Thursday, September 9, 2021

असंतोष की फसल


आमतौर पर हर साल बुआई सत्र शुरू होने से पहले केंद्र सरकार अनाज का समर्थन मूल्य घोषित करती है। इसका एक मकसद यह भी होता है कि इसके मद्देनजर किसान बुआई के लिए फसलों का रकबा बढ़ाने या घटाने का फैसला आसानी से कर सकें। न्यूनतम समर्थन मूल्य का अर्थ है कि किसान को फसल की कम से कम उतनी कीमत मिलेगी ही, जो सरकार ने तय की है। अभी खरीफ की फसल तैयार भी नहीं हुई है और सरकार ने रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिया है। गेहूं की कीमत में सबसे कम यानी प्रति क्विंटल पर महज चालीस रुपए की बढ़ोतरी की है। यह पिछले बारह सालों में सबसे कम बढ़ोतरी है। मगर दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों पर सौ रुपए से लेकर चार सौ रुपए तक बढ़ोतरी की गई है। सरकारी बयान में कहा गया है कि नई दर से गेहूं पर लागत का सौ फीसद लाभ मिलेगा। सरकार ने अनुमान लगाया है कि गेहूं की उत्पादन लागत करीब एक हजार रुपए प्रति क्विंटल आएगी और नई दर से उसके लिए दो हजार पंद्रह रुपए मिलेंगे। इस तरह सरकार का इरादा अगले दो सालों में फसलों का लाभ डेढ़ गुना तक करने का है।

दलहनी, तिलहनी फसलों और मोटे अनाज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य अधिक देने के पीछे सरकार की मंशा समझी जा सकती है। इस वक्त सरकार को सबसे अधिक मुश्किल खाद्य तेलों और दालों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने में पेश आ रही है। खाद्य तेल का आयात नहीं होता, इसलिए उसका इरादा है कि सरसों, सूरजमुखी आदि तिलहनी फसलों की पैदावार बढ़ाई जाए, ताकि अगले वर्ष से खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भर हुआ जा सके। इसी तरह दालों का उत्पादन बढ़ाने पर उसका जोर है। हालांकि भारत में कई दालों का उत्पादन जरूरत से ज्यादा होता है। पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि जिन दालों का उत्पादन अधिक हुआ, उनकी कीमतों में भी संतोषजनक नियंत्रण नहीं हो पाया। मोटे अनाज यानी ज्वार, बाजरा, मक्का आदि के उत्पादन में भी काफी कमी देखी जा रही है, इसलिए शायद उनकी कीमतें बढ़ने से किसान इन्हें बोने को प्रोत्साहित हों। मगर नए न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर किसान संतुष्ट नजर नहीं आ रहे।

किसानों की मांग रही है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार फसलों के दाम उनकी लागत का डेढ़ गुना किए जाएं। स्वामीनाथन आयोग ने लागत में केवल खाद, बीज, कीटनाशक, सिंचाई आदि पर आने वाले खर्च को नहीं, बल्कि किसान के श्रम को भी जोड़ा था। उस हिसाब से फसलों की कीमत कहीं अधिक बनती है। फिर किसानों की मांग यह भी है कि न्यूनम समर्थन मूल्य की गारंटी दी जाए, क्योंकि उनका अनुभव है कि स्थानीय व्यापारी सरकार की तरफ से तय कीमतों पर फसल नहीं खरीदते, उससे काफी कम और मनमानी दर पर खरीदते हैं। केवल पच्च्चीस फीसद किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिल पाता है। पिछले दिनों गन्ने की कीमत में महज पांच रुपए की बढ़ोतरी की गई। जबकि हकीकत यह है कि पिछले एक साल में ही डीजल, उर्वरक, कीटनाशक और बीज की कीमतों में डेढ़ गुना से अधिक बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में किसानों को मिलने वाली बिजली की दरें बहुत असमान हैं। मसलन उत्तर प्रदेश के किसानों को हरियाणा जैसे राज्यों की तुलना में कई गुना अधिक बिजली बिल चुकाना पड़ता है। इन सब विसंगतियों के मद्देनजर नए समर्थन मूल्य को लेकर असंतोष स्वाभाविक है।

The post असंतोष की फसल appeared first on Jansatta.



From: Jansatta

Read Full Post ㅡ https://ift.tt/3yVSpXB

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार...

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार... From: ABP Live Read Full Post ㅡ htt...