Wednesday, September 29, 2021

बैंकिंग सिद्धांत में ‘सेवा दृष्टिकोण’ क्यों गायब होता जा रहा है?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने छठे मुख्य न्यायाधीश रहे एमसी छागला की स्मृति में आयोजित आभासी कार्यक्रम में व्याख्यान देते हुये समाज के बौद्धिकों से जो कुछ आह्वान किया उसका सारांश यही है कि तथ्यपरक आवाज उठाते रहना है। आम जनता से सम्बन्धित बैंकिंग प्रणाली वाले केवल दो मसलों को संक्षेप में बयां कर रहा हूं।

पहला तो यह है कि बैंक जब हमें किसी भी प्रकार का ऋण देता है तो हमसे उस पर ब्‍याज लेता है, लेकिन एक ढेला भी खर्चा नहीं करता है। प्रक्रिया पूरी करने का पूरा खर्च ग्राहकों से ही वसूलता है।

जैसे ही ऋण लिये दो साल हो जायेंगे उसके बाद बैंक बिना आपकी सहमति लिये आपके खाते से कुछ रकम जैसे समझिये 250/- बतौर निरीक्षण शुल्क काट लेगा। निरीक्षण आवश्यक है तो यह शुल्क बैंक को स्वयं वहन करना चाहिये क्योंकि वे हमसे ब्‍याज कमा रहे हैं। बैंकिंग सिद्धांत में ‘सेवा दृष्टिकोण’ क्यों गायब होता जा रहा है? इन सब पर नियामक ध्यान देकर व्यवस्था को कब दुरुस्त करेगा?

गोवर्धन दास बिन्नाणी, बीकानेर

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