Monday, September 13, 2021

अफगान संकट: उपजी कूटनीति की नई इबारत

ब्रिक्‍स बैठक में अफगानिस्तान मसले पर चीन और रूस का साथ पाने के बाद भारत कई और कोशिशों में जुट गया है। आॅस्ट्रेलिया के साथ पहली ‘2+2’ वार्ता में अफगानिस्तान के मुद्दे पर भारत को कूटनीतिक प्रभाव बढ़ाने में सफलता मिली है। साझा घोषणापत्र में आतंकवाद और अफगानिस्तान में समावेशी सरकार की बात उठाते हुए दोनों देशों ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के पहले यह अहम बैठक थी, जिसमें ‘क्वाड’ (क्वार्डिलेरल सिक्योरिटी डॉयलॉग) के एजंडे को एक तरह से नया स्वरूप दिया गया। अब तक एशिया-प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर तक को लेकर बात करते रहे ‘क्वाड’ समूह के एजंडे में अफगानिस्तान का मुद्दा शामिल किया गया है, जिसकी अमेरिका में हो रही बैठक में गंभीर चर्चा होगी। ‘क्वाड’ के जरिए भारत, अमेरिका, जापान और आॅस्ट्रेलिया-अफगानिस्तान में नई कूटनीतिक इबारत को आकार देंगे, जो दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए अहम हो सकता है। साथ ही, मध्य एशियाई क्षेत्र में भारत के हितों को लेकर रणनीतिक नतीजों का संकेत भी दे सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया का बदला रुख
आॅस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री मरीस पेन और रक्षा मंत्री पीटर डटन ने अपने तीन दिवसीय भारत दौरे के दौरान 10 से 12 सितंबर तक अपने भारतीय समकक्षों एस जयशंकर और राजनाथ सिंह के साथ आमने-सामने बैठकर सुरक्षा, कूटनीति और सामरिक महत्त्व के मुद्दों पर चर्चा की। सामरिक सहयोग बढ़ाने पर दोनों देशों में सहमति बनी। इस मुलाकात ने शुरू होने के साथ ही भारत-आॅस्ट्रेलिया संबंधों ने कई मील के पत्थर पार कर लिए थे। दरअसल, वार्ता का ‘2+2’ ढांचा कुछ खास देशों के लिए होता है।

भारत अब तक इस प्रकार की बैठकें अमेरिका, जापान, और रूस के साथ करने को ही राजी हुआ है। ये सभी वही देश हैं, जिनके साथ भारत के सामरिक, सुरक्षा और कूटनीतिक तौर पर सबसे मजबूत रिश्ते हैं। जाहिर है, भारत और आॅस्ट्रेलिया के संबंधों के लिए यह एक बड़ा अवसर रहा। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि इस मुलाकात के साथ ही भारत के ‘क्वाड’ के हर देश के साथ ‘2+2’ ढांचे में बातचीत होने लगी है। अगर ‘क्वाड’ के चारों देशों के बीच अलग-अलग द्विपक्षीय संबंधों पर गौर किया जाए तो साफ दिखता है कि भारत और आॅस्ट्रेलिया के संबंध सबसे कमजोर रहे। आॅस्ट्रेलिया ने एक दशक से ज्यादा पहले ‘क्वाड’ से हाथ जोड़ लिए थे और कहा था कि वह चीन को नाराज नहीं करना चाहता। अब उसी आॅस्ट्रेलिया ने अमेरिका और जापान के साथ सैन्य और परमाणु सुरक्षा से जुड़े समझौते करने के बाद भारत के सात सामरिक सहयोग के करार किए हैं।
अफगानिस्तान को लेकर हलचल
तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी सरकार के शीर्ष नेतृत्व की घोषणा कर दी। उसके बाद ‘क्वाड’ की कवायद से इतर आॅस्ट्रेलिया, भारत, अमेरिका और रूस ने आपस में नजदीकी संपर्क बनाया। अमेरिकी खुफिया एजंसी सीआइए के प्रमुख विलियम बर्न्स के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल भारत और पाकिस्तान पहुंचने की तैयारी में है। भारत में ये लोग राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से अफगानिस्तान को लेकर कई मुद्दों पर बात करेंगे। इसके अलावा रूसी सुरक्षा परिषद के सचिव जनरल निकोलाई पात्रुशेव बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, एनएसए अजित डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर से मिलेंगे। अमेरिका और रूस के उच्चस्तरीय अधिकारियों की यात्रा का एजंडा अफगानिस्तान है।

इससे पहले भारत-आॅस्ट्रेलिया ‘2+2’ वार्ता में स्पष्ट कर दिया गया कि जब तक वहां समावेशी सरकार नहीं, तब तक मान्यता नहीं। रूसी जनरल पात्रुशेव के साथ बैठक भारत और रूस के लिए उस मौके की तरह माना जा रहा है, जिसमें दोनों देश अफगानिस्तान को लेकर अपना-अपना दृष्टिकोण साझा करेंगे। उम्मीद की जा रही है कि ‘विस्तारित त्रोइका’ (पाकिस्तान, चीन, रूस और अमेरिका) की कवायद इसके बाद कुछ धीमी पड़ेगी। पिछले हफ्ते रूस ने अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस्लामिक स्टेट (इराक और सीरिया केंद्रित) और ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के मध्य एशिया में खतरों की उपेक्षा का आरोप लगाया था। तब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता भारत के पास थी। अफगानिस्तान पर सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2593 पर मतदान का चीन और रूस ने बहिष्कार किया था।

जिन सवालों पर बात होगी

इस बीच, विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले अमेरिकी दौरे की तैयारियों को लगभग अंतिम रूप दे दिया है। 22 सितंबर से शुरू होने वाले इस दौरे में तीन अहम कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। 23 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ मोदी की द्विपक्षीय बैठक होगी। इसके अगले दिन ‘क्वाड’ देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक होगी।

25 को संयुक्त राष्ट्र में प्रधानमंत्री का संबोधन होगा। इन कार्यक्रमों में ज्यादा फोकस अफगानिस्तान पर रहेगा। ब्रिक्स देशों की बैठक में इसका संकेत मिल चुका है, जिसमें आतंक के खिलाफ साझा नीति और प्रतिरोधी कार्ययोजना तैयार करने पर सहमति बनी थी। इस साल ‘क्वाड’ की एक बैठक आभासी हो चुकी है और अब आमने-सामने की बैठक में अफगानिस्तान, आतंकवाद, हिंद-प्रशांत क्षेत्र और समुद्री कानून को लेकर बात होगी। इन सभी मुद्दों पर चीन ने आक्रामकता दिखाई है। जाहिर है, चारों राष्ट्राध्यक्षों की बैठक के मुद्दों में चीन छाया रहेगा। दूसरे, भारत की चिंता यह भी है कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकवाद के लिहाज से भारत के खिलाफ हो सकता है। पाकिस्तानी खुफिया एजंसी आइएसआइ की अफगानिस्तान में सक्रियता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

क्या कहते हैं जानकार

अफगानिस्तान को लेकर भू-राजनीतिक पुनर्गठन का दौर चल रहा है। अभी अफगानिस्तान के लोग संकट में हैं और हमें सीधे तौर पर या संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें मानवीय सहायता पहुंचानी चाहिए। अफगानिस्तान में भारत की राजनीतिक एवं कूटनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा दौर है। वह विकल्प चुनना होगा, जो सही हो।

  • गौतम मुखोपाध्याय, अफगानिस्तान और सीरिया में भारत के पूर्व राजदूत

हमें दो बातों का ध्यान रखना होगा। यह कोई रहस्य नहीं है कि इस्लामी कट्टरपंथ के आंदोलनों को ताकत देने में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही है। इस बार चीन भी अपने धन के साथ सामने आया है और धन की कमी से जूझ रहे तालिबान ने बिना वक्त गंवाए चीन को अपना सबसे महत्त्वपूर्ण सहयोगी बता दिया।

  • विष्णु प्रकाश, पूर्व राजनयिक

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From: Jansatta

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