छोटी उम्र में लड़कियों की शादी कर देना, जबकि उनका शारीरिक और मानसिक विकास ठीक से न हुआ हो, और इस प्रकार के जिम्मेदारियों को बोझ डाल देना, किसी भी रूप में उचित नहीं। भारत एक तरफ तो विश्वगुरु बनना चाहता है, पर दूरी तरफ बाल विवाह जैसी कुरीतियों से मुक्त नहीं हो पा रहा। बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006 के अनुसार अठारह वर्ष से कम आयु की लड़की और इक्कीस वर्ष से कम आयु के लड़के का विवाह, बाल विवाह की श्रेणी में आता है। इस अधिनियम में बाल विवाह पर रोक लगाने, पीड़ितों को राहत देने और सजा का प्रावधान किए गए हैं।
बाल विवाह न सिर्फ बच्चों के अधिकारों का हनन करता, बल्कि इससे हिंसा, शोषण और यौन शोषण का खतरा भी रहता है। बाल विवाह के कई कारण हैं, जिनमें शिक्षा का अभाव, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, गरीबी प्रमुख हैं। माता-पिता का बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहना भी एक कारण है क्योंकि शायद अभी हम अपने आसपास वह वातावरण नहीं दे पाए हैं, जिसमें बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार पश्चिम बंगाल, बिहार, राजस्थान और आंध्र प्रदेश शीर्ष राज्यों की श्रेणी में आते हैं, जहां बाल विवाह तीस से लेकर पैंतालीस प्रतिशत तक है। हालांकि उत्तर प्रदेश में अभी ये आंकड़े छह प्रतिशत के आसपास हैं। भारत की बात करें, तो विश्व में भारत का बाल विवाह में दूसरा स्थान है, जिसमें ग्रामीण भारत चौदह प्रतिशत और शहरी भारत का आंकड़ा सात प्रतिशत है। बाल विवाह सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों में होता है।
आज इस प्रथा को रोकने के उपाय होने चाहिए। जागरूकता लाने में मीडिया की प्रमुख भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। गरीबी का उन्मूलन हो। इसके लिए एक समिति का गठन करके जमीनी स्तर पर जांच हो, शिकायत पेटी हो, टोल फ्री नंबर पर शिकायत करने की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। इसकी सूचना प्रशासन तक पहुंचाने में समाज को भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी पड़ेगी।
’अभिषेक पाल, बस्ती, उत्तर प्रदेश
योजना का हासिल
भारत ने वर्ष 2016 के पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2030 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 33.35 तक कम करने और 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विकसित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। भारत बहुप्रतीक्षित शुद्ध शून्य योजना का पालन करने के बजाय हरित ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए तात्कालिक लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करेगा। भारत समान, पर विभेदित उत्तरदायित्व के सिद्धांत में विश्वास करता है, जिसके अनुसार विकसित देशों को अपने उत्सर्जन में भारी कमी लाने के लिए पहला कदम उठाना चाहिए।
हाल ही में थिंक टैंक काउंसिल फार एनर्जी एनवायर्नमेंट एंड वाटर प्रोजेक्सट्स द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार भारत को वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य लक्ष्य हासिल करने के लिए, विशेष रूप से बिजली उत्पादन हेतु कोयले के उपयोग को वर्ष 2040 तक चरम स्तर तक पहुंचाना है। ऊर्जा दक्षता और जलवायु परिवर्तन के न्यूनीकरण की दिशा में कार्य करना, नवीकरणीय ऊर्जा, जलविद्युत, परमाणु और बायोएनर्जी जैसे कम कार्बन ऊर्जा स्रोतों के प्रतिस्थापन के माध्यम से जीवाश्म ईंधन में कमी करना है।
’समराज चौहान, कार्बी आंग्लांग, असम
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