Thursday, September 2, 2021

अशांत पड़ोस

अपने यहां कहावत है कि जब पड़ोसी पिट रहा हो और हम घर में चुप बैठे देख रहे हों तो समझ लेना चाहिए कि हमारे पिटने का समय नजदीक है। वर्तमान में कुछ यही हाल पूरी दुनिया का हो गया है। हमारा देश वर्षों से बहुत-सी आतंकवादी घटनाओं की तरफ पूरी दुनिया का ध्यान दिलाता आ रहा है। कभी किसी देश ने इस देश की इतनी भयंकर समस्या की तरफ यथोचित ध्यान नहीं दिया। चाहे वह दुनिया की महाशक्ति कहा जाने वाला अमेरिका ही क्यों न हो।

अगर समय रहते दुनिया के देश इस तरफ थोड़ा भी सोचे होते तो आज जो अफगानिस्तान में हो रहा है, शायद नहीं होता! इधर अफगानिस्तान की समस्या को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे संयुक्त राष्ट्र जैसी विश्व संस्था का अस्तित्व ही नहीं है। यह भी सत्य है कि अगर हम दूसरे का बुरा सोचेंगे तो अपना बुरा होना तय है। कुछ ऐसा ही सर्वोच्च शक्ति अमेरिका के साथ तो हो ही रहा है, साथ में बहुत सारे देशों के निर्दोष नागरिक चपेट मे आ गए हैं। यह सभी भगवान भरोसे छोड़ दिए गए हैं। समय बताएगा कि इनके साथ क्या-क्या होगा! अमेरिका तो अपना काम खत्म होने के बाद अलग हो जाएगा, लेकिन विश्व के तमाम देशों के बचे नागरिकों का क्या होगा?

जब महाशक्ति के रहते इतनी अशांति रही तो न रहने पर क्या होगा, इसकी कल्पना करना मुश्किल है। भारत ने बहुत ज्यादा संसाधन अफगानिस्तान के विकास के लिए लगाया है, बहुत-सी परियोजनाओं पर काम चल रहा था। एक तरह से यह सब अचानक ही कहा जाएगा या यह कहा जाए कि लोगों की तरह विश्व के बहुत से देश भी स्वार्थी हो गए हैं, जो केवल अपना हित साध रहे हैं। यह तो एक तरह से आर्थिक शोषण ही कहा जाएगा जो अमीर देश गरीब देशों का कर रहे हैं। आज की तारीख में देखने में यह भी आ रहा है कि बहुत से अत्याधुनिक हथियार जो विकसित देशों, खासकर अमेरिका और रूस के द्वारा अफगानिस्तान को समय-समय पर दिए गए थे, आज सबका मालिक तालिबान हो गया है।

शायद यही सब कारण है कि अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने के पहले ही आतंकी एक तरह से धमकाने और अशांति पैदा करने लगे थे। अब वह सब कुछ साफ दिखाई देने लगा है। एक बात तो पूरी तरह साफ है कि अगर पड़ोस में अशांति है तो उसका असर दूर तक पड़ना स्वाभाविक है और भारत को बहुत ही सावधान रहने की जरूरत है।
’राजेंद्र प्रसाद बारी, लखनऊ, उप्र

किसका हित

पिछले लगभग नौ महीनों से किसान न?ए कृषि कानूनों के विरोध में अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर हैं। दिल्ली आने वाले लगभग सभी रास्ते किसानों के धरने-प्रदर्शन की वजह से बंद हैं। कृषि मंत्री और किसानों के बीच क?ई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला। सरकार जहां तीनों कानूनों को किसानों के हित में बता रही है, वहीं किसान इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं। किसान चाहते हैं कि ये तीनों कानून वापस लिए जाएं। लंबा समय बीत जाने के बावजूद और कुछ लोगों द्वारा खुद को ‘आतंकवादी’ और ‘मवाली’ कह कर अपमानित किए जाने के बावजूद अब तक किसानों का प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि हरियाणा के करनाल जिले में हाल ही में पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज किया, जिसमें क?ई किसानों को गंभीर चोट आई। अफसोसनाक यह है कि किसानों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करने वाले सत्ताधारी नेता बर्बर लाठीचार्च को भी सही ठहरा रहे हैं।

किसान जो पिछले नौ महीनों से अपना घर-बार छोड़ कर सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं, उन पर लाठी-डंडा चलवाना किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं कहा जा सकता। आखिर जिस किसान को हम अन्नदाता कहते हैं, उस पर डंडा कैसे चला सकते हैं? अगर कृषि मंत्री इस मुद्दे को नहीं सुलझा पा रहे तो प्रधानमंत्री को आगे आना चाहिए। सरकार को प्रतिष्ठा का सवाल नहीं बनाते हुए चर्चा फिर से शुरू हो, इसका प्रयास करना चाहिए, क्योंकि बातचीत से ही इस समस्या का समाधान निकलेगा। इस साल जनवरी के बाद सरकार और किसान संगठनों के बीच इस गतिरोध को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है। सरकार को जल्द से जल्द इस समस्या का हल निकालना चाहिए।
’चरनजीत अरोड़ा, नरेला, दिल्ली

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From: Jansatta

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