अफगानिस्तान में संकट गहराता जा रहा है। वहां लोग अपनी जिंदगी और मौत के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। लोगों की जिंदगी अपने भरोसे है। खाने के समान से लेकर पीने का पानी तक नहीं मिल पा रहा है। अगर मिल रहा है, तो वह इतना मंहगा कि आम इंसान के लिए उसे खरीद पाना मुश्किल है। स्वास्थ्य सुविधा पूरी तरह से ठप पड़ी हुई है। लोगों में अफरा-तफरी का माहौल है। काबुल हवाईअड्डे पर लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ है। ऐसा लगता है कि हर कोई खतरनाक तालिबान के शिकंजे से बाहर निकलने में लगे हैं। बेकाबू हो रही भीड़ ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रखा है। सभी देश अपने-अपने नागरिकों को स्वदेश ले जाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। लेकिन किसी देश ने उस संकट को टालने और रोकने की कोशिश नहीं की है और न कोई आगे आकर समर्थन करने को कहा है।
इस जद्दोजहद के कारण लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। मां को अपने बच्चे से अलग होना पड़ रहा है, भाई-भाई से बिछड़ रहे हैं, मित्र-मित्र से छूट रहे हैं और इन सब के बीच घात लगाए बैठे निर्मम आतंकी भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बम से हमला कर रहे हैं। काबुल में चारों ओर मौत का तांडव मचा हुआ है। गुरुवार की शाम काबुल हवाईअड्डे पर फिदायीन हमले में कई दर्जन निर्दोष लोगों की मौत हो गई और डेढ़ सौ के करीब लोग घायल हो गए। भागते हुए लोगों पर निर्मम तालिबानियों ने गोलीबारी भी की।
आखिर क्या वजह है कि दुनिया के देश अफगानिस्तान के निर्दोष लोगों को बचाने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं? यह एक मानवीय विफलता है। अगर सभी देशों ने वहां खतरनाक होते तालिबान पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया तो विश्व के लिए बहुत जल्द खतरे की घंटी बज जाएगी। भारत के लिए तो मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। हर हाल में बढ़ती तालिबानी गतिविधि को रोकना होगा, नहीं तो व्यापार तो जाएगा ही, साथ ही आतंकी गतिविधियां भी और अधिक बढ़ जाएंगी।
पाकिस्तान और चीन की चालबाजी को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। अगर इन्हें खुली छूट दे दी गई, तो वे दिन दूर नहीं, जब फिर से मुंबई आतंकी हमले, भारतीय संसद पर हमले और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले जैसे हमले दोहराए जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र में इसे लेकर बातचीत जरूर चल रही है, लेकिन गंभीर होते संकट का हल जल्द-से जल्द निकालना होगा।
’शशांक शेखर, आइएमएस, नोएडा, उप्र
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