प्रतिभा कटियार
किसी के अवचेतन में चुपके से दाखिल होकर कैसे कोई विचार रोपा जा सकता है! इसके बाद फिर वह व्यक्ति वही करेगा, वही सोचेगा जो उसके अवचेतन में रोप दिया गया है। यही नहीं, उस करने और सोचने को लेकर जिद भी करेगा, उसके लिए लड़ेगा भी, क्योंकि चेतन में वह यही समझता है कि यह उसका ही विचार और व्यवहार है। इन सवालों से जूझते हुए ही शायद फिल्म निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन ने क्या कमाल की फिल्म बनाई है ‘इन्सेप्शन’। जब से मैंने इसे देखा है, यह लगातार मेरे जेहन में घूम रही है। जो बात मुझे हमेशा से लगती है कि हम नहीं जानते कि ‘हम नहीं जानते’, यह स्थिति सबसे मुश्किल होती है, क्योंकि इसमें बेहतर होने की, खुद को पलट कर देखने की संभावना कम से कमतर होती है। जहां खुद को देखने की संभावना नहीं होती, वहां बेहतर होने की समझ को विकसित करने की संभावना भी कम ही होती है।
समाज की जो संरचना है, उसमें इसके मजबूत तार हैं। फलां समुदाय ऐसा ही होता है… फलां वर्ग को ऐसा ही करना चाहिए… अच्छे बच्चे ऐसे होते हैं… अच्छे लोग वैसे होते हैं… नैतिकता, संस्कार, परंपराएं, मान्यताएं ये सब सदियों से हमारे अवचेतन में सेंध लगा कर हमारे व्यवहार को नियंत्रित कर रहे हैं और हम खुशी-खुशी हो भी रहे हैं, क्योंकि हम जानते ही नहीं कि जिसे अपनी बात समझ कर हम लड़ने-भिड़ने, हिंसक तक होने को व्याकुल हो उठ रहे हैं, वह असल में हमारा है ही नहीं।
यह काम शिक्षा का होना था कि उसे इन बेवजह के लबादों से मुक्त होना, अपने खुद को खोजना शुरू करना सिखाना था। बने-बनाए रास्तों पर चलना सिखाने के बजाय सिखाना था नए रास्ते खोजना। बताई या सिखाई हुई बातों को सीधे-सीधे मान लेने के बजाय उन्हें खुद परख कर देखना सिखाना था। लेकिन हम हिंदी, अंग्रेजी, गणित सिखाने और सीखने की होड़ में दौड़ पड़े। शायद यह इसी का नतीजा है कि वाट्सऐप और सोशल मीडिया पर झूठ के संजाल ने खासे पढ़े-लिखे लोगों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
कैसे पढ़े-लिखे लोगों की भीड़ किसी निहत्थे, कमजोर व्यक्ति को घेर कर क्रूरता से मार देती है! फिर ऐसे बहुत सारे पढ़े-लिखे लोग उस घटना को देखते-सुनते हुए उसे ठीक भी ठहराते हैं। यह हमारे दिमाग में घुस कर किसी खास वर्ग, समुदाय के प्रति रोपी गई नफरत का नतीजा है। हमारे जन्म से पहले ही हमारा व्यवहार, हमारी प्रतिक्रियाएं, खुशी, गुस्सा, नफरत तय करने वाला समाज हमें कठपुतली की तरह नचाता है और हम नाच रहे हैं। कोई जज जब किसी खास वर्ग के प्रति अटपटे फैसले सुनाता है, कोई नेता जब बेहूदा हिंसक बयान देता है, तब मूल सवाल शिक्षा पर उठता है, क्योंकि हैं तो ये सब शिक्षित ही! यानी शिक्षा ने वह किया ही नहीं, जो उसका मूल उद्देश्य था। बेहतर संवेदनशील मनुष्य बनाना।
तो क्या शिक्षक समुदाय इस बात को समझ पाए? क्या वे खुद को तमाम पूर्वाग्रहों से मुक्त कर पाए? और अगर वे कुछ पूर्वाग्रहों के साथ कक्षा में जा रहे हैं, बच्चों से संवाद कर रहे हैं तो यकीनन वे सारे पूर्वाग्रह, मान्यताएं, व्यवहार बच्चों को सौंप रहे हैं। नतीजतन, पीढ़ी-दर-पीढ़ी सामाजिक विभेद, हिंसा, नफरत अवचेतन में हस्तांतिरत हो रहे हैं। कक्षा में बच्चे गणित के सवाल ठीक से हर करना तो सीख ले रहे हैं, लेकिन उनके मन में अपने गुरु को देख कर किसी खास समुदाय, वर्ग के प्रति उफनाती नफरत भी जगह बना रही है। यह घर में भी हो रहा है, लेकिन स्कूल में ऐसा होना ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि स्कूल वह जगह है, जहां इन तमाम मान्यताओं की दीवार को ढह जाना होता है। समाज की हर समस्या की जड़ में शिक्षा नजर आती है। वह शिक्षा, जो हमें एक-दूसरे के व्यवहार से मिलती है। अगर हम खुद संवेदनशील नहीं हैं तो अपने आसपास के तमाम लोगों को वैसा ही बनाने में कोई न कोई भूमिका निभा रहे हैं।
शिक्षा के दस्तावेज तो मानवीय सरोकारों की पैरोकारी करते हैं, लेकिन उसे अभी स्कूलों में ठीक तरह से आना बाकी है। सिर्फ प्रारंभिक शिक्षा ही क्यों, उच्च शिक्षा में भी इसका शामिल होना जरूरी है। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी है, व्यक्ति के तौर पर हमें शिक्षा के इस मूल मूल्य को समझना कि इसके बिना सब अधूरा है, अधूरा ही रहेगा। क्या होगा उन सौ में से सौ नंबरों का, जिसके सीने में अपने पड़ोसी की मुश्किल में आंख न नम हो, मदद को दौड़ पड़ने की व्याकुलता न हो। किसी भी समाज का मुख्य संस्कार है संवेदना।
इंसान को इंसान समझना। वही नहीं, तो क्या होगा डिग्रियों के ढेर से। अच्छी नौकरी तो मिल जाएगी, ऐशो-आराम के साधन भी जुटा लेंगे, लेकिन वह जो हर वक्त डर-डर कर जीना है, अपने बच्चों की सुरक्षा का सवाल है, बेटियों के वक्त पर घर न लौटने पर बढ़ती हुई धड़कनें हैं, चारों तरफ से आती चीखो-पुकार है… उनका क्या? अगर हमें एक शांत, खूबसूरत, सुरक्षित समाज चाहिए तो संवेदना के सूत्र को किसी मंत्र की तरह आत्मसात करना होगा। ये जो हमारे अवचेतन पर कब्जा करके हमारे सपनों को, हमारे व्यवहार तक को अपहृत कर लिया गया है, सदियों से, उस चक्र से अब बाहर निकलना ही होगा।
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From: Jansatta
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