Saturday, September 18, 2021

विषमता की जड़ें

संगीता सहाय

विवाह व्यवस्था सामाजिक संरचना की नींव है। मगर थोथी परंपराओं ने इस व्यवस्था को एक पक्ष के लिए वरदान, तो दूसरे के लिए अभिशाप बना दिया है। लड़की के विवाह के लिए परिवार वालों को सैकड़ों चौखट देखने पड़ते हैं। कहीं दहेज की लंबी-चौड़ी सूची, कहीं सौंदर्य, कहीं कुछ तो कहीं कुछ! अगर कहीं बात बन जाती है और भावी वर लड़की की तुलना में कमतर हो, तो भी लड़की वालों और अन्य सबके मनोभाव ऐसे होते हैं मानो उन्हें सारे संसार की खुशी मिल गई हो।

अगर गलती से लड़की अपना सम्मान करना जानती हो, अपनी नुमाइश और दहेज की विरोधी हो, तो विवाह की मंडी में उसका खरीदार मिलना मुश्किल ही होता है। पर यह तो बात हुई उस लड़की की जो कमाऊ है और जरूरत पड़ने पर अपनी जिंदगी अपने दम पर जी सकती है। पर वे लड़कियां, जो इसी उम्मीद के साथ उम्र की सीढ़ियां चढ़ती हैं कि आने वाले वक्त में उनके सपनों का राजकुमार आएगा और उन्हें उनके ख्वाबों की दुनिया में ले जाएगा, जिस पर सिर्फ उनका अधिकार होगा।

उनकी पढाई-लिखाई, हंसना-बोलना, चलना-फिरना सब कुछ विवाह के उद्देश्य से तय होता है। उन्हें उनके परिवार और समाज से यही सीख मिलती है कि विवाह ही तुम्हारे जीवन का अंतिम सोपान है। यह सिलसिला पुराना है। उसमें दहेज के बढ़ते चलन ने वैवाहिक समीकरण को और जटिल बना दिया है। इसके कारण बेमेल विवाह, बाल विवाह, दहेज हत्या, आत्महत्या जैसी वीभत्स घटनाएं आम हो गई हैं। कन्या भ्रूण को गर्भ में ही खत्म करने की प्रवृत्ति में दहेज प्रथा की भूमिका सबसे बड़ी है। हमारे देश में स्त्रियों की स्थिति बहुत बेहतर कभी नहीं रही। पर उसके समूल नाश का प्रश्न जैसा आज उभर कर आ रहा है वैसा कभी नहीं उभरा। देश का घटता लिंगानुपात इसका प्रमाण है।

इन सबका कारण है, सदियों पुरानी वह विकृत सोच, जिसमें पुरुष श्रेष्ठता को हर हाल में सर्वोपरि माना गया। संसार की सारी क्रियाओं-प्रक्रियाओं की रचना पुरुष वर्ग को केंद्र में रख कर की गई। कहा जा सकता है कि पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था की विकृतियां ही वर्तमान समाज की कुरूपताओं और बदहाली का कारण हैं।

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) रिपोर्ट 2018 से पता चलता है कि भारत में जन्म के समय लिंगानुपात वर्ष 2011 के 906 से घट कर वर्ष 2018 में 899 हो गया है। करीब पैंतालीस फीसद लड़कियों की शादी अठारह वर्ष से कम उम्र में कर दी जाती है। भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा प्रकाशित ‘बच्चे भारत की शक्ति’ नामक पत्रिका में बताया गया है कि देश में प्रतिवर्ष एक लाख पच्चीस हजार महिलाएं गर्भधारण के कारण मौत की शिकार हो जाती हैं। प्रति वर्ष एक करोड़ बीस लाख लड़कियां जन्म लेती हैं, लेकिन इनमें से तीस फीसद अपना सोलहवां जन्मदिन नहीं देख पातीं।

कक्षा एक में प्रवेश लेने वाली प्रत्येक दस में से केवल छह लड़कियां पांचवीं तक पहुंच पाती हैं, जबकि 63.5 फीसद किशोर लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि महिलाएं पुरुषों से छह घंटे ज्यादा काम करती हैं, बावजूद उनके काम को महत्त्वहीन समझा जाता है, साथ ही आर्थिक तौर पर वे हमेशा दूसरों की मोहताज रहती हैं। कामकाजी महिला जनसंख्या में से सत्तर फीसद अकुशल कार्य में लगी हैं। पूरी दुनिया में काम के घंटों में स्त्रियों का योगदान साठ फीसद से ज्यादा है, जबकि संपत्ति में उनकी हिस्सेदारी न के बराबर।

वैश्विक लैंगिक सूचकांक 2020 में भारत 91/100 लिंगानुपात के साथ एक सौ बारहवें स्थान पर रहा। इस सूचकांक के विभिन्न मानकों जैसे, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता के क्षेत्र में भारत को एक सौ पचासवां, आर्थिक भागीदारी और अवसर के क्षेत्र में एक सौ चौवालीसवां और शैक्षिक अवसरों की उपलब्धता के क्षेत्र में एक सौ बारहवां स्थान प्राप्त है। वास्तविक स्थिति इससे कहीं ज्यादा भयावह है। बाल-विवाह, भ्रूण-हत्या सहित तमाम लैंगिक असमानताओं का एक बड़ा कारण दहेज है।

सृष्टि ने समाज के संचालन की जिम्मेदारी स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से सौंपी है। उसे एक साथ मिल कर चलाने और बढ़ाने का अधिकार और कर्तव्य भी दोनों को समान है। आज भी आधुनिक कृत्रिम सामाजिक व्यवस्था से दूर रहने वाले हमारे जनजातीय समाज में समतामूलक समाज का स्वरूप देखने को मिलता है। बदलते परिवेश ने आर्थिक और सामाजिक स्वरूप को विस्तृत किया है। लोगों की बदलती सोच ने समाज की बनावट को बदला है। इसी बढ़ते शक्ति, सत्ता तथा अर्थ के महत्त्व के समीकरण ने पुरुषों को शेष सारी संज्ञाओं का केंद्र बनाना आरंभ कर दिया।

धीरे-धीरे पुरुष, स्त्री के भावनात्मक पक्ष और अपनी मजबूत शारीरिक गठन का लाभ उठा कर उस पर हावी होता गया। सत्ता और संपत्ति दोनों पर कब्जा जमाता गया। अपनी झूठी सत्ता और सर्वोच्चता को कायम रखने के लिए नए-नए नियम गढ़ता गया। उसके द्वारा बनाए गए नियम और कानून उसे ज्यादा से ज्यादा सशक्त और औरत को कमजोर बनाता गया। शास्त्रों, पुराणों आदि में भरे गए ईश्वरीय संदेशों, कथ्यों, मुहावरों के जालों में उलझती, जकड़ती औरत अपनी वास्तविक स्थिति और शक्ति को भूलती गई। अंतत: विभिन्न आडंबरों से परिपूर्ण जीवन को ही सत्य मान बैठी। वह मनुष्य से वस्तु बनती गई, जिसका उपभोग पुरुष सत्तात्मक समाज जब, जहां, जैसे चाहा वैसे करने लगा।

एक महत्त्वपूर्ण बात है कि कोई व्यक्ति तभी तक राजा है जब तक लोग उसकी प्रजा बनने को तैयार हों या फिर कोई तभी तक श्रेष्ठ माना जाता है जब उसकी श्रेष्ठता को मान्यता मिलती रहे। विवाह और दहेज के संदर्भ में भी सत्ता, शक्ति और श्रेष्ठता का यही खेल रचा गया। महिलाएं और समाज के तमाम कमजोर वर्ग उसी कपटपूर्ण चाल के शिकार हुए। आज भी यही हो रहा है और तब तक होता रहेगा, जब तक हमारे समाज के सारे वर्ग वास्तविक ज्ञान और चेतना की बदौलत एक समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में अग्रसर नहीं होते और स्वयं आगे बढ़ कर अपने अधिकार और कर्तव्य की पहचान नहीं करते।

बहुत हद तक औरतों ने अपने विकास की मशाल अपने हाथों में ली है, जरूरत है उस मशाल की लौ को और तेज करने की। पिता की संपत्ति में बेटी को समान हक के कानूनी तथ्यों को पूर्णतया जमीन पर लागू करने के लिए माता-पिता के साथ-साथ बेटियों को भी अपने हक के लिए आवाज उठानी होगी। दहेज एक लड़की को उसके इंसान होने के हक से वंचित करता है। वह उसे बाजार की ऐसी मूल्यहीन वस्तु बना देता है, जिसमें खरीद-फरोख्त करने वाला ही पूरी जांच-पड़ताल के बाद भी मनचाही कीमत लेता है।

यद्यपि बहुत सारे पक्षों में आज स्थितियां कुछ बदली हैं। दशकों तक चले और चल रहे महिला आंदोलनों, शिक्षा के प्रसार, पत्र-पत्रिकाओं, टेलीविजन, फिल्मों और विभिन्न सरकारी प्रयास आदि के माध्यम उसे पुरुषों के बराबर तरजीह देने की बात ने समाज में बदलाव के संकेत दिए हैं। औरत धर्म, परंपरा और संस्कार रूपी कछुए के सख्त खोल से सिर निकाल कर कुछ कहने, सुनने लगी है। परंपराओं की सख्त दीवारों में भी काफी दरारें आई हैं। पर अब जरूरत उद्योग बन चुके दहेज पर बोलने, करने और रोकने की है। इसके लिए कदम भुक्तभोगी यानी लड़कियों को ही उठाने होंगे।

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From: Jansatta

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