Sunday, September 12, 2021

हिंदी बनाम अंग्रेजी

जब हमारा देश आजाद हुआ था तो सभी के मन में यह विचार स्वाभाविक रूप से आया था कि आजाद भारत की अपनी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। इसलिए संविधान निर्माण के समय इस बात को ध्यान में रख कर यह विचार किया गया कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी होनी चाहिए। संविधान सभा के समस्त सदस्यों ने इसका समर्थन किया और तब से हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया।

भारत एक बहुभाषी देश है। यहां के विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न भाषाएं बोली जाती हैं। पंजाबी, मराठी, बंगाली, असमिया, उड़िया, तमिल, तेलुगु आदि भारत की क्षेत्रीय भाषाएं हैं। किसी भाषा को देश की राजभाषा बनाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उसे देश की बहुसंख्यक जनता बोलती और समझती हो। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों में तो हिंदी का बोलबाला है। इसके साथ महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और कश्मीर में भी हिंदी भाषा का बोलबाला है। लगभग साठ करोड़ लोग हिंदी भाषा बोलते और समझते हैं। भारतीय संविधान की धारा 343 के अंतर्गत हिंदी को राजभाषा बनाया गया और धारा 351 के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि हिंदी के प्रचार-प्रसार एवं विकास के लिए सरकार प्रयत्नशील रहेगी। केंद्रीय हिंदी निदेशालय का गठन इसी प्रावधान के अंतर्गत किया गया है।

लेकिन हमारे देश में आज भी हिंदी भाषा को विरोध झेलना पड़ रहा है क्योंकि आज भी कुछ लोग अंग्रेजी सभ्यता एवं संस्कृति के गुलाम बने हुए हैं। अंग्रेजीदां यह छोटा सा तबका सामान्य जनता का शोषण करता है और सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में अंग्रेजी भाषा के पक्षधर है। यह विडंबना ही है कि जो अंग्रेजी भाषा भारत के लगभग दो फीसद लोग भी सही ढंग से नहीं समझ और बोल नहीं पाते हैं, वही अंग्रेजी भाषा आज भी सरकारी कार्यालयों में छाई हुई है। हैरानी की बात तो यह है कि उच्च अदालतों के कामकाज की भाषा भी सिर्फ अंग्रेजी ही है। ऐसे में गैर हिंदी भाषी तो न्याय के लिए बिना अंग्रेजी जानने वाले के अदालत पहुंच ही नहीं सकता। हिंदी को स्थापित करने के लिए अंग्रेजी के प्रचलन को रोकना ही होगा क्योंकि अपनी राष्ट्रभाषा की उन्नति से ही देश की उन्नति हो सकती है। अंग्रेजी देश को एकता के सूत्र में नहीं बांध सकती है। यह कार्य हिंदी भाषा को ही करना होगा।
’अभिषेक तोमर, दिल्ली

उदार बने तालिबान

दो दशक बाद अफगानिस्तान फिर से तालिबान के कब्जे में है। तालिबान अब अफगानिस्तान की नई राजनीतिक सच्चाई है और शरिया ही उसका संविधान होगा। लोगों को उसी के अनुरूप व्यवहार करने की बाध्यता होगी। लेकिन इन सबके बीच अफगानी समाज सहित पूरी दुनिया की निगाहें वहां के लोगों को दी जाने वाले आजादी और अधिकार पर टिकी हैं। खासतौर से महिलाओं और लड़कियों को लेकर नया तालिबान क्या व्यवस्था बनाता है, यह बात देखने वाली होगी। एक बात तो स्पष्ट है कि तालिबानी शासन का मतलब शरिया शासन होगा, लेकिन उसमें उदारता की जमीन कितनी चौड़ी होगी, यह बात गौर करने वाली होगी।

अफगानी महिलाएं तालिबान के पहले वाले शासन में फिर से नहीं जाना चाहतीं, जहां उन्हें अकेले घर से निकलने की आजादी न हो, काम के लिए दफ्तर जाने पर पाबंदी हो और लड़कियों को एक उम्र के बाद स्कूल-कॉलेज जाने पर रोक लगा दी जाए। यह बात एक धार्मिक मान्यता हो सकती है, लेकिन इक्कीसवीं सदी कभी इसकी इजाजत नहीं देती और इन्हीं अधिकारों की मांग के तहत नई सरकार के खिलाफ काबुल में महिलाओं ने मोचेर्बंदी की है। लड़कों को लड़ाका बना दिया जाए और कलम की जगह हाथ में हथियार थमा दिया जाए, यह उनके मानवाधिकारों की बलि चढ़ाने से कम नहीं होगा। अब जबकि तालिबान वहां की नई राजनीतिक शक्ति बन रहा है तो उसे दुनिया के बरक्स अपने समाज को उदार विचारों वाली खिड़की से देखना होगा। नई सरकार को यह समझना होगा कि अफगानिस्तान की धरती दशकों से महाशक्तियों के मुठभेड़ का मैदान रही है जहां मानवाधिकारों को रौंदा गया है। अत: एक उदारवादी और समावेशी व्यवस्था ही अफगानिस्तान की नई पहचान बन सकती है।
’बीरेंद्र कुमार, बेगूसराय (बिहार)

The post हिंदी बनाम अंग्रेजी appeared first on Jansatta.



From: Jansatta

Read Full Post ㅡ https://ift.tt/3hnXMsY

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार...

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार... From: ABP Live Read Full Post ㅡ htt...