Friday, September 24, 2021

नजीर पर नजर

ये किस हिसाब से की
तू ने रौशनी तक्सीम
सितारे मुझ को मिले
माहताब उस का था
– वजीर आगा

हरीश रावत : दलित के बेटे को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाने के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी को धन्यवाद। इतिहास में ऐसे मौके बेहद कम देखने को मिले हैं जब ऐसी नजीर पेश की गई। मैं भगवान और मां गंगा से प्रार्थना करता हूं कि मुझे मेरे जीते जी एक दलित के बेटे को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर देखने का अवसर मिले।

मायावती: चन्नी को सीएम बनाना कांग्रेस का चुनावी हथकंडा है क्योंकि उन्हें कुछ ही वक्त के लिए सीएम बनाया गया है जबकि वह आगामी विधानसभा चुनाव गैर-दलित की अगुआई में लड़ेगी।
योगी आदित्यनाथ : आप सभी याद रखना, अनुसूचित जाति समाज की नींव है। नींव दिखती नहीं है, किंतु भवन की मजबूती उसी पर निर्भर करती है।

चरणजीत सिंह चन्नी के पंजाब का मुख्यमंत्री बनने के बाद हरीश रावत ने सिद्धू के चेहरे पर विधानसभा चुनाव लड़ने की बात कही तो रंधावा ने तीव्र प्रतिरोध किया। सुखजिंदर सिंह रंधावा ने इसे उस भावना का अपमान बताया जिसके तहत चन्नी के हाथों में पंजाब की कमान दी गई थी। हरीश रावत का तुरंत ही हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने मां गंगा से प्रार्थना की कि उत्तराखंड को भी दलित मुख्यमंत्री मिले। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने आश्चर्यजनक ढंग से ट्वीट कर दलित और बहुजन अस्मिता के आगे नमन करना शुरू कर दिया। उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर भाजपा कार्यकारिणी में जातीय समीकरण को साधने की रणनीति बनाई गई।

कांग्रेस ने देश को वर्तमान में इकलौता दलित मुख्यमंत्री दिया तो मायावती को यह चुनावी हथकंडा लगा। उत्तर प्रदेश में मायावती का मुख्यमंत्री बनना ऐतिहासिक घटना थी। देश के सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री बन मायावती ने दलित अस्मिता को नई पहचान दी थी। लेकिन बाद में मायावती को ब्राह्मणों की चिंता सताने लगी। अखिलेश यादव साइकिल को स्टैंड पर लगा कर भगवान परशुराम का फरसा पकड़े हुए थे और उनकी ऐतिहासिक मूर्ति बनाने का वादा कर रहे थे। कांग्रेस के नेता तो 2014 के बाद से खुद को अच्छा हिंदू साबित करने में जुटे ही हुए हैं। चुनावों के समय पंजाब से लेकर उत्तर प्रदेश तक जिस तरह जातीय समीकरण हल करने में सभी दलों ने अपने-अपने मास्टरों को लगा दिया है उसे देखते हुए लग रहा कि जिसका गणित जितना बढ़िया होगा, गद्दी तक वही पहुंचेगा।

औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त होने के बाद आजाद भारत को राजनीतिक और सामाजिक गैरबराबरी विरासत में मिली थी। सत्ता में सभी वर्गों की भागीदारी के लिए नीति नियंताओं को बहुत कुछ करना था। लेकिन जल्दी ही सत्ता में भागीदारी का सवाल सत्ता के समीकरण तक सिमट कर रह गया। बहुत दिनों तक आरक्षण का सवाल सत्ता में भागीदारी का ही सवाल था चाहे वह महिला प्रतिनिधित्व के बारे में हो, दलित या फिर पिछड़ी कही जाने वाली जातियों के बारे में। इन सबका बुनियादी आधार तो सबको सत्ता में हिस्सेदारी दिलाना ही था।

आपको यह तो बताना ही होगा कि आपके सत्ता हासिल करने का मकसद क्या है। दलितों, महिलाओं या अन्य वंचित तबकों के लिए अगुआई चाहते हैं तो उसका उद्देश्य क्या है। आजादी के वक्त उद्देश्य था देश का निर्माण। उसके पहले 1932 में हुआ ‘पूना पैक्ट’ भारतीय राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में मील का वह पत्थर है जिसने वंचित तबकों के लिए सरकार और नौकरियों में आरक्षण का दरवाजा खोला। उसके आधार पर ही वंचित तबकों को सत्ता में हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षित क्षेत्र बने।

सत्ता में हर वर्ग की हिस्सेदारी का यह मकसद आज संसाधनविहीन हिस्सेदारी में पहुंच गया है। पंजाब में जिन 32 फीसद वोटों के समीकरण में उत्तर प्रदेश तक भूकम्प आ गया वे सिर्फ समीकरण के लिहाज से मजबूत हैं। खेती-खलिहानी या अन्य संसाधनों में वे भूमिहीन या वंचित तबके में आते हैं वो भी तब जब हम आजादी की 75वीं सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहे हैं।

चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबका इस बात पर आश्चर्य जता रहा था कि क्या सिखों में भी जातिवाद होता है? चरणजीत सिंह चन्नी के अभाव के दिनों की बातें पंजाब व सिख अस्मिता के संदर्भ में किसी दूसरे ग्रह की कहानी सी लग रही थी क्योंकि चुनावों के पहले तो सामाजिक न्याय की बातें करना शायद राजनीतिक अन्याय जैसा ही होता है। हिस्सेदारी की बात किस तरह सिर्फ भागीदारी में बदल जाती है, पंजाब प्रकरण इसका ताजा उदाहरण है।

निजीकरण के विकास और मध्य-वर्ग के उभार ने इस हिस्सेदारी को अब सिर्फ प्रतीकात्मक ही रहने दिया है। संसद से लेकर सरकारी नौकरी तक में आरक्षण को ही मुक्ति-द्वार मान लिया गया है। व्यक्तिगत मुक्ति में ही सार्वभौमिक मुक्ति खोजी जा रही है। इसी प्रतीकात्मक मुक्ति का फायदा उठाया मुख्यधारा के राजनीतिक दलों ने। उन्होंने हिस्सेदारी को भिन्न-भिन्न पहचानों की भागीदारी में विभाजित कर दिया।

दूसरी तरफ इसी पहचान के आधार पर सत्ता में आने के लिए जातीय राजनीति के खिलाफ भी समीकरण बने। यह सवर्णों की पार्टी है, नेतृत्व सवर्णों का है, के आधार पर भी ध्रुवीकरण हुआ और सफल भी हुआ। बिहार से लेकर अन्य जगहों के क्षेत्रीय समीकरण में हर जगह जाति का जबरदस्त इस्तेमाल हुआ। आगे जाति के ही आधार पर जाटवों और यादवों के खिलाफ समीकरण बने। इन सबका असर है कि बहुजन समाज पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी तक अपनी बुनियादी विचारधारा से समझौता कर बैठी और इसके खिलाफ जाकर इन्हीं समीकरणों को आजमाने लगी।

राजनीति में हर तरह की विचारधारा का अंत हो चुका है। हासिल-ए-मकसद सिर्फ सत्ता है, उसके लिए समीकरण चाहे जो भी हो। लेकिन चुनावों में जीत के बाद बजट और संसाधनों का बंटवारा क्या उस समीकरण के तहत होता है? क्या महिलाओं और वंचित तबकों पर संसाधनों का सबसे ज्यादा खर्च होता है? निजीकरण के इस दौर में सरकारी नौकरियां खत्म हो रही हैं। तो फिर निजी क्षेत्रों में आरक्षण का सवाल कहां है। ठेकेदारी प्रथा व खेती-खलिहानी में जो निजीकरण हो रहा है उसमें जातियों के सवाल कहां दर्ज हो रहे हैं।

जाहिर है कि ये सारे सवाल बहुत पीछे और चंद प्रतिबद्ध जुबानों पर ही हैं। मुख्यधारा के राजनीतिक दल तो दलितों, आदिवासियों और बहुजनों के नायकों की प्रतिमा लोकार्पण तक ही लोक को सीमित रख देते हैं। एक वक्त पंजाब से दूर बिहार में भी किसी ने नहीं सोचा था कि नीतीश कुमार जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री का पद दे देंगे।

फिलहाल राजनीतिक दलों के पाठ्यक्रम का मूल सवाल यही है कि कितनी जातियों का कैसा भी समीकरण कर के बहुमत हासिल कर लो। इस बहुमत का उपयोग वही वर्चस्व वाला समूह करता रहेगा। तभी तो रंधावा की एक घुड़की से मुख्यमंत्री पद के दावेदार हरीश रावत मां गंगा से उत्तराखंड में दलित मुख्यमंत्री की कामना कर बैठते हैं। यह तो मां गंगा ही जानती हैं कि कितना पानी बह गया और सामाजिक न्याय के नाम पर क्या पीछे छूट गया। सच तो यही है कि सामाजिक परिवर्तन का लक्ष्य सत्ता परिवर्तन तक सिमट कर रह गया है।

The post नजीर पर नजर appeared first on Jansatta.



From: Jansatta

Read Full Post ㅡ https://ift.tt/3EM918u

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार...

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार... From: ABP Live Read Full Post ㅡ htt...