संजीव पांडेय
चीन ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून की संयुक्त राष्ट्र की संधि (यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी) को चुनौती देने की ठान ली है। इसी दिशा में उसने बड़ा कदम उठाते हुए दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर पर अपने समुद्री कानून लागू कर दिए हैं। इन कानूनों के जरिए चीन सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय समुद्र में अपनी दखल बढ़ाते हुए विस्तारवादी नीतियों को बेहिचक अंजाम दे रहा है। इस नए समुद्री कानून के मुताबिक अब चीन की समुद्री सीमा से गुजरने वाले सभी समुद्री जहाजों को चीनी अधिकारियों को तमाम तरह की जानकारियां देनी होंगी।
अगर किसी विदेशी समुद्री जहाज ने चीन को मांगी गई जानकारी नहीं दी तो उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए स्वतंत्र होगा। दरअसल समुद्री नौवहन को अपने हिसाब से संचालित करने के लिए चीन ने यह कानून थोपा है। चीन इस कानून के बहाने दक्षिण चीन सागर में दूसरे देशों की समुद्री सीमा में घुसपैठ करेगा और साथ ही दक्षिण चीन सागर के नौवहन मार्ग पर अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश करेगा। दरअसल दक्षिण चीन सागर से दो सौ छियालीस लाख करोड़ रुपए का व्यापार होता है। इस रास्ते से भारत भी सलाना लगभग चौदह लाख करोड़ का कारोबार करता है। दरअसल यह दुनिया का एक महत्त्वपूर्ण नौवहन मार्ग है, जिससे दुनिया के कुल समुद्री कारोबार का एक तिहाई कारोबार होता है।
आशंका जाहिर की जा रही है कि चीन नए समुद्री कानून के बहाने पूर्वी चीन सागर और दक्षिण चीन सागर जाने वाले विदेशी जहाजों को परेशान करेगा। इससे कई देशों के साथ चीन का विवाद खड़ा होने का खतरा सर पर है। जापान अपनी ऊर्जा क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने लिए पेट्रोलियम पदार्थों का बड़ा आयात इसी रास्ते से करता है। समुद्री क्षेत्र को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद भी किसी से छिपा नहीं है। नए समुद्री कानून की आड़ में चीन भारत जैसे देश के आर्थिक हितों को भी प्रभावित करेगा क्योंकि भारत के कुल समुद्री व्यापार का लगभग पचपन फीसद कारोबार दक्षिण चीन सागर के रास्ते से ही होता है।
चीन की इस नई हरकत का असर अब यह पड़ेगा कि जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान के कई देशों के साथ होने वाले व्यापार में भी भारत के लिए बाधाएं खड़ी हो सकती हैं। वियतनाम के समुद्री क्षेत्र में मौजूद गैस और तेल की खोज के लिए भारत और वियतनाम के बीच समझौता भी हुआ है। चीन शुरू से इस समझौते पर आपत्ति जताता रहा है। चीन का दावा है कि वियतनाम जिस समुद्री क्षेत्र को अपना बताता है, वास्तव में वह चीन का समुद्री क्षेत्र है।
समुद्री क्षेत्र में चीनी विस्तार की नीति स्पष्ट है। चीन न तो इतिहास की परवाह करता है, न ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संधियों को मानता है, बल्कि अपने गलत दावों को मजबूत करने के लिए वह इतिहास का इस्तेमाल अपने हिसाब से करता है। विस्तारवाद को अंजाम देने के लिए इतिहास के प्रमाणों के साथ तोड़-मरोड़ भी करता ही रहा है। चीन ने फिलहाल जो समुद्री कानून बनाए हैं, वे अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों का स्पष्ट उलल्घंन हैं।
नदियों और समुद्र में अपनी विस्तारवादी नीतियों के कारण चीन दूसरे साम्यवादी देशों से भी उलझता रहा है। वियतनाम और रूस इसके उदाहरण हैं। पिछली सदी में साठ के दशक में चीन और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच संघर्ष हुआ था और इस संघर्ष का कारण उसरी नदी के द्वीप थे, जिन पर चीन अपना दावा करता था। अब वह वियतनाम के समुद्री इलाके में घुसपैठ कर रहा है। गौरतलब है कि चीन और वियतनाम के बीच संघर्ष भी हो चुका है।
चीन ने दक्षिण चीन सागर में कई मुल्कों को परेशान कर रखा है। वह दक्षिण चीन सागर में वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस के समुद्री क्षेत्र पर दावे ठोकता रहा है और इन्हें अपना क्षेत्र बताता रहा है। हालांकि इस तरह के दावे वह लंबे समय से करता रहा है और इनके पक्ष में इतिहास का हवाला भी देता रहा है। चीन मिंग शासकों के समय में किए गए समुद्री सैन्य अभियान के आधार पर कई समुद्री इलाकों पर दावे करता रहा है। कोरोना काल में भी चीन इस काम में पीछे नहीं रहा।
जब दुनिया कोरोना से निपटने में लगी थी तो चीनी जहाज वियतनाम के समुद्री इलाके में घुसपैठ कर रहे थे। चीन ने वियतनाम के मछुआरों की नावें तोड़ दी थीं। दक्षिण चीन सागर में मलेशिया के तेल खनन जहाजों के साथ उसका टकराव हो गया। इंडोनेशिया ने भी आरोप लगाया कि चीन ने उसके विशिष्ट समुद्री आर्थिक क्षेत्र में घुसपैठ करने की कोशिश की।
समुद्री नौवहन क्षेत्र में चीनी प्रभुत्व मजबूत करने की रणनीति के पीछे इरादे स्पष्ट हैं। चीन सड़क और रेल परिवहन के रास्ते में भू-राजनीतिक खतरे को भांपता रहा है। मसलन, बेल्ट एंड रोड पहल के मध्य एशिया में विस्तार के रास्ते में कई बड़े खतरे हैं। जैसे अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आतंकवाद चीनी आर्थिक विस्तारवाद के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया है।
वैसे में चीन दक्षिण चीन सागर से लेकर अरब सागर तक के क्षेत्र पर अपने प्रभुत्व को सोची-समझी रणनीति के साथ बढ़ा रहा है। क्योंकि वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से निकलता है। इसलिए समुद्री नौवहन पर अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए चीन खुल कर अपनी सेना का इस्तेमाल कर रहा है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने समुद्र में अपनी ताकत बढ़ाई है।
आज चीन के पास एक बडी नौसेना है जो दक्षिण चीन सागर से लेकर अरब सागर तक अपनी ताकत को दिखा सकती है। चीनी नौसेना के पास तीन सौ पचास समुद्री जहाज और पनडुब्बियां हैं। जबकि अमेरिकी नौसेना के पास दो सौ तिरानवे समुद्री जहाज हैं। इसके अलावा चीन ने समुद्री क्षेत्र में अपनी ताकत और बढ़ाने के लिए मिसाइल मारक क्षमता को भी मजबूत किया है। चीन के पास वर्तमान में एक हजार दो सौ पचास बैलेस्टिक एवं क्रूज मिसाइल हैं।
चीन ने रूस के साथ सैन्य सहयोग कर समुद्र में अपनी ताकत बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। रूस की एस-400 और एस-300 मिसाइल प्रणालियां भी चीन को दक्षिण चीन सागर में मजबूत करेंगी। दरअसल चीन समुद्र में अपनी ताकत को बढाने के लिए म्यांमा, थाइलैंड, सिंगापुर, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, केन्या, सेशल्स, तंजानिया, अंगोला और ताजिकिस्तान में सैन्य अड्डों के विस्तार की योजना पर काम कर रहा है। जिबूती में चीन का सैन्य अड्डा पहले से ही है।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि उसे अब बड़ा खतरा अमेरिका और भारत के बीच संभावित सहयोग से है। एशिया में भारत चीन को चुनौती पेश कर रहा है। वैसे में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका और भारत का गठजोड़ चीन के लिए चुनौती है। चीन रणनीतिकारों का मानना है कि अमेरिका और भारत मिल कर मलक्का जलडमरूमध्य को जाम कर सकते हैं। इस डर की वजह से ही चीन ने 2008 में अदन की खाड़ी में अपनी सैन्य मौजूदगी दर्ज करा दी थी। 2013 में शी जिनपिंग के सत्तासीन होने बाद समुद्री इलाके में चीन की ताकत बढ़ाने के फैसले पर तेजी से काम हुआ। समुद्री सिल्क रूट को अंतिम रूप दिया गया।
चीन ने कई देशों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाया, वहां बंदरगाहों के विकास का काम ले लिया। श्रीलंका, म्यांमा, पाकिस्तान जैसे देश में बंदरगाहों के विकास का काम चीन ने लिया। यहां भारी निवेश चीन ने किया। इसके लिए पीछे चीन का उद्देश्य साफ है। चीन भविष्य में इन बंदरगाहों पर अपनी सेना की मौजूदगी करवाएगा।
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