समाज प्रकृति में लोगों को अपनी सोच, मानसिकता और जीवन शैली को विकसित करने की मांग करता है। समाज के सच्चे प्रतिनिधि उसके लोग हैं, जिनका कर्तव्य भेदभावपूर्ण रहित प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करना होता है। लेकिन जब हम जमीनी हकीकत देखते हैं तो बात कुछ और ही होती है।
लोग समाज में खुद को हैसियत में बांटते नजर आते हैं। जबकि सामाजिक भेद कई प्रतिभाशाली लोगों की प्रतिभा का गला घोंट देता है और यह सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। यही कारण है कि समाज का एक तबका अपनी आकांक्षाओं को अपने मन में ही कुचल कर जीने पर मजबूर है।
पिछड़े वर्ग, उनकी क्षमताओं को प्रोत्साहित करने और ऐसी दुराग्रहों से भरी मानसिकता को हतोत्साहित करने के लिए हमें अपने घरों से ही शुरुआत करने की जरूरत है, क्योंकि ये चीजें पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती हैं।
हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा कि किसी भी स्थिति में वे किसी के साथ भेदभाव न करें। इसलिए समाज के प्रतिनिधि होने के नाते यह हमारा फर्ज है कि हम समाज के उस वर्ग को आगे लेकर आएं जो पिछड़ा हुआ है।
’निखिल रस्तोगी, अंबाला कैंट, हरियाणा
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