हाल के दिनों में भारत से सटे सीमाई इलाकों में चीन की एकाएक बढ़ती हरकतें चिंता पैदा करने वाली हैं। पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीनी सैनिकों के बढ़ते जमावड़े और घुसपैठ की कोशिशों से इस आशंका को बल मिलना स्वाभाविक है कि चीन कहीं नया विवाद खड़ा करने की साजिश तो नहीं रच रहा। पिछले हफ्ते अरुणाचल प्रदेश के तवांग सैक्टर में करीब दो सौ चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए थे। भारतीय सैनिकों के ललकारने पर विवाद की स्थिति बन गई। लेकिन दोनों देशों के वरिष्ठ कमांडरों ने बातचीत से मामला सुलझा लिया।
इससे पहले अगस्त में करीब सौ चीनी सैनिक उत्तरांखड के बाराहोती सैक्टर में घुस आए थे और भारतीय क्षेत्र में तीन घंटे तक मौजूद रहे थे। तवांग में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के पीछे हालांकि तर्क यह दिया गया कि स्पष्ट सीमांकन नहीं होने की वजह से चीनी सैनिकों को पता नहीं चला और वे भारतीय सीमा में आ गए। यह सही भी है कि जहां स्पष्ट सीमांकन नहीं है वहां ऐसा होता रहना असामान्य नहीं है। लेकिन यह गंभीर बात इसलिए है कि सीमा पर अक्सर अशांति का कारण इस तरह की घुसपैठ की घटनाएं ही बनती रही हैं। खासतौर से चीन को लेकर सतर्कता इसलिए भी जरूरी है कि वह इसी तरह सैनिकों की घुसपैठ करवा कर इलाकों पर कब्जा जमा लेता है और उन अपना दावा ठोकने लगता है।
चीनी घुसपैठ की घटनाएं ऐसे वक्त में हुई हैं जब दोनों देश वार्ता के जरिए गलवान गतिरोध को दूर करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। अभी बड़ी चिंता पूर्वी लद्दाख में टकराव वाले ठिकानों से सैनिकों की वापसी की है। दरअसल सैनिकों को पीछे हटाने के मुद्दे पर चीन जिस तरह का रवैया अपनाता रहा है, उससे तनाव ही बढ़ता है। इससे वार्ताओं पर भी असर पड़ता रहा है। चाहे तवांग में चीनी सैनिकों की घुसपैठ हो या बारागोती में, ये गतिविधियां भारत पर एक तरह से दबाव बनाने की रणनीति का ही हिस्सा हैं। चीन को लगता है कि इस तरह की घुसपैठ से भारत भड़केगा और उकसावे की कार्रवाई करेगा।
पूर्वी लद्दाख में चीन के बढ़ते सैन्य जमावड़े पर भारत के सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की चिंता बेवजह नहीं है। इस क्षेत्र में चीन ने जिस तेजी से बुनियादी ढांचे के विकास का काम छेड़ रखा है, उसके पीछे उसके दूरगामी मकसद हैं। जैसी कि खबरें आ रही हैं कि वह यहां न सिर्फ और ज्यादा सैनिक तैनात करने की तैयारी में लगता है, बल्कि युद्ध के लिए जरूरी हथियारों, टैंकों, हेलिकॉफ्टरों की तैनाती के साथ अपनी वायुसेना के लिए स्थायी तौर पर सैन्य अड्डे भी बनाने में जुटा है।
इससे इतना तो साफ है कि चीन अब आसानी से यहां से हटने वाला नहीं। गलवान की घटना के बाद ही इस इलाके में व्यापक स्तर सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। चीनी सेना के बढ़ते जमावड़े पर विदेश मंत्री एस जयशंकर भी कई मौकों पर चिंता जाहिर करते रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका की अगुआई वाले चौगुटे जिसमें जापान, भारत और आस्ट्रेलिया भी शामिल हैं, की सक्रियता से भी चीन की नींद उड़ी है। इसलिए भी वह भारत पर दवाब बनाने में लगा है। बड़ी मुश्किल यह भी है कि भारत-चीन सीमा इतनी लंबी है कि हर जगह सेना तैनात करना या निगरानी करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। इसलिए बेहतर हो कि चीन भारत के साथ मिल कर सीमांकन के मुद्दे पर काम करे, ताकि भविष्य में विवाद खड़े न हों।
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From: Jansatta
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