Tuesday, September 28, 2021

बैंकिंग सेवाओं का बदलता परिदृश्य

विजय प्रकाश श्रीवास्तव

बैंकिंग की काफी जरूरतें बैंक से बाहर दुकान या घर से पूरी हो जाती हैं। ऐसे में बैंक शाखाओं की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर सवाल उठना लाजिमी है। आजकल वित्तीय जगत में एक नया शब्द ‘शाखारहित बैंकिंग’ सुनने को मिल रहा है।

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने 1994 में कहा था कि ‘बैंकिंग जरूरी है पर बैंक नहीं’। उस वक्त उनके इस कथन का आशय भविष्य की नवीन वित्तीय प्रौद्योगिकियों में मौजूद संभावनाओं से था। बिल गेट्स को आने वाले वक्त की तस्वीर इस तरह दिख रही थी कि बैंकिंग और वित्तीय लेनदेनों के नए मंचों की उपलब्धता ग्राहकों के लिए बैंक जाने की जरूरत कम कर देगी। यही तस्वीर आज हम सबके सामने हकीकत के रूप में मौजूद है। चाहे वह किसी भी क्षेत्र की बात क्यों न हो, प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में विकसित देश हमेशा से आगे रहे हैं।

पर आज भारत जैसे विकासशील देश में भी वित्तीय प्रौद्योगिकी का जादू सर चढ़ कर बोल रहा है। इसी प्रौद्योगिकी को फिनटेक का नाम दिया गया है। फिनटेक ने वित्तीय लेनदेन को कितना आसान बना दिया है, यह पान, चाट-पकौड़ी की छोटी-छोटी दुकानों से लेकर सब्जी-फल वालों की दुकानों और फेरियों पर लगे क्यूआर कोड के छोटे बोर्ड पर नजर डाल कर समझा जा सकता है। इस क्यूआर कोड के जरिए दस-बीस रुपए जितनी छोटी रकम का भी भुगतान मोबाइल फोन में मौजूद एप के जरिए किया जा सकता है। यह एप किसी मोबाइल वालेट का हो सकता हैं या यूनाइटेड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआइ) का या दोनों के सम्मिलित रूप का भी।

वर्ष 2016 में जब नोटबंदी की गई थी तब यह चर्चा जोरों पर थी कि इसका एक मकसद देश को नकदी रहित अर्थव्यवस्था की ओर ले जाना भी है। इलेक्ट्रॉनिक निधि अंतरण का बढ़ता प्रयोग दशार्ता है कि वास्तव में अब नकद लेनदेन से लोग इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन की ओर मुखातिब हो रहे हैं, चाहे यह मोबाइल वालेट के माध्यम से हो या फिर एनईएफटी (नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर) अथवा आरटीजीएस (रीयल टाइम ग्रॉस सैटलमेंट) जैसी सुविधा के जरिए।

करीब डेढ़ दशक पहले भारत में बैंकों ने कोर बैंकिंग को अपनाना शुरू किया था, जिसमें एक बैंक की सभी शाखाओं को आपस में जोड़ दिया गया। आपका खाता एक बैंक की भोपाल स्थित शाखा में हो तो आप उसी बैंक की बीकानेर स्थित शाखा में जाकर अपने भोपाल की शाखा में पैसे जमा कर सकते थे। इंटरनेट बैंकिंग ने शाखा में जाने की जरूरत कम कर दी। पैसों का लेनदेन घर बैठे किया जा सकता था। एक समय था जब व्यापारी वर्ग चेक और ड्राफ्ट के माध्यम से ही पैसों का लेनदेन करता था। इस प्रक्रिया में एक पक्ष से दूसरे पक्ष को पैसे मिलने में कम से कम तीन दिन लगते थे। आज चेक और ड्राफ्ट पर लोगों की निर्भरता काफी कम हो गई है। दरअसल बैंक में ही जाने की जरूरत कम हो गई है।

आज बैंकिंग प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव आ चुका है। यह प्रौद्योगिकी की बदौलत ही संभव हो पाया है। नकद निकालना हो तो एटीएम हैं। और अब तो आपको अपने बैंक के एटीएम तक भी जाने की जरूरत भी नहीं है। खाता किसी बैंक का हो, पैसा आप दूसरे बैंक के एटीएम से भी निकाल सकते हैं। कहीं पैसा भेजना हो तो एनईएफटी या आरटीजीएस से घंटे भर में पहुंच सकता है। जो एनईएफटी सेवाएं पहले आठ-दस घंटो के लिए ही उपलब्ध हुआ करती थीं, अब पूरे साल चौबीसों घंटे हाजिर हैं। यानी बैंक खुले हों या बंद, आप अपना पैसा छुट्टियों के दिन भी दूसरे के खाते में भेज सकते हैं या दूसरे से अपने खाते में मंगा सकते हैं।

दुकानों पर अथवा आॅनलाइन खरीदारी में आप क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, मोबाइल बैंकिंग से भुगतान कर सकते हैं। सभी बड़े बैंकों के अपने एप हैं जिसे खातेदार मोबाइल में डाउनलोड कर उसी से अपना बैंक खाता संचालित कर सकता है और दूसरी बैंकिंग सेवाएं भी हासिल कर सकता है। यह सब इसलिए संभव हो पाया है कि प्रौद्योगिकी ने सारे बैंकों को आपस में जोड़ कर बड़ा नेटवर्क खड़ा कर दिया है। इन्हीं सबका परिणाम है कि अब बैंक की शाखाओं में भीड़ कम दिखने लगी है। बैंकिंग की काफी जरूरतें बैंक से बाहर दुकान या घर से पूरी हो जाती हैं। ऐसे में बैंक शाखाओं की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर सवाल उठना लाजिमी है। आजकल वित्तीय जगत में एक नया शब्द ‘शाखारहित बैंकिंग’ सुनने को मिल रहा है। बैंकिंग विषय के जानकारों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि हम क्रमश: शाखारहित बैंकिंग की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं।

पिछले डेढ़ साल में कोरोना महामारी से उत्पन्न हालात ने व्यापार उद्योग को झकझोर कर रख दिया। इसका असर बैंकों के कारोबार भी पड़ा है। पर एक बात ध्यान देने योग्य है और वह यह कि एक तरफ जब पूर्णबंदी में निजी व सरकारी दफ्तर, स्कूल, कालेज, यातायात के साधन वगैरह बंद रहे, तब बैंकों को खुला रखा गया और कमोबेश बैंकिंग सेवाएं पहले की तरह जारी रहीं। सरकार ने बैंकों को बंद रखना मुनासिब नहीं समझा। इससे हम अपनी अर्थव्यवस्था में बैंकों का महत्त्व समझ सकते हैं। पर बैंक शाखाएं खुली रहने के बावजूद इनमें ग्राहकों का आना-जाना कम रहा क्योंकि बहुत से मामलों में उनकी बैंकिंग जरूरतें वैकल्पिक बैंकिंग चैनलों के माध्यम से पूरी होती रहीं।

बैंक शाखाओं के घटते महत्त्व को ई-कामर्स की बढ़ती लोकप्रियता से भी जोड़ कर समझा जा सकता है। आपको किराने का सामान और यहां तक कि फ्रिज, वाशिंग मशीन जैसी चीजें खरीदनी हों तो घर से बाहर निकलना जरूरी नहीं है, एप या वेबसाइट पर आदेश देने पर आप के दरवाजे पर ये सामान भिजवा दिए जाएंगे। अगर ऐसा है तो बैंक जाने की भी जरूरत क्यों हो? भारतीय रिजर्व बैंक के आदेश पर बैंकों ने एक और सेवा शुरू की है। अब चुनिंदा बैंक शाखाओं के पैंसठ साल से अधिक के ग्राहकों को कुछ निश्चित बैंकिंग सुविधाएं बैंक घर पर ही उपलब्ध करा दिया करेंगे। हो सकता है कि आगे चल कर इस सुविधा का विस्तार और अधिक शाखाओं में और पैंसठ वर्ष से कम वाले आयु वर्ग के लिए भी शुरू कर दिया जाए।

पिछले कुछ सालों में बैंकों के साथ जो युवा ग्राहकों का बड़ा वर्ग जुड़ा है। नौजवानों को प्रौद्योगिकी से लगाव भी है और इसी वजह से डिजिटल बैंकिंग को उन्होंने हाथों-हाथ लिया है। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विशेषकर जन धन और वित्तीय समावेशन की अन्य योजनाओं के अंतर्गत बैंकों में अब करोड़ों ऐसे लोग खातेदार हैं जो कम पढे-लिखे या अशिक्षित हैं, जिन्हें डिजिटल बैंकिंग समझ में नहीं आती और बैंकिंग सेवाओं से जुड़ने का एकमात्र संपर्क बिंदु वे बैंक की उस शाखा को समझते हैं जहां उनका खाता खुला हुआ है। इसके साथ एक ऐसा वर्ग भी है जो चाहे तो बैंकिंग के वैकल्पिक साधनों का प्रयोग कर सकता है, पर शाखा के भौतिक वातावरण में बैंकिंग करने में ज्यादा सहजता महसूस करता हैं। बैंक शाखाओं की जरूरत फिलहाल इन वर्गों के लिए बनी रहेगी।

अभी तक बैंकों का जो पैसा शाखाओं के तंत्र पर खर्च होता था, उसका एक हिस्सा अब डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्थाओं पर खर्च हो रहा है। बदलते समय की जरूरतों के अनुसार इन व्यवस्थाओं को विस्तार देना और मजबूत करना अब अधिक महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत में बैंकिंग की जो संरचना है और बैंकों का जिस प्रकार का ग्राहक वर्ग है, इन्हें देखते हुए बैंक शाखाओं की उपयोगिता तो बनी रहेगी, पर यह भी तय है कि समय के साथ और अधिक लोग बैंकिंग सेवाओं का लाभ उठाने हेतु बैंक शाखाओं में जाने की आवश्यकता नहीं महसूस करेंगे।

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From: Jansatta

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