Saturday, September 11, 2021

भारत के सुसंस्कारों और अस्मिता की भाषा है हिंदी

डॉ. वीर सिंह

कुछ वर्ष पूर्व उदयपुर स्थित एक विश्वविद्यालय में मेरा परिचय एक व्यक्ति से यह कह कर कराया गया कि वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक हैं। मैंने पूछा किस विषय के, तो प्राध्यापक महोदय के बताने से पहले ही मेरे मित्र ने कहा तहजीब की भाषा के? “तहजीब? वह कौनसी भाषा है?” मैंने पूछा। मेरे प्रश्न का उत्तर मिलता, उससे पहले ही, प्राध्यापक महोदय अपने चेहरे पर असमंजसता की रेखाएं उभारते हुए वहां से धीरे से लुप्त हो गए? उनके पान-चबाते गुस्सैल-से मुखड़े पर मेरे प्रश्न से उपजी असहजता स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी, जैसे कोई झूठ पकड़े जाने के बाद होती है। दिल्ली लौटते हुए मैंने अपने मित्र से फिर तहजीब की भाषा के बारे में पूछा तो उन्होंने उस भाषा का नाम बता दिया? बात यह आई कि जब उस तथाकथित तहजीब की भाषा ने एक सारे के सारे पड़ोसी देश, जिसकी वह राष्ट्रभाषा है, को आतंकवादी बना दिया हो, तो वह कैसे तहजीब की भाषा हुई?

हमारे देश में किसी भी वस्तु-स्थिति के लिए नैरेटिव फिक्स करने का बहुत प्रचलन है। इससे त्वरित सामाजिक-राजनीतिक लाभ मिलता है, और नैरेटिव देने में कोई विधिक अड़चन भी नहीं आती। जब झूठ नहीं चल पाए, जब कोई प्रमाण भी न देना पड़े, जब सत्य से सरलता-पूर्वक बच निकलना हो, और जब दूसरे से प्रतिस्पर्धा में परास्त होने का झंझट भी न पालना पड़े, तो बस एक नैरेटिव गढ़ दो, यदि चल गया तो इससे वातावरण नैरेटिव देने वाले भुड़बसियों के पक्ष में बिना कुछ किए धरे बनने  की सम्भावना  बन जाएगी। भारत में मुगलों के सर्वनाश और अंग्रेजी साम्राज्य के सूर्यास्त के बाद, जब स्वतंत्र भारत भूमि पर हिंदी का सूर्य क्षितिज की ओर बढ़ने लगा और हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखा जाने लगा तो मुगलों के मानस-पुत्रों ने मुगलों द्वारा छोड़ी संकर भाषा (जो मुगलों और भारतवासियों की मौलिक भाषा के युग्म से बनी थी) के लिए एक नैरेटिव गढ़ दिया: तहजीब की भाषा।

जिस भाषा को ढोने वाले मुगलों ने निर्दोषों के खून से होलियां खेलीं, बलात्कार किए, बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन कराए, बच्चों तक को दीवारों में चिनवाया, जजिया-पजिया जैसे कर लगाए, उन आतताईयों, लूटेरों, और आतंकी मुगलों द्वारा लादी गई कुभाषा को अगर “तहजीब की भाषा” कहने लगे, तो समझो इस दुनिया में कुछ भी गलत नहीं। यदि वह तहजीब वाली भाषा होती तो फिर पाकिस्तान एक आतंकी नहीं, तहजीब वाला देश होता। हो सकता है, तालिबानियों की भाषा के लिए भी  “नैरेटिव-जडू” कोई नया नैरेटिव फिक्स कर दें, जैसे “शांति-की-भाषा”!

एक कुनबा ऐसे हिंदी-प्रेमियों का भी है, जो, जब भी हिंदी भाषा की बात चलती है और हर हिंदी दिवस पर, हिंदी की सरलता का रोना रोते हैं। उन्हें हिंदी में नए शब्दों, नए मुहावरों, नए प्रतिमानों के समावेश से डर लगता है और वे हिंदी को “संकर” स्वरूप में ही देखना चाहते हैं तथा उसी को हिंदी के विकास के लिए आवश्यक मानते हैं। एक गिरोह उपहासवादियों का है, जो हिंदी दिवस पर अपने उदगार देने के लिए व्याकुल रहते हैं और हिंदी में प्रयुक्त कुछ “परिष्कृत” शब्दों, जैसे लौहपथ गामिनी, सूचक पट्टिका आदि शब्दों को लेकर भाषा का उपहास उड़ाकर स्वयं अपनी पीठ थपथपा लेते हैं।

भाषा कोई स्थिर तालाब नहीं है कि जहाँ से चली थी अभी वहीँ ठहरी हुई है। भाषा एक बहती नदी है। ठहरा तालाब प्रदूषित हो जाता है, बहती नदी निर्मल, शुद्ध होती है, उसकी धाराओं में विद्युत पैदा करने की ऊर्जा होती है। अगर हम हिंदी में नवीन शब्दों, मुहावरों, लोकोक्तियों, और बिम्बों का समावेश नहीं करेंगे तो उसमें ऊर्जामयी संवेग कैसे आएगा? कठिन अथवा क्लिष्ट शब्द कुछ नहीं होता। जो भी शब्द हमारे मस्तिष्क पटल पर पहली बार अथवा यदा कदा  ही टकराता है, वही हमें क्लिष्ट लगता है, लेकिन वही उपहासवादियों को  किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में छोड़ जाता है। जिसे हम बार बार सुनते हैं, वह हमारे मस्तिष्क के तंतुओं  में समा जाता  है और अन्य शब्दों की तरह “सरल” लगने लगता है।

हिंदी भाषा का दुनिया में इतना जादुई प्रभाव है कि दुनिया की लगभग सभी भाषाओं में हिंदी के शंब्द गूंजते मिलेंगे। सबसे अधिक चर्चा ऑक्सफ़ोर्ड अंग्रेजी शब्दकोष की होती है, जो जिस भाषा के सर्वाधिक प्रचलित शब्दों का समावेश करता है, वे अंग्रेजी भाषा के अभीष्ट शब्द हो जाते हैं। ऑक्सफ़ोर्ड अंगरेजी शब्दकोष अब तक हिंदी के ९५० शब्दों का समावेश कर चुका है और ऐसी सम्भावना है की निकट भविष्य में हिंदी के लाखों शब्द अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओँ में गूंजेंगे।

अंग्रेजी भाषा में नए शब्दों का स्वागत होता है और लम्बे और क्लिष्ट से लगने वाले शब्दों पर भी अंग्रेजी बोलने वाले गर्व करते हैं। भारत में संवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषाओँ के अतिरिक्त  सैकड़ों आंचलिक भाषाएं और बोलियां हैं जिनके सुरिचिपूर्ण और प्रचलित शब्दों का हिंदी में समावेश होते रहना चाहिए। इससे हिंदी और भी समृद्ध और प्रभावशाली होगी।    

संस्कृति सभ्यता का पर्यावरण होती है और भाषा संस्कृति का। संस्कृति भाषा का सृजन और विकास करती है और भाषा संस्कृति को विशिष्ठ संस्कारों से सींचती है। कोई भी संस्कृति अपनी सृजनशीलता से कितनी समृद्ध है, इसका प्रमुख श्रेय उसकी भाषा को जाता है। किसी देश की सृजनात्मक उपलब्धियां उसके नागरिकों की वैज्ञानिक और तकनीकी दक्षता से नहीं, उसकी राष्ट्रीय और आंचलिक भाषाओं से आंकी जानी चाहिए, क्योंकि भाषा ही वैज्ञानिक और तकनीकी दक्षता की संवाहक होती है। किसी सभ्यता की यशगाथाएँ उसकी अपनी भाषा में होती हैं और भाषा को ही सभ्यता के यश और भौतिक-सांस्कृतिक वैभव का श्रेय जाता है। 

प्राचीन भारतीय संस्कति के वैभव और यशगाथाओं का श्रेय संस्कृत को जाता है और आधुनिक भारत के गौरव की कहानी हिंदी लिखती है। संस्कृत को दुनिया की श्रेष्ठतम भाषा इसलिए माना जाता है क्यों कि  वेद-पुराण, उपनिषद, ग्रंथ, काव्य, कथा आदि विधाओं का जितना उत्कृष्ट और अधिकतम सृजन संस्कृत में हुआ, उतना आजतक किसी अन्य भाषा में संभव नहीं हो पाया। मानव सभ्यताओं के हजारों वर्षों लम्बे इतिहास में कोई भी भाषा संस्कृत को सृजनात्मक चुनौती देने में सक्षम नहीं हो पाई।

संस्कृत की महिमा का कोई समान्तर नहीं। मध्ययुग में रचित गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस संभवतः ज्ञात इतिहास में सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला और भारतीय जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला ग्रंथ है, जो हिंदी की एक सहोदरा अवधि भाषा में रचित है। अवधि भाषा ने  भारतीय संस्कृति पर कितना रचनात्मक प्रभाव छोड़ा है, यह रामचरितमानस की विश्वव्यापी कीर्ति से हम जान सकते हैं।

मध्य युग से लेकर १९ वीं शताब्दी तक देश में कुछ विदेशी भाषाओं सा संक्रमण हुआ जो मध्य युग के विदेशी घुसपैठियों और आततायियों के साथ देश में भाषाई खरपतवारों के समान आईं, तथा बाद में धीरे धीरे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता की ओर अग्रसर अंग्रेजी अपना वर्चस्व बनाती गई।

किसी देश, मजहब या जमात का अपयश और अमानवीयता भी उसकी भाषा की देन है। संस्कृत ने देवी-देवता पैदा किए हैं। तालिबानियों, फिलिस्तीनियों और पाकिस्तानियों की भाषा ने आतंकवादी।  अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में  देखा जाए तो अरबी, उर्दू और अंग्रेजी जैसी चंद भाषाओं के शासकों ने ही दूसरे देशों पर आक्रमण किए हैं, लूट मचाई है, दूसरों की प्रभुसत्ताओं को चुनौती दी है। संस्कृत, हिंदी, और भारत की आंचलिक भाषाओं वालों ने दूसरों की भूमि और प्रभुसत्ता को कभी नहीं रौंदा।

विश्वपटल पर एक नवीन उदाहरण अफगानिस्तान का है जहाँ आतंकवादी संगठन तालिबान ने एक लोकतान्त्रिक सरकार का न केवल तख्ता पलट दिया वरन लाखों नागरिकों को बेघरबार भी कर दिया और हज़ारों निर्दोषों को मौत के घाट उतार दिया। तब कोई यह कहने लगे कि उनकी भाषा का क्या दोष है, तो यह मानवीय भाषाओं का अपमान होगा। वास्तव में उनके आतंकवादी होने के कुसंस्कार उनकी भाषा में ही बसे हैं। उनकी बुद्धि को बोन्साई बना देने और उनकी सोच को विकृत बनाए रखने का डीएनए उनकी भाषा में ही है।

भारत की ख्याति, भारत का मान-सम्मान, भारत की एकात्मता और भारत की अस्मिता के केंद्र में हिंदी भाषा है। एक ओर जहाँ हिंदी के समग्र विकास के लिए और उसके रचनात्मक प्रकाश से विश्व को प्रज्ज्वलित करने के लिए एक सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक वातावरण के सृजन की आवश्यकता है, वहीं भारत भूमि पर आतंकवाद के विष-बीज बोन वाली और राष्ट्रीय एकात्मकता पर चोट करने वाली भाषा/ भाषाओं पर भी अंकुश लगाने की आवश्यकता है। हिंदी पर गर्व करने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि आज यह दुनिया में सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषाओं में से एक है और इसका भविष्य बहुत ही उज्जवल है।

लेखक जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे हैं।

The post भारत के सुसंस्कारों और अस्मिता की भाषा है हिंदी appeared first on Jansatta.



From: Jansatta

Read Full Post ㅡ https://ift.tt/2X9hQIi

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार...

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार... From: ABP Live Read Full Post ㅡ htt...