Tuesday, September 21, 2021

महंगाई से बढ़ती मुश्किलें

सरोज कुमार

महंगाई के आंकड़ों का ऊपर-नीचे होना मायने रखता है। लेकिन उपभोक्ताओं का अनुभव कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। और अनुभव की बात यह है कि बाजार में बिकने वाली हर चीज, चाहे वस्तु हो या सेवा, उसे खरीदने के लिए उपभोक्ता को मशक्कत करनी पड़ रही है।

महंगाई बाजार का ऐसा गुणधर्म है जिसका असर कमाई के रुख पर निर्भर होता है। कमाई अनुकूल तो महंगाई लोगों को खा नहीं पाती। लेकिन जब कमाई घटने लगे तो महंगाई अपना हिंसक रूप दिखाने से भी नहीं चूकती। हिंसा भी ऐसी कि आम आदमी घुट-घुट कर मरता है। देश में कमोबेश आज यही स्थिति है। महंगाई के विपरीत कमाई का रुख अधोमुखी है। महंगाई दर के ताजा आंकड़े सुधार का संकेत बताए जा रहे हैं, लेकिन उधार पर जी रहे आमजन के अनुभव इसके उलट हैं। दरअसल, सवाल महंगाई दर का नहीं, असल सवाल दर के असर का है। खाली जेब पर यह असर इतना गहरा है कि दिनोंदिन लोगों का गुजर-बसर मुश्किल होता जा रहा है।

अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) पर आधारित खुदरा महंगाई दर में मामूली सुधार हुआ और यह जुलाई के स्तर 5.59 फीसद से घट कर 5.30 फीसद पर आ गई। यह भी कि लगातार दूसरे महीने महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की निर्धारित अधिकतम छह फीसद की सीमा के अंदर रही। 2021-22 के लिए आरबीआइ का महंगाई दर का अनुमान 5.7 फीसद है। महंगाई दर में सुधार की यह बात कहने-सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन कमाई कितनी घट चुकी है, इसका कोई सही आंकड़ा हमारे पास नहीं है।

सुधार के आंकड़े में भी आम आदमी का उदास चेहरा ही दिखाई देता है। सुधार की प्रकृति तकनीकी और मौसमी है। आमजन को इसका मामूली लाभ भी शायद ही मिल पाए। खुदरा महंगाई दर में यह सुधार खाद्य पदार्थों, खासतौर से अनाज, चीनी और सब्जियों की कीमतों में कमी और उच्च आधार प्रभाव का परिणाम है। खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट का एक बड़ा कारण अस्सी करोड़ आबादी को हर महीने चार किलो मुफ्त अनाज भी है। बाजार में अनाज की मांग घट गई है। लेकिन मुफ्त योजना से बाहर के खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही हैं।

प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों और खाद्य तेल के महंगा होने का असर लोगों की सेहत पर भी पड़ रहा है। स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ गया है। ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र में जुलाई के 7.4 फीसद के मुकाबले 7.8 फीसद की महंगाई दर जले पर नमक से कम नहीं है। खाद्य पदार्थों की महंगाई दर जुलाई के 3.96 फीसद से घट कर अगस्त में 3.11 फीसद जरूर हो गई, लेकिन इसी श्रेणी में आने वाले तेल और वसा जुलाई के 32.5 फीसद के मुकाबले 33 फीसद, मांस और मछली 8.33 फीसद के मुकाबले 9.2 फीसद महंगे हो गए। दालें भी 8.8 फीसद के उच्चस्तर पर बनी हुई हैं। तो क्या अनाज भी सस्ता तभी तक है, जब तक मुफ्त योजना है! उच्च आधार प्रभाव भी दो महीने बाद नहीं रहेगा। यानी दिवाली बाद एक बार फिर महंगाई दर वापस छह फीसद से ऊपर जा सकती है।

थोक महंगाई दर में वृद्धि का सीधा अर्थ है कि प्राथमिक वस्तुएं महंगी हुई हैं और विनिर्माण लागत बढ़ी है। इसका असर उपभोक्ताओं को ही भुगतना है। विनिर्मित उत्पादों के महंगे होने का एक बड़ा कारण ईंधन की ऊंची कीमत भी है। एलपीजी, पेट्रोल और डीजल अगस्त में क्रमश: 48.1 फीसद, 61.5 फीसद, और 50.7 फीसद महंगे हो गए। महंगाई के आंकड़ों का ऊपर-नीचे होना मायने रखता है। लेकिन उपभोक्ताओं का अनुभव कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। और अनुभव की बात यह है कि बाजार में बिकने वाली हर चीज, चाहे वस्तु हो या सेवा, उसे खरीदने के लिए उपभोक्ताओं को मशक्कत करनी पड़ रही है। महंगाई के मुकाबले कमाई घटने के कारण कई सारी चीजें आमजन की पहुंच से बाहर हो गई हैं। इसलिए अब सबके मन में सवाल है महंगाई से निजात कब और कैसे मिले?

इसके मोटे तौर पर दो उपाय हैं। पहला बाजार से मुक्ति और दूसरा कमाई में आनुपातिक वृद्धि। पहला उपाय आज के समय में असंभव लगता है, लेकिन दूसरे उपाय की कोशिशें भी नीतिगत खामियों की भेंट चढ़ रही हैं। कमाई बढ़ने के बदले घट रही है। हर महीने नौकरियां जा रही हैं। बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है, खरीद क्षमता घट रही है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के अनुसार, अगस्त में 15 लाख लोगों की नौकरियां चली गर्इं। कमाई की कमजोर परिस्थिति में महंगाई का असर बढ़ रहा है। महामारी ने सवा तीन करोड़ लोगों को मध्य वर्ग से निकाल कर गरीबी में धकेल दिया है।

महामारी के दौर में वैश्विक स्तर पर मध्य वर्ग की जितनी संख्या घटी है, उसमें साठ फीसद योगदान अकेले भारत का है। नेशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड इकॉनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) ने दो से दस लाख रुपए तक वार्षिक आय वालों को मध्य वर्ग में रखा है। यानी मध्यवर्ग के 3.20 करोड़ लोगों की आमदनी दो लाख रुपए से नीचे आ गई है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय एक अध्ययन में तेईस करोड़ लोगों के गरीबी रेखा से नीचे पहुंचने की बात पहले ही बता चुका है। देश की सनतानवे फीसद आबादी की आमदनी घट चुकी है। प्रति व्यक्तिउपभोग 62,056 रुपए से घट कर 2020-21 में 55,783 रुपए हो गया है। निजी उपभोग में गिरावट का रुख पिछले चार सालों से है। हालात इस रुख के आगे भी बने रहने का संकेत दे रहे हैं। ये आंकड़े डरावने हैं।

अब जो लोग सरकारी राहत पैकेज और शेयर बाजार की ऊंचाई की दुहाई देकर महंगाई बेरोजगारी पर पर्दा डालना चाहते हैं, उनके लिए शेयर बाजार की ही यह तस्वीर आईना है। तीस बड़ी कंपनियों के सूचकांक बीएसई सूचकांक और पचास सबसे बड़ी कंपनियों के सूचकांक एनएसई निफ्टी में अप्रैल 2020 से जुलाई 2021 के बीच क्रमश: लगभग 86 फीसद और 91 फीसद का उछाल आया। लेकिन 2020-21 के ही वित्त वर्ष में जीडीपी शून्य से नीचे 7.3 फीसद गोता लगा गई।

यानी शेयर बाजार का जीडीपी से कोई संबंध नहीं है, और शेयर बाजार की ऊंचाई से रोजगार पैदा होने और कमाई बढ़ने की बात बेमानी है। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि आरबीआइ ने रोजगार पैदा करने के उद्देश्य से ऋण के जो प्रबंध किए, उनका वास्तविक फायदा अर्थव्यवस्था के बजाय शेयर बाजार को मिलने लगा। यदि कर्ज का यह पैसा अर्थव्यवस्था में लगा होता तो रोजगार पैदा होता, लोगों की कमाई बढ़ती। कमाई से महंगाई बेअसर होती, बाजार में मांग बढ़ती, और मांग बढ़ने से विकास दर बढ़ती। लेकिन ऐसा न हो सका। अर्थव्यवस्था आंसू बहा रही है और आम आदमी इसकी कीमत पेट्रोल, डीजल पर भारी कर देकर चुका रहा है।

पेट्रोल और डीजल की कीमतों में दैनिक संशोधन की दैनिक मूल्यांकन व्यवस्था जब 16 जून, 2017 को लागू हुई थी, तब सरकार की ओर से कहा गया था कि वह अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में होने वाले हरेक मामूली बदलाव का लाभ आम उपभोक्ताओं को देना चाहती है। लेकिन तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई भारी गिरावट का लाभ उपभोक्ताओं को कभी नहीं मिला, अलबत्ता हर मामूली वृद्धि का भार उपभोक्ताओं को जरूर उठाना पड़ा। सरकार ने अपने ही बनाए नियम तोड़ दिए और उत्पाद शुल्क बढ़ा कर जनता के हिस्से का पूरा लाभ अपनी जेब में रखती रही। इस शुल्क को बाद में वापस लेने की बात थी। लेकिन बेतहाशा महंगाई और बेरोजगारी के बावजूद अभी तक यह नहीं हुआ है। आज पेट्रोल, डीजल सौ रुपए लीटर से ऊपर बिक रहा है। सरसों तेल दो सौ रुपए लीटर हो गया है। रसोई गैस सिलिंडर नौ सौ रुपए के पार पहुंच गया है। सड़क से रसोई तक आम उपभोक्ता महंगाई की लपट में झुलस रहा है। ऊंची महंगाई दर से बेअसर तीन फीसद लोग दर में मामूली सुधार पर ताली बजा रहे हैं।

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From: Jansatta

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