जिन कीटनाशकों को अमेरिका और अन्य विकसित देशों में प्रतिबंधित किया जा चुका है, उन्हें भारत में धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है। जबकि इसे लेकर पर्यावरण और कृषि से जुड़ी संस्थाएं सरकारों और किसानों को इसके गलत असर के बारे में आगाह करती रही हैं। केंद्र सरकार ने पिछले कुछ सालों से नीम लेपित यूरिया को बढ़ावा देने के लिए तमाम कवायदें शुरू की हैं। इसकी खूबियों को लेकर सरकार प्रचार भी करती रही है। लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठता रहा है कि क्या इस यूरिया से इस्तेमाल से खाद्यान्नों में बढ़ रहे जहरीले तत्त्वों की कमी आई है?
गौरतलब है कि भारत में सहकारी रासायनिक खाद कारखानों में नीम कोटिक यूरिया बनाई जा रही है, लेकिन इससे रासायनिक खादों के इस्तेमाल में कोई खास कमी नहीं आई है, बल्कि रासायनिक खादें पहले से ज्यादा महंगी हुई हैं। पिछले कई सालों से खेती की लागत भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में प्रगतिशील किसानों ने प्राकृतिक खेती का विकल्प अपनाना शुरू कर दिया है। अब किसानों ने प्राकृतिक या जैविक खेती को एक सशक्त विकल्प के रूप में अपना लिया है। गौरतलब है कि जैविक या प्राकृतिक खेती की तरफ भारतीय किसानों का रुझान लगातार बढ़ रहा है। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए वे सुविधाएं मुहैया नहीं कराई हैं जिससे किसानों को जैविक खेती करने में सहूलियत होती। इसके बावजूद जैविक खेती आम किसानों की पसंद बनती जा रही है।
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि जैविक या प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने से पर्यावरण, खाद्यान्न, भूमि, इंसान की सेहत, पानी की शुद्धता को और बेहतर बनाने में मदद मिलती है। आमतौर पर कृषि व बागवानी में बेहतर पैदावार और बीमारियों के खात्मे के लिए फसलों में कीटनाशकों का इस्तेमाल जरूरी माना जाता है। लेकिन देशी तरीके से की जाने वाली खेती और बागवानी ने इस धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ये कीटनाशक बेहतर उपज के लिए या बीमारियों को खत्म करने के लिए भले ही जरूरी माने जा रहे हों, लेकिन इससे कई तरह की समस्याएं, जटिलताएं और बीमारियों की वजह बन गई हैं। गौरतलब है कि रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से होने वाली बीमारियों और समस्याओं की जानकारी के अभाव के कारण किसान इनका इस्तेमाल इतना ज्यादा करने लगे हैं कि उन्हें इससे अब नई-नई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
इसके बावजूद किसान इनके इस्तेमाल से छुटकारा नहीं मिल पा रहा है। केंद्र और राज्य सरकार के कृषि विभाग कीटनाशकों के इस्तेमाल को जरूरी मानते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जब से देश में दबदबा बढ़ा है, तब से खेती और बागवानी के लिए कीटनाशकों की विदेशी दवाएं ज्यादा इस्तेमाल होने लगी हैं। इसकी वजह से किसान और उसका परिवार पहले की अपेक्षा ज्यादा बीमार रहने लगे हैं। फसलों और फलों की पैदावार बढ़ाने और इनमें लगने वाली बीमारियों को खत्म करने के लिए कीटनाशकों का जबरदस्त इस्तेमाल होता है, लेकिन इनके इस्तेमाल से खेत बंजर हो रहे हैं और अन्न व फल कीटनाशकों के रसायनों से संक्रमित हो जाते हैं, इस वजह से भी इनके इस्तेमाल से इंसान कई तरह की बीमारियों से ग्रस्त होता जा रहा है।
कृषि वैज्ञानिक वर्षों से कीटनाशकों के इस्तेमाल से होने वाली तमाम विकट समस्याओं के प्रति आगाह करते आ रहे हैं, लेकिन न तो इस तरफ केंद्र सरकार गौर कर रही है, न राज्य सरकारें। इसका नतीजा यह हुआ है कि कीटनाशकों के इस्तेमाल से होने वाली तमाम गंभीर बीमारियां लोगों के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रही हैं। कीटनाशकों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल एडोसल्फान का किया जाता है। यह महज फसलों पर ही नहीं, बल्कि सब्जियों और फलों पर भी किया जाता है। पर्यावरणविदों के मुताबिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से पर्यावरण पर भारी असर पड़ रहा है।
वायु प्रदूषण की एक वजह कीटनाशकों का बहुतायत से इस्तेमाल भी है। देखा जाए तो बच्चों की कई समस्याएं कीटनाशकों के कारण पैदा हो रही हैं। कैंसर, त्वचा रोग, आंख, दिल और पाचन संबंधी कई समस्याओं की वजह ये कीटनाशक ही हैं। देखने की बात यह है कि जिन कीटनाशकों को अमेरिका और अन्य विकसित देशों में प्रतिबंधित किया जा चुका है, उन्हें भारत में धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है। जबकि इसे लेकर पर्यावरण और कृषि से जुड़ी संस्थाएं सरकारों और किसानों को इसके गलत असर के बारे में आगाह करती रही हैं।
कीटनाशकों के इस्तेमाल से तमाम बीमारियों और समस्याओं के लगातार बढ़ने की घटनाएं सामने आ रही हैं। लेकिन दूसरी ओर, इनके इस्तेमाल के बगैर बेहतर खेती करके अच्छी उपज लेने के प्रयोग भी देश के कई हिस्सों में चल रहे हैं। सिक्किम, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्रप्रदेश के किसानों ने इस दिशा में सफल प्रयोग किए हैं। इसमें कीटनाशकों की जगह तीन दिन पुराने मट्ठे का छिड़काव और सूखी नीम की पत्तियों का इस्तेमाल किया गया। आंध्र प्रदेश के उन्नीस जिलों में किसानों ने कीटनाशकों के बिना सफल खेती करके और अच्छी उपज हासिल कर यह साबित कर दिया कि कीटनाशकों के इस्तेमाल के बिना भी मुनाफे की खेती की जा सकती है। इससे जमीन की उर्वरता भी बढ़ती है और पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचता। ऐसे निरापद प्रयोगों से अन्न, सब्जी और फलों से किसी को कोई किसी तरह की बीमारी भी नहीं होती है।
दूसरा प्रयोग राख का किया गया है। राख से जहां जमीन में उर्वराशक्ति की बढ़ोत्तरी होती है वहीं पर फसल की उपज बढ़ाने में भी यह बहुत कारगर है। कृषि वैज्ञानिक इस बात से बेहद हैरत में हैं कि स्वदेशी तरीके से खेती और बागवानी को जितना ज्यादा मुफीद बनाया जा सकता है, उतना आधुनिक तरीके से नहीं, खासकर फसलों और सब्जियों को सुरक्षित रखने के मामले में। इसलिए ऐसे प्रयोगों को सारे देश के किसानों को अपनाने की जरूरत है। अब कृषि वैज्ञानिक भी जैविक खेती को किसान और किसानी के लिए फायदेमंद और निरापद मानने लगे हैं। उनका मानना है जैविक खेती से ही खेती घाटे से निकल कर फायदे में आ सकती है। इससे जहां गांवों से शहरों की ओर बढ़ रहा पलायन कम होगा, वहीं रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल से बढ़ रही तमाम तरह की समस्याएं भी कम होगीं।
खेती के इन स्वदेशी प्रयोगों को किसान भले ही अपना रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार इस दिशा में कोई खास रुचि नहीं दिखा रही है। ऐसे सफल प्रयोग करने वाले किसानों को केंद्र और राज्यों की तरफ से कोई प्रोत्साहन नहीं मिलना इस बाक का प्रमाण है कि सरकारों को स्वदेशी तरीके से निरापद खेती और बागवानी को बढ़ावा देने में कोई दिलचस्पी नहीं है। जबकि प्राकृतिक तरीके से की जाने वाली खेती जमीन, जीवन और पर्यावरण तीनों के लिए संतुलित और सबसे बेहतर तरीका है।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कीटनाशकों को बनाने वाली ज्यादातर कंपनियां विदेशी यानी बहुराष्ट्रीय हैं। इन कंपनियों को बनाए रखने और इनके उत्पाद को खपाने की जिम्मेदारी सरकारों की रहती है। जबकि स्वदेशी तरीके से की जा रही खेती से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कीटनाशक उत्पाद की बिक्री घटती है। ऐसे में भला केंद्र सरकार क्यों चाहेगी कि स्वदेशी तरीके की खेती को बढ़ावा मिले। उत्तर और पूर्वी भारत के किसान भी कीटनाशक दवाइयों से रहित खेती और बागवानी के बेहतर प्रयोग को अपना कर खेती और बागवानी को जहरीले रसायनों से छुटकारा दिला सकते हैं। इस स्वदेशी तकनीक के प्रचार-प्रसार के लिए किसानों के हित चाहने वाली संस्थाओं को आगे आना होगा।
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From: Jansatta
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