Tuesday, October 19, 2021

छठ के बहाने पूर्वांचलियों की राजनीति

मनोज कुमार मिश्र
कोरोना महामारी के संकट के दौरान दिल्ली में पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड आदि) के प्रवासियों के लोक पर्व को सार्वजनिक रूप से मनाने देने के नाम पर राजनीति होने लगी है। दिवाली के चौथे दिन से चार दिन तक चलने वाले इस पर्व से पूर्वांचल के प्रवासी भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। पहले तो दिल्ली में रहने वाला प्रवासी इस पर्व को मनाने अपने गांव जाने का प्रयास करता था, ऐसा करने वालों की तादात अब भी काफी है।

इसीलिए इस दौरान रेलगाड़ी आदि में जाने के लिए टिकट मिलना कठिन होता है। हालांकि बड़ी तादात में लोग निजी वाहनों से अपने मूल स्थान पर चले जाते हैं। दिल्ली में अब प्रवासियों की आबादी इतनी हो गई है कि हर चौथा-पांचवां आदमी पूर्वांचल का प्रवासी माना जाता है। दिल्ली की 70 में से 50 विधानसभा सीटों पर प्रवासियों की संख्या 20 से 60 फीसद तक हो गई है। यही हाल दिल्ली नगर निगमों की सीटों पर है। 272 सीटों में डेढ़ सौ से ज्यादा सीटों पर पूर्वांचल के प्रवासी निर्णायक बन गए हैं। अब प्रवासियों की तीसरी-चौथी पीढ़ी दिल्ली में पैदा होने के चलते वे सभी दिल्ली के मतदाता बन गए हैं।

वैसे तो हर दल के साथ प्रवासी जुड़े हैं लेकिन बड़ी आबादी पहले कांग्रेस से अब कुछ सालों से आम आदमी पार्टी (आप) से जुड़ गई है। उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए ही बिहार के मूल निवासी भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी को भाजपा ने तीन साल तक दिल्ली भाजपा का अध्यक्ष बनाया था। इसका भाजपा को लाभ भी हुआ। इस बार छठ को सार्वजनिक रूप से मनाने के आंदोलन की अगुआई भी मनोज तिवारी ही कर रहे हैं। प्रवासियों का समर्थन खो जाने के भय से ‘आप’ ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास करके अपना पीछा छुटाने का प्रयास किया है।

तीन दशकों से राजनीतिक दलों को पूर्वांचल के प्रवासियों की अहमियत समझ में आई। दिल्ली की आबादी सामान्य बढ़ोतरी से अलग करीब पांच लाख हर साल बढ़ जाती है। इसमें बड़ी तादात में पूर्वांचल के प्रवासी होते हैं। उनके करीब एकतरफा समर्थन से 15 साल सरकार चलाने वाली कांग्रेस को उनकी अहमियत समझ में आई। साल 2000 में शीला दीक्षित की सरकार ने दिल्ली में छठ पर्व पर ऐच्छिक अवकाश घोषित किया और बिहार के बाहर पहली बार दिल्ली में मैथिली-भोजपुरी अकादमी बनी।

बिहार मूल के महाबल मिश्र के 1998 में विधायक बनने का लाभ कांग्रेस को मिला। वे इसी बूते 2009 में पश्चिमी दिल्ली से सांसद बने। भाजपा को भले ही यह राजनीति देर से समझ आई हो लेकिन उसके एक प्रदेश अध्यक्ष मांगे राम गर्ग ने भाजपा सरकार में ही सरकारी छठ घाट बनवाने शुरू कर दिए थे, जिसमें कांग्रेस सरकार ने तेजी दिखाई और ‘आप’ सरकार ने तो सरकारी छठ घाटों की तादात काफी बढ़ा दी। इतना ही नहीं निजी घाटों को भी सरकार से कई सहूलियत दिला दी। भाजपा ने राष्ट्रपति शासन के दौरान दिल्ली में छठ के दिन को सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की। छठ पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने वाला दिल्ली बिहार और झारखंड के बाद तीसरा राज्य बना।

यह दूसरा साल ऐसा होने वाला जब कोरोना महामारी के चलते छठ पूजा सार्वजनिक रूप से नहीं मनाई जा रही है। पिछले साल तो जिसको संभव हुआ, वह छठ पर अपने गांव चला गया। इस बार कोरोना कम होने से दिल्ली में ही एहतियात के साथ छूट देने की मांग होने लगी है। इस पर्व पर पानी में खड़े होकर ही अर्घ्य देते हैं। इस दौरान यह खतरा बना रहेगा कि अगर कोरोना से पीड़ित कोई पानी में हैं तो साथ खड़े होने वाले को कोरोना होने का खतरा रहेगा। इसी आधार पर दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार ने छठ पूजा पर सार्वजनिक आयोजन की अनुमति नहीं दी। पहले इसे भाजपा नेता मनोज तिवारी ने उठाया, फिर भाजपा ने आंदोलन शुरू किया और फिर उस मांग पर कांग्रेस भी आंदोलन करने लगी।

केजरीवाल और उनकी पार्टी के लोगों को लगा कि मुद्दा बड़ा होने पर हालात नहीं संभलेंगे तो अनुमति देने का ठीकरा उपराज्यपाल और केंद्र सरकार पर फोड़ने का प्रयास किया। माना जा रहा है कि यह मुद्दा प्रवासियों का समर्थन पाने के लिए ज्यादा है। अगले साल के शुरू में दिल्ली के तीनों नगर निगमों के चुनाव होने वाले हैं। भाजपा लगातार चौथी बार जीत हासिल करने की कोशिश में लगी है, वहीं प्रचंड बहुमत से दिल्ली में सरकार चला रही ‘आप’ इस चुनाव को जीतकर अपनी लोकप्रियता का प्रमाण पत्र हासिल करना चाहती है। उसके नेताओं को लगता है कि नगर निगमों में काबिज होने के बिना दिल्ली पर शासन करना अधूरा है। राजनीतिक दल प्रवासियों को यह संदेश देने में लगे हैं कि वे वास्तव में इस पर्व का कितना सम्मान करते हैं और वे पर्व को सही तरीके के संपन्न करवाने के लिए कितने चिंतित हैं।

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From: Jansatta

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