Saturday, September 18, 2021

स्वाधीनता और नैतिकता

विचार, धर्म, मूल्य सब एक ही सीध के शब्द हैं। इनकी मौलिक रचना में नैतिकता सर्वोपरि है। यह और बात है कि कई बार यह विरोधाभास उभरता है कि विचार और धर्म की मौजूदा समझ और सलूक में नैतिकता का यह पक्ष गौण है। दिलचस्प है कि नैतिकता, मनुष्यता से जुड़ा सरोकार है। इसलिए सभ्यता और संस्कृति के विकास में भी नैतिकता को स्वाभाविक अहमियत मिली है। पर जब से मनुष्य के विकास के तमाम रास्तों और अवधारणाओं के साथ आधुनिकता का आग्रह जुड़ा है, नैतिक सरोकारों पर बात कम होती है।

यह समस्या विचार और बुद्धि के नए मेल से सामने आई है। जबकि विचार का स्वाभाविक उत्स और उसके निर्माण की प्रक्रिया हृदय से जुड़ी है। बुद्धि का हस्तक्षेप साहित्य तक पर हावी हुआ है। यही कारण है कि वहां भी नैतिकता को तिलांजलि देकर कई तरह की बातें आज कही-लिखी जा रही हैं।

नैतिकता की दरकार और मौजूदा जीवन मूल्य में उसकी कमजोर पड़ती स्थिति चिंताजनक है। आचार्य तुलसी ने इस चिंता की तरफ खासतौर पर ध्यान दिलाया है। वे इस संदर्भ में अपनी बात काफी सरल तरीके से रखते हैं। इस तरह की बात को कहने के लिए तीखे तर्क की शरण में न जाना पड़े, वे इसका पूरा ध्यान रखते हैं। इस चर्चा का आरंभ वे यह कहते हुए करते हैं कि नैतिकता एक शाश्वत मूल्य है। इसकी अपेक्षा हर युग में रहती है। सतयुग में भी ऋषि-मुनि होते थे। वे धर्म और नैतिकता की चर्चा किया करते थे।

रामराज्य भी इसका अपवाद नहीं था। उस समय भी धर्म के उपदेशक थे। जिस युग में धर्म और नीति के पांव लड़खड़ाने लगे हों, सांप्रदायिकता, धार्मिक असहिष्णुता, जातिवाद, छुआछूत, बेरोजगारी, कालाबाजारी, मिलावट, दहेज आदि बीमारियां सिर उठाए खड़ी हों, उस समय तो नैतिकता की आवाज उठाना और इसकी जरूरत को रेखांकित करना और अधिक जरूरी हो गया है।

आज सब कुछ है- ट्रेन है, प्लेन है, कारखाने हैं, स्कूल हैं, कॉलेज हैं, भोगोपभोग की तमाम सामग्रियां हैं। पर अच्छा आदमी नहीं है। इस एक कमी के कारण तमाम उपलब्धियां बेकार हो रही हैं। सब कुछ है, पर जब तक आदमी सही अर्थ में आदमी नहीं है, तब तक कुछ भी नहीं है। तुलसी की इस बात को अपने एक रेडियो साक्षात्कार में महादेवी वर्मा ने भी सुंदर तरीके से कहा है।

आचार्य तुलसी नैतिकता पर अपनी बात कहते हुए एक कथा प्रसंग की मदद लेते हैं। एक साधारण व्यक्ति किसी सेठ के पास गया। उसके घर में लड़की की शादी थी। बारात का आतिथ्य करने के लिए उसे किसी चीज की जरूरत हुई। सेठ जी का नाम उसने बहुत सुना था। मन में बड़ी आशा संजोकर वह सेठ जी के घर पहुंचा और बोला, मुझे दो-चार दिन के लिए अमुक चीज की जरूरत है। आप दे सकें तो बड़ी कृपा होगी। सेठ जी मसनद के सहारे आराम से बैठे थे। उन्होंने इधर-उधर देखा और कहा, आप कुछ समय बाद आना। कुछ समय बाद आने पर भी उसे वही बात सुनने को मिली।

जब वह तीसरी बार आया और सेठ ने फिर टालमटोल किया तो आगंतुक अधीर हो उठा। वह अपनी अधीरता जाहिर करते हुए बोला, भाई साहब! बात क्या है? मुझे और भी कई काम करने हैं। आप मेरी दुविधा को समाप्त कीजिए। सेठ जी सुनकर गंभीर हो गए और अपनी कठिनाई बताते हुए बोले, भाई! तुम अन्यथा मत समझो। मैं क्या करूं? यहां कोई आदमी नहीं है। आगंतुक व्यक्ति ने छूटते ही कहा, मैं तो आपको आदमी समझकर ही आया था।

सेठ जी के पास सब कुछ था। एक आदमी नहीं था, इसलिए कुछ भी नहीं था। इसका मतलब यह नहीं है कि आदमी पैदा नहीं होते। पैदा होते हैं, किंतु वे बनते नहीं। क्योंकि माता-पिता जन्म तो दे सकते हैं, पर जीवन नहीं दे सकते। जीवन के बिना जन्म की अर्थवत्ता भी क्या है? आदमी, आदमी न हो तो उसके आदमी बने रहने का प्रयोजन ही क्या है? इस प्रश्न ने धर्मगुरुओं, धर्माचार्यों, संतों और धर्म संस्थाओं को चुनौती दी कि या तो वे कोई ऐसा नुस्खा ईजाद करें, जो आदमी को आदमी बना सके, अन्यथा धर्म और धर्मगुरुओं की उपयोगिता विवादास्पद हो जाएगी।

सामान्य तौर पर देखें-समझें तो देश आजाद हुआ और इसके साथ ही देश में अनुशासनहीनता और चरित्रहीनता को भी आजादी मिल गई। इसका इलाज तो जरूरी है। इसके लिए हमें प्रयास करना होगा। कई बार मन में आता है कि कितना प्रयास करें। हम तो कब से कोशिश कर रहे हैं, लेकिन लोग हैं कि समझते ही नहीं। ऐसे में सूर्य को देखो। सूर्य से मत पूछो कि उसने आज तक कितना अंधकार मिटाया, उसका काम अंधकार मिटाने का है। रात को फिर अंधकार घिर आता है। इसकी वह चिंता नहीं करता। शाम ढलते ही प्रतिदिन अंधकार अपना साम्राज्य जमा लेता है, इस बात की परवाह किए बिना सूरज अगली सुबह फिर अपना दायित्व निभाने आ जाता है।

यदि हमें आदमी बनाना है तो वह समाज से नहीं, व्यक्ति से बनेगा, व्यक्ति-सुधार से समाज-सुधार की बात जितनी युक्तिसंगत है, उतनी ही सरल भी। आदमी के सुधार बिना सारी योजना विफल हो जाती है, सारा चिंतन अर्थहीन रह जाता है। जिस प्रकार प्राण के बिना इंद्रियां अर्थहीन हो जाती हैं, वैसे ही व्यक्तिके सुधार बिना समाज-सुधार का स्वप्न बेकार होता है।

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From: Jansatta

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