Friday, September 24, 2021

प्रतिस्पर्धा बनाम लोकतंत्र

जीवन के किसी भी क्षेत्र में हम सब सक्रिय हों। प्रतिस्पर्धा लाजिमी है। इससे उत्कृष्ट और सर्वश्रेष्ठ का सृजन होता है। हम प्रतियोगी परीक्षा में बैठ रहे हों या खेल का मैदान हो। प्रतियोगी परीक्षा में प्रतिस्पर्धी एक-दूसरे के अदृश्य होते हैं। मगर यह जानते हुए कि हम सब एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी हैं, एक दूसरे से दुश्मनी का भाव नहीं पालते हैं। प्रतियोगिता के पूर्व और बाद में मित्रवत बातचीत, व्यवहार करते हैं। राजनीति में भी प्रतिस्पर्धी होते हैं। राजनीतिकों के तो दलों के भीतर और बाहर यह होते हैं। बावजूद इसके सबके एक दूसरे के साथ औपचारिक, अनौपचारिक संबंध होते हैं। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।

व्यक्ति के जीवन में प्रतिस्पर्धी नहीं हो तो उसके लापरवाह और गैरजिम्मेदार बने रहने का खतरा है। ऐसी दशा में उससे बराबर गलतियां होने की संभावना बलवती होगी। हालांकि कुछेक लोग जो गुलाम मानसिकता के होते हैं, वे अपने मालिक को खुश करने के लिए अपने सहयोगियों से जबरन प्रतिस्पर्धा मोल ले लेते हैं। कई बार ये बिना सरोकार के होते हैं और कई बार सरोकार सहित भी होते हैं। मगर कुछ लोग आदतन अवरोधक स्वभाव के होते हैं। जाहिर है, नेतृत्व अगर किसी नेता से नाराज हो जाए तो अन्य नेता भी संबंधित कार्यकर्ता के प्रति कृत्रिम प्रतिस्पर्धा का प्रदर्शन करते हैं। यह इस हद तक बढ़ जाता है कि पार्टियों में टूट की नौबत आ जाती है।

दरअसल, हमारे ऊपर लोकतंत्र थोप दिया गया, मगर समाज लोकतांत्रिक नहीं हो पाया है। नतीजतन लोकतांत्रिक मानकों और मूल्यों की समझ अभी विकसित नहीं हो पाई है। गनीमत है कि संविधान निमार्ताओं ने हमें उम्दा संविधान दिया और आज तक लोकतंत्र का कारवां आगे बढ़ रहा है।
’मुकेश कुमार मनन, पटना, बिहार

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From: Jansatta

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