Monday, October 18, 2021

कश्मीर में लक्षित हत्याएं: सामान्य होते हालात कैसे बदल गए

जम्मू-कश्मीर में कुछ दिनों से प्रवासी मजदूरों और बाहरी लोगों पर आतंकी हमले बढ़ गए हैं। आतंकवादी चुन-चुन कर हत्याएं कर रहे हैं। कश्मीर में पांच अक्तूबर के बाद से पांच प्रवासियों की हत्या हो चुकी है। इससे लोगों में दहशत है। प्रवासी मजदूर डरे हुए हैं और उन लोगों का जम्मू-कश्मीर से पलायन शुरू हो गया है। हालांकि सामान्य तौर पर सैकड़ों मजदूर सर्दियां शुरू होने और दीपावली के त्योहार पर अपने घर लौटते हैं, अब राज्य में हिंसा बढ़ जाने से वे पहले ही वहां से निकलने की कोशिश में है। हत्याएं ऐसे समय में हुई हैं, जब कश्मीर में राजनेता भाजपा सरकार पर कश्मीर के बारे में शांति के झूठे आख्यान बनाने का आरोप लगा रहे हैं। पीपुल्स अलायंस फार गुपकर घोषणापत्र ने अपने बयान में कहा है कि शांति की भाजपा की कहानी में कोई सच्चाई नहीं है। हिंसा के ताजा दौर से यह साबित हो गया है। हिंसा की वजहों को लेकर एक तर्क में अफगानिस्तान के घटनाक्रमों की बात उठाई जा रही है। कहा जा रहा है कि कुछ स्थानीय लोगों की सहायता से यह आतंकी संगठन यहां प्रवेश करते हैं। अफगानिस्तान में तालिबान का राज होने के बाद से पाकिस्तान हताशा में है। इसलिए वह कश्मीर में दहशतगर्दी बढ़ाने में जुटा है।
प्रवासी मजदूरों पर निर्भरता
जम्मू-कश्मीर में चल रही परियोजनाओं में 90 फीसद से ज्यादा प्रवासी मजदूर निर्माण उद्योग में जुटे हुए हैं। कश्मीर घाटी में पांच लाख प्रवासी मजदूर हैं। जम्मू-कश्मीर में बाहर से तीन-से चार लाख मजदूर हर साल काम के लिए घाटी जाते हैं। उनमें से अधिकांश सर्दियों की शुरुआत से पहले चले जाते हैं, जबकि कुछ साल भर वहीं रह जाते हैं। वहां के लगभग हर जिले में बिहार और यूपी से आए मजदूर हैं। सेब का मौसम होने के कारण भी राज्य इन दिनों बाहरी मजदूरों से अटा है। लगभग 41,000 मजदूर संगठित और असंगठित क्षेत्रों की लगभग 4,800 औद्योगिक इकाइयों में काम कर रहे हैं। पूर्णबंदी के दौर में लगभग 56 हजार मजदूर वहीं फंस गए थे।
आतंकियों का एजंडा
खुफिया एवं सैन्य एजंसियों के मुताबिक, लश्कर-ए-तैयबा के ‘द रजिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) के आतंकवादियों ने कश्मीर में 90 के दशक जैसा माहौल और दहशत फैलाने के लिए लक्षित हत्याएं शुरू की हैं। दरअसल, घाटी में कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने, स्थानीय लोगों को रोजगार देने और अमन बहाली की कवायद में आतंकी संगठनों ने बाधा डालने की कोशिश की है। कश्मीर में हिंदुओं को बसाने से पहले 90 के दशक में उनकी जमीन जायजाद और संपत्तियों को वापस दिलाने के लिए राजस्व अदालतें तैयार की जा रही हैं। इस पर आतंकी संगठनों ने कश्मीर में जगह-जगह पर्चे चिपकाकर जमीन जायदाद को लेकर धमकियां देनी शुरू की है।
‘डोमिसाइल’ का मामला
अभी तक कश्मीर में ‘डोमिसाइल’ का मामला राज्य सरकार के अधीन था। धारा 370 हटने के साथ ‘डोमिसाइल’ प्रक्रिया अब केंद्र के दिशानर्देशों के मुताबिक शुरू हुई है। पूरे देश में रह रहे कश्मीरियों के डोमिसाइल प्रमाण पत्र उनको जारी किए जा रहे हैं। पहले कश्मीरी लड़कियों की शादी अगर राज्य से बाहर होती थी तो उनको कश्मीर में कोई भी संपत्ति खरीदने का हक नहीं बनता था। लेकिन नई व्यवस्था के मुताबिक, अब कश्मीर की अगर किसी लड़की की शादी देश के किसी दूसरे प्रांत के किसी भी व्यक्ति से हुई है तो न सिर्फ लड़की बल्कि जिसके साथ शादी हुई है उसके परिवार को भी कश्मीर में संपत्ति खरीदने का हक होगा और वह वहां का निवासी माना जाएगा।
असुरक्षा की भावना
आतंकवादियों की कोशिश स्थानीय लोगों में असुरक्षा की भावना बढ़ाने और उसका फायदा उठाने की है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अधिकतर विकास योजनाओं में प्रवासी मजदूरों की भागीदारी बढ़ी है। इन विकास परियोजनाओं में काम करने वाले बहुत से प्रवासी मजदूर और तकनीशियन हैं। जानकारों की राय में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से यह संदेश जाने लगा है कि अब सब कुछ केंद्र से सीधा नियंत्रित हो रहा है। ऐसे में मजदूरों और निहत्थे लोगों को निशान बनाकर वे देश के दूसरे हिस्से के लोगों को यहां आने से रोकने के लिए दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

दरअसल, आतंकियों ने 2009 में कश्मीरी पंडितों के साथ जो किया, वही सब कुछ वे अब प्रवासी मजदूरों के साथ कर रहे हैं, ताकि वे राज्य छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएं। कुछ समय से हालात ठीक हुए थे, लोगों ने जमीन खरीदना शुरु कर दिया, निवेश आने लगा, वहां पर्यटक पहुंचने लगे और यातायात खुल गया था। खत्म होते गए। जानकारों की राय में सरकार को हर हाल में इसे बेचना ही था और खरीदार ने जो मांग रखी गई उसे सरकार को मानना पड़ा। अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ रही है और सरकार को अब ये पता है कि वो इसे चला नहीं पाएगी, उसे इसको बेचना ही होगा। कंपनी की हालत पहले से बिगड़ी थी लेकिन बाद में और बिगड़ गई, सरकार उसे मजबूरी में चला रही थी।

ं तो 72 संयंत्र बंद होने पर कुल खपत में 33 फीसद बिजली की कमी हो सकती है। सरकार के अनुसार, कोरोना से पहले अगस्त-सितंबर 2019 में देश में रोजाना 10,660 करोड़ यूनिट बिजली की खपत थी, जो अगस्त-सितंबर 2021 में बढ़कर 12,420 करोड़ यूनिट हो चुकी है।
उस दौरान ताप बिजलीघरों में कुल खपत का 61.91 फीसद बिजली उत्पादन हो रहा था। इसके चलते दो साल में इन संयत्रों में कोयले की खपत भी 18 फीसद बढ़ चुकी है।

पर्यटन पर असर

आतंकी हिंसा के ताजा दौर में पर्यटन कारोबार पर 20 से 30 फीसद का असर पड़ा है। कश्मीर की अर्थव्यवस्था में पर्यटन से कश्मीर की करीब 20 फीसद आबादी को रोजगार मिलता है। ऐसे में अगर कश्मीर से नकारात्मक खबरें आती हैं तो इसका सीधा असर यहां के लोगों की रोजी-रोटी पर पड़ता है। ताजा दौर में कई लोगों ने अपनी बुकिंग रद्द कराई है। श्रीनगर के ‘हाउसबोट ओनर्स एसोसिएशन’ के महासचिव अब्दुल रशीद के मुताबिक, हत्याओं के ताजा दौर के बाद 20 फीसद बुकिंद रद्द कर दी गई है। अनुच्छेद 370 और कोविड के बाद पर्यटन दुरुस्त होने लगा था। जम्मू कश्मीर पर्यटन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 2021 में अब तक करीब तीन लाख पर्यटक कश्मीर घूमने पहुंचे। बीते तीन महीने में ही 1.5 लाख पर्यटक कश्मीर पहुंचे। अब पर्यटकों की संख्या तेजी से गिरी है। वहां पहुंचे लोग हड़बड़ी में लौटने लगे हैं।

  • कोयला महंगा होने से खरीद सीमित हो रही है, उत्पादन भी कम हुआ है। मानसून से पहले स्टॉक नहीं हुआ। सरकार के अनुसार कंपनियों को यह कदम पहले से उठाना चाहिए था।
  • राज्यों पर भारी देनदारी : यूपी, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश पर कंपनियों का भारी बकाया।

क्या कहते
हैं जानकार

देश के दूसरे हिस्से से आने वालों को रोकने की रणनीति आतंकवादियों पर अब सुरक्षाबल भारी पड़ रहे हैं। ऐसे में आतंकी अब बेगुनाहों और निहत्थे लोगों को निशाना बना रहे हैं। मजदूरों और निहत्थे लोगों को निशान बनाकर वे देश के दूसरे हिस्से के लोगों को यहां आने से रोकने के लिए दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

  • मेजर जनरल एजेबी जैनी (सेवानिवृत्त), रक्षा विशेषज्ञ

सरकार ने यहां चुनाव कराने में देर कर दी है। इन आतंकी हमलों का यहां के चुनाव से कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन स्थानीय लोगों को तो अपने चुने हुए प्रतिनिधि चाहिए, जो स्थानीय लोगों से संपर्क रख सकें। इससे भी आतंकवादियों की पैठ कम की जा सकेगी।

  • प्रोफेसर राधा कुमार,
    कश्मीर मामलों में पूर्व वार्ताकार

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From: Jansatta

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