं प्रकृति का अध्ययन कर खुद को जागरूक करना।
मानव प्रजातियां अपने अस्तित्व को तभी कायम रख सकती हैं जब वो प्रकृति और जैवविविधता के सह-अस्तित्व को समझे। कंक्रीट के बढ़ते जंगल, विलासितापूर्ण भौतिक जीवनशैली नहीं बल्कि प्राकृतिक जीवनशैली ही मानव-प्रजातियों के सर्वाइवल का आधार है। इस ग्रह पर बचेगा वही जो पर्यावरण से तालमेल बना लेगा, यही जैविक उद्विकास का नेचुरल नियम है! यही जंगल, नदियां, वन्यजीव, परिन्दे एवं वनस्पतियाँ ही प्रकृति में जीवन के संचालन का आधार है।
हरेन्द्र श्रीवास्तव (पर्यावरण एक्टिविस्ट) प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।
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