Monday, September 13, 2021

नाकामी के बरक्स

जहां पूरी दिल्ली जलभराव और प्रदूषित पेयजल आपूर्ति से त्राहिमाम कर रही है, वही दिल्ली सरकार नए-नए उद्घाटन करने में मशगूल है। नगर निगम के चुनाव को देखते हुए अपनी विफलताओं का ठीकरा पिछली सरकारों और नगर निगमों पर फोड़ रही है। दिल्ली के सीवर दिल्ली जलबोर्ड के अधीन आते हैं, फिर भी इसकी जिम्मेदारी लेना तो दूर, बल्कि वह यह कह कर दिल्ली की जनता का उपहास उड़ा रही है कि उन्होंने नगर निगम में गलत सरकार को चुना है। जलभराव और सीवर जाम की शिकायत के लिए सार्वजनिक किए गए दिल्ली जलबोर्ड के अधिकतर अधिकारियों समेत इसके उपाध्यक्ष की ईमेल आइडी फिलहाल बंद कर दी गयी हैं। इनसे अपना एक महकमा संभलता नहीं और चले हैं गुजरात, पंजाब और दिल्ली के नगर निगमों के चुनाव में जीत का दावा करने! मुफ्त की रेवड़ियां बांट कर सत्ता हथियाना जितना सरल है, पूरा कार्यकाल सफलता से चलाना उतना ही दुष्कर।

दिल्ली में पेयजल आपूर्ति व्यवस्था बुरी तरह अस्त-व्यस्त है और मुख्यमंत्री मुफ्त पेयजल योजना का ढिंढोरा पीटते नहीं अघाते। यों मुख्यमंत्री दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने का सपना दिखाते हैं, लेकिन किसी नगर व्यवस्था की प्राण रेखाएं उसकी सुव्यस्थित सड़कें होती हैं और दिल्ली की सड़कों का बुरा हाल है। बारिश के दिनों में सड़कें मानो बाढ़ जैसे हालात में गायब हो जाती हैं। एक चुनी हुई सरकार को सभी के साथ एकसम व्यवहार करना चाहिए और राज्य के सभी नागरिकों का समान खयाल रखना चाहिए, भले किसी ने उसे वोट दिया हो या नहीं।
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, दिल्ली
तालिबान की सीमा

सत्ता चीज ही ऐसी है जो मनुष्य को खुदगर्ज बना देती है। मनुष्य मूल रूप से अपने व्यक्तित्व, विचार और आचरणों से स्वार्थी होता है। इंसान सबसे ज्यादा भूखा धन का देखा जाता है, लेकिन जब धन की प्राप्ति हो जाती है तब वह सत्ता या शक्ति के स्रोतों के पीछे भागता है। इतिहास सिर्फ इसलिए लिखा गया है कि वर्तमान को पता चल सके कि सत्ता के लिए क्या-क्या नहीं किया गया।

अफगानिस्तान के तालिबान में भी अब आंतरिक कलह शुरू हो चुकी है। यह कलह मुख्य रूप से हक्कानी नेटवर्क और तालिबान के बीच मंत्रालय के बटवारे को लेकर है, जिसका मुख्य कारण सत्ता पर काबिज होना है। तालिबान ने अपनी नई सरकार गठन की घोषणा को एक सप्ताह के लिए इसलिए टाल दिया है कि पाकिस्तान के खुफिया एजेंसी के प्रमुख इन दिनों काबुल दौरे पर हैं और पाकिस्तान अफगान में तालिबान के माध्यम से कठपुतली सरकार चलाना चाहता है। लेकिन शायद उसके मंसूबे सफल न हों, क्योंकि तालिबान ने साफ कह दिया है कि उसके लिए सबसे प्रमुख देशों में सबसे ऊपर चीन आता है। इसका मुख्य कारण चीन द्वारा तालिबान को धन दिया जाना है।

भारत ने साफ कहा है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी तत्त्व न कर पायें। अगर तालिबान पाकिस्तान के दबाव में आकर कुछ ऐसा कदम उठाता है तो उसे इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा।। अगर तालिबान ने जम्मू-कश्मीर में कुछ भी अपने लड़ाकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से भी अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करता है तो भारत 2024 के आम चुनाव को ध्यान में रख कर एक सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कुछ अफगानिस्तान में भी करे। तालिबान यह भी समझता है कि अगर उसे यहां सरकार चलानी है तो पड़ोसी देशों से न उलझे और न ही दोहा समझौते का उल्लंघन करे।
’संदीप कुमार, प्रयागराज, उप्र

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From: Jansatta

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