Saturday, October 30, 2021

इस सख्ती के मायने

जिस दिन पिछले सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय ने याद दिलाया कि वह हमारे शासकों पर कड़ी निगरानी रखे हुए है, मैंने चैन की सांस ली। बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ है, सो मेरे कुछ पत्रकार बंधुओं ने ट्वीट करके कहा कि लगता है कि इस प्रधान न्यायाधीश को न राज्यसभा में जाने की इच्छा है, न मोदी सरकार की तरफ से वफादारी के किसी दूसरे इनाम की।

मामला पेगासस का था और सर्वोच्च न्यायालय ने जांच समिति गठित होने का फैसला सुनाया यह कहते हुए कि इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया जा रहा है, इसलिए कि आम नागरिक अपने बुनियादी अधिकार खो सकता है, अगर पेगासस के जरिए उसकी बातों और गतिविधियों पर सरकार जासूसी करने लगी है। एक ऐसी आधुनिक तकनीक द्वारा, जिससे आपका मोबाइल फोन ही सरकारी जासूस बन जाता है।

पेगासस आम नागरिकों के निजी जीवन में इतना खतरनाक दखल दे सकता है कि इजराइली सरकार इसको केवल उन सरकारों को बेचती है, जो लोकतांत्रिक ढंग से अपना काम करती हैं। इसको बनाया गया था खासतौर पर जिहादी आतंकवाद पर रोक लगाने के लिए, जिससे इजराइल को सबसे ज्यादा खतरा हमेशा बना रहता है। लेकिन कुछ महीने पहले जानकारी मिली थी कि मोदी सरकार ने पेगासस द्वारा जासूसी कोई पचास हजार भारतीयों पर की है, जिनमें राजनेता और पत्रकार भी थे।

सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह याद दिलाया कि पत्रकारों पर इस तरह की जासूसी करना पत्रकारिता की आजादी पर लगाम लगाने के बराबर है, इसलिए कि सरकार जान सकती है कि पत्रकारों के सूत्र कौन हैं।

नरेंद्र मोदी ने पिछले सात सालों में बार-बार साबित किया है कि उनको आलोचक पसंद नहीं हैं। इतने नापसंद हैं कि पिछले सप्ताह जिन कश्मीरी छात्रों ने पटाखे फोड़े थे क्रिकेट में पाकिस्तान की जीत के बाद, उनको आतंकवादी मान कर यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि अधिनियम) के तहत गिरफ्तार किया गया। आगरा में जिन कश्मीरी छात्रों को ऐसी हरकत करते पाया गया था, उन पर राजद्रोह का आरोप लगा दिया गया है। इस कानून में जमानत मिलना इतना कठिन है कि ये छात्र एक साल तक जेल में रह सकते हैं।

मोदी सरकार के प्रवक्ता और भक्त सख्त एतराज करते हैं, जब विदेशी पत्रिकाएं और अखबार हमारे प्रधानमंत्री के बारे में कहते हैं कि उनके दौर में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हुई हैं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि इस देश की हवाओं में एक अजीब-सा भय दिखता है आजकल। याद है मुझे कि जिस दिन हमारी सरकार ने वाट्स ऐप पर दबाव डाला था उसकी गोपनीयता को कम करने के लिए, तो मेरे कई जानकार और दोस्त फौरन सिग्नल पर आ गए थे। इस ऐप में बातचीत गायब हो जाती कुछ घंटों बाद। यानी आर्यन खान ने अगर सिग्नल पर अनन्या पांडे से बातें की होतीं, तो शायद जेल तक न पहुंचते।

जिक्र आ ही गया है आर्यन खान का, तो यह कहना जरूरी समझती हूं कि जब समीर वानखेड़े की पत्नी और बहन ने टीवी पर आकर शिकायत की पिछले हफ्ते कि उनका मीडिया ट्रायल हो रहा है, तो मुझे हंसी भी आई और रोना भी। कहां रही हैं ये दोनों महिलाएं कि उनको दिखा नहीं है कि पिछले दो वर्षों में श्रीमान वानखेड़े ने कितनी बार मीडिया ट्रायल किया है कितने लोगों का। पिछले साल रिया चक्रवर्ती और उनके भाई को जेल में एक पूरा महीना रहना पड़ा था, एक मीडिया ट्रायल में दोषी पाए जाने के बाद।

अब आर्यन की बारी आई है। अभी तक उनको जेल में रखा गया, सिर्फ इसलिए कि उनके फोन को जब्त करने के बाद वाट्स ऐप की उनकी कुछ निजी बातों को आधार बना कर उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि उनका वास्ता अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स बेचने वालों के साथ है। यानी बिना पेगासस के भी उनका फोन उनका दुश्मन साबित हुआ है।

आर्यन खान के साथ जो हुआ वह हम सब के साथ भी हो सकता है। यही संदेश है उनको इतने दिन जेल में रखे जाने का। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का स्वागत हम सबको करना चाहिए, क्योंकि जिस देश में आलोकतांत्रिक तरीकों से शासन की संस्थाएं काम करने लगती हैं, उस देश में कोई भी सुरक्षित नहीं रहता, सिवाय उन लोगों के, जो शासन चला रहे हैं इस तरीके से। सर्वोच्च न्यायालय ने कम से कम इतना तो साबित किया है पिछले सप्ताह कि वह किसी शासक के दबाव में नहीं आने वाला है।

लोकतंत्र को कमजोर करने का काम पहली बार नहीं हुआ है। जिस कानून के तहत आर्यन खान को गिरफ्तार किया गया था, उसको राजीव गांधी ने बनाया था। और उस दौर में पत्रकारिता पर लगाम लगाने की भी कोशिश की गई थी, एक ऐसे कानून द्वारा, जिसमें प्रावधान था कि पत्रकार अपने सूत्र कभी छिपा नहीं सकते थे।

कानून रद्द किया गया लागू होने से पहले, सिर्फ इसलिए कि पत्रकार सड़कों पर उतर आए थे, इस कानून का विरोध करने। रही राजीव गांधी की अम्मा की बात, तो उन्होंने तो लोकतंत्र को पूरी तरह ताक पर रख कर अपने आप को तानाशाह बना दिया था। आज अगर गांधी परिवार का बुरा हाल है, तो एक कारण यह जरूर है कि उन्होंने अपने आप को लोकतंत्र से ऊपर होने का दर्जा दे रखा था।

प्रधानमंत्री को विनम्रता से नसीहत यह देना चाहती हूं कि जनता सब देख रही है और सब समझ रही है, तो अगर इसी तरह चुपके से लोकतंत्र को कमजोर करने का काम होता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब जनता अपने मन की बात आपको सुना देगी। लोकतंत्र भारत देश का सबसे कीमती गहना है, इसको सुरक्षित रखने का काम आप नहीं करेंगे तो जनता खुद करेगी एक न एक दिन।

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From: Jansatta

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