नंदितेश निलय
आने वाले कुछ महीनों में हम फिर चुनाव की ओर बढ़ेंगे। मास्क के साथ या उसके बिना, यह वक्त ही बताएगा। लेकिन प्रजातंत्र का यह महापर्व हमसे आने वाले समय में कुछ सवाल भी पूछेगा। क्या चुनाव इतना जरूरी था और वह भी महामारी के वक्त? क्या कोई और भी रास्ता बचा था? हम यह मानते हैं कि लोकतंत्र यानी जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा संचालित तंत्र होता है।
कोरोना काल में सभी राजनीतिक दलों ने अपने बीच खड़े होकर मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश की और साथ ही, भारत के लोग जो चुनाव के त्योहार को पसंद करते हैं, वे अपने नेताओं से बिना मास्क के या बिना शारीरिक दूरी के साथ मिलना पसंद करते रहे। नतीजा हम सबने महसूस किया। तो क्या हम चुनाव भी आनलाइन करा सकते हैं? अगर हम आनलाइन पढ़ सकते हैं और समझ भी सकते हैं, तो क्या आनलाइन अपने प्रतिनिधियों को चुन नहीं सकते?
महामारी का डर अब भी बना हुआ है। और इसका ग्राहक कोई और नहीं, बल्कि इंसान हैं। कोरोना ने मानव जाति पर निर्दयता से हमला किया है और वह हमला कोई जातिगत या व्यक्तिगत नहीं रहा। ऐसी परिस्थिति में यह सोचना लाजिमी है कि आने वाले महीनों में जब फिर से कई राज्यों में चुनावी बिगुल बज उठेगा, तब उस जनता के मास्क और शारीरिक दूरी का क्या होगा।
वह तो हाशिये पर नजर आएगा। मानवता फिर आक्सीजन की तालाश में चल पड़ेगी। फिर कोहराम मचेगा। हमारे देश में चुनाव एक सामूहिक पर्व है और एक नागरिक का अधिकार भी। लेकिन साथ-साथ जीना और सभी की सुरक्षा के भाव से जीना भी हमारा ही कर्तव्य है। जरूरत है कि सभी राजनीतिक दल इस रास्ते को भी तलाशें और उत्तर-कोविड समय में चुनाव को एक सुरक्षित प्रक्रिया के अंतर्गत लेकर आएं।
कोई भी फैसला तभी नैतिक होता है, जब वह ज्ञान और संवेदना से लिया जाए और सिर्फ फैसले लेने की स्वंत्रता उसका आधार न बने। अरस्तू किसी भी क्रिया के पीछे ज्ञान की भूमिका पर सहमत थे। तमाम दार्शनिकों ने नैतिक जिम्मेदारी में, स्वतंत्र इच्छा के आध्यात्मिक विचार को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। मरियम वेबस्टर डिक्शनरी कैनवास को एक सकर्मक क्रिया के रूप में मानता है (एक जिला) या (व्यक्तियों) के पास जाने के लिए आदेश या राजनीतिक समर्थन या राय या भावनाओं को निर्धारित करने के लिए। लेकिन जब हम कोरोना के दिशा-निर्देशों को देखते हैं, तो सबसे पहले और सबसे महत्त्वपूर्ण है शारीरिक दूरी और हमेशा मास्क के साथ चेहरा।
बचपन से ही हमें यह सिखाया गया है कि बीमारियों के समय में रोकथाम इलाज से बेहतर है, जो स्वयं और दूसरों के जीवन को बचाने में अधिक प्रासंगिक और सार्थक रहा है। फिर क्यों तमाम राजनीतिक दल और उनके नेता इस चुनौतीपूर्ण समय में एक स्थान से दूसरे स्थान का दौरा करके एक बड़ा जोखिम उठाना पसंद करेंगे? क्या यह शक्ति की चाह है या एक लोकतांत्रिक उत्साह, जहां चुनाव का मतलब रैलियां और लोगों के साथ एक से एक संपर्क है?
जेरोम ब्लैक ने मतदान व्यवहार पर प्रचार के प्रभावों का अध्ययन करते हुए पाया कि एक ‘प्रतिस्पर्धी संदर्भ’ की एक उपस्थिति है, जहां पार्टियां वोट के लिए होड़ करती हैं। किसी निर्वाचन क्षेत्र या आम चुनाव की यह प्रतिस्पर्धी स्थिति उस एड्रेनालाइन को लाती है, जो हर किसी को प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में जहां हर वोट मायने रखता है, सभी राजनीतिक दलों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे अपनी विनम्र उपस्थिति से अपनी आवाज को प्रभावित करें। यह आगे प्रचार और मतदान के बीच के संबंध की व्याख्या करता है, जहां पार्टियां अधिक संख्या में प्रचार करने में शामिल होंगी। स्थानीय स्तर पर लोगों को अपने नेताओं से मिलने और बेहतर जीवन के लिए प्रतिबद्ध देख कर संतुष्टि की भावना मिलती है।
कोविड के समय में, इस प्रतिस्पर्धी संदर्भ ने सामाजिक दूरी के बड़े और गंभीर संदर्भ को प्रभावित किया। लोकतंत्र में लोग समय-समय पर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, और इसलिए वे अपने राजनीतिक नायकों को देखने, सुनने और उनसे मिलने के लिए हर तरह का जोखिम उठाते हैं, और इस चुनाव के समय में भी ऐसा ही हुआ। अब सवाल है कि अगर सरकार ने चुनाव आनलाइन कर दिया, तो विपक्ष की ओर से समर्थन मिलेगा या हंगामा होगा? वो जो गालिब लिखते हैं कि ‘हर बात पर कहते हो कि तू क्या है, तुम्ही बताओ कि ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है।’
दूसरा प्रश्न उस क्रिया का नैतिक महत्त्व है। यहां इसका जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि इसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। सरकार या नेताओं को दोष देने के बजाय हमें यह भी सोचना है कि क्या हम अनुशासित नागरिक हैं? क्या हम सम्यक रूप से कोरोना दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं? और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि क्या हम एक नागरिक के रूप में अपनी संवेदनशीलता विकसित कर रहे हैं? लोग नेताओं को चुनते हैं, और उनके स्वामी अंतत: लोगों के व्यवहार को अंजाम देते हैं।
चुनाव या प्रचार के नैतिक महत्त्व का जवाब दोनों तरफ से देना होगा। सरकार पर हमला करना और स्वयं की रक्षा करना हमेशा आसान होता है, लेकिन दूसरों के प्रति, स्वयं के प्रति जागरूकता की सही भावना का आकलन और एहसास करना क्या तर्कसंगत नहीं है! राजनीतिक व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार का प्रतिबिंब है।
क्या कोई विकल्प हैं? हां। आइए आनलाइन प्रचार और आनलाइन मतदान के लिए भी जाने की योजना बनाएं। अगर शिक्षा आनलाइन हो सकती है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मूल तत्त्व क्यों नहीं? महामारी के समय में, इसे प्रयोग करना चाहिए। यह न केवल एक नागरिक और नेता के जीवन की रक्षा करेगा, बल्कि देश के लिए समय और धन की समान रूप से बचत करेगा। लोकतंत्र को कठिन समय के मद्देनजर प्रक्रियाओं को परिभाषित और परिष्कृत करना होगा। मनुष्य बनाम वायरस के बीच, मनुष्य अंतत: जीतेगा। लेकिन वह जीत लोगों की और लोगों की ही होगी।
एक विचार को प्रचारित करने की उतनी ही आवश्यकता होती है, जितनी एक पौधे को पानी की आवश्यकता होती है। नहीं तो दोनों मुरझा कर मर जाएंगे। इसलिए किसी भी रूप में तत्काल और आवश्यक को पहचानना और प्राथमिकता देना महत्त्वपूर्ण है। क्या जन के हित में चुनाव आनलाइन आयोजित किया जा सकता है? लोकतंत्र की भावना को उज्ज्वल करने के लिए यह चर्चा और विचार-विमर्श होना चाहिए।
और यह वाद-विवाद का विषय नहीं है, बल्कि सब कुछ जनता के लिए, जनता का है। जनता को सुरक्षित और शक्तिशाली बनाना ही शक्ति का संदेश है। स्वामी विवेकानंद हमें याद दिलाते हैं- ‘जो जीते हैं वे जो दूसरों के लिए जीते हैं।’ आखिर चुनाव किसके लिए होते हैं? जन। सही साध्य के लिए, सही साधन चुनना आत्मतर्क की अंतिम जांच है। और यही लोकतंत्र है।
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From: Jansatta
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