Thursday, August 19, 2021

स्त्री का डर

दुनिया के किसी भी समाज के सभ्य होने का पैमाना यह है कि वह स्त्रियों के अधिकारों को लेकर कितना लोकतांत्रिक है। यही वजह है कि आधुनिक कहे जाने वाले सभी देशों में स्त्रियों को समान अधिकार देने की बात की जाती है। लेकिन कई बार जड़ समाजों में धर्म और परंपरा के मुताबिक तय होने वाले नियम-कायदों की सबसे ज्यादा मार स्त्रियों पर पड़ती है। तालिबान की जीत की खबर के साथ ही अफगानिस्तान में एक सबसे बड़ी चिंता यह खड़ी हो गई है कि अब वहां की महिलाओं को लेकर शासन और समाज क्या रुख अपनाएगा। तालिबान की गतिविधियों और शासन का अब तक का इतिहास यही बताता है कि उसके वर्चस्व और राज वाले इलाकों में स्त्रियों को आमतौर पर न्यूनतम मानवीय अधिकारों के लिए भी जद्दोजहद करना पड़ता है। इसलिए एक बार फिर तालिबान का कब्जा होने के साथ-साथ न केवल अफगानिस्तान में, बल्कि दुनिया भर में यह चिंता और बहस का विषय बन गया है कि वहां की महिलाओं को अब शायद बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़े।

यों काबुल पर जीत की खबर के बाद तालिबान की ओर से यह घोषणा हुई कि वह इस बार महिलाओं की शिक्षा-दीक्षा और कामकाज को लेकर उदार रुख अपनाएगा। तालिबान ने देश के लोगों के लिए कुछ करने, उनकी जिंदगी सुधारने के साथ-साथ महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करने और उन्हें सरकार में भी शामिल करने की बात की। लेकिन इस तरह के आश्वासनों का मतलब तभी बनता है जब इस विचार पर आधारित नीतियां बनें और जमीनी स्तर पर अमल में भी आएं। विडंबना यह है कि टीवी एंकरों को बाहर करने जैसी कुछ खबरों से तालिबान के राज में महिलाओं के जीवन से जुड़ी आशंकाएं सच होती दिखाई पड़ रही हैं। एक खबर यह भी आई कि तालिबान ने आम जनजीवन के क्षेत्र में शरीआ के तहत तय नियम-कायदों को लागू करेगा। अगर ऐसा हुआ, तब संभव है कि वहां महिलाओं को न केवल शिक्षा-दीक्षा, कामकाज और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से, बल्कि न्यूनतम मानवीय अधिकारों से भी वंचित होना पड़े। दरअसल, महिलाओं को लेकर तालिबान का अब तक का इतिहास बेहद नकारात्मक रहा है और बहुत मामूली बातों पर भी वह बर्बर सख्त सजाएं देने के लिए बदनाम रहा है।

यह कल्पना भी दहला देती है कि तालिबान के तय कायदों से इतर किसी स्त्री की पुरुष से मित्रता या संबंध को अपराध माना जाए और इसके लिए महिला को सार्वजनिक तौर पर कोड़े से मारा जाए। यह बेहद पिछड़े सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों वाले समाज में ही संभव है। अफसोस की बात यह है कि जिस दौर में मानवाधिकार समूची दुनिया में एक सबसे बड़ा मानक है, तालिबान को इन कसौटियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह बेवजह नहीं है कि अफगानिस्तान के बौद्धिक जगत से जुड़ी कई महिलाओं ने दुनिया के अन्य देशों से संवेदनशील होने और आगे आने की गुजारिश की है। खुद अफगानिस्तान में कुछ जगहों पर महिलाओं ने तालिबान के सामने अधिकारों को लेकर आवाज उठाई है। जाहिर है, तालिबान के इतिहास को देखते हुए वहां की महिलाएं अपने भविष्य को लेकर बेहद डरी हुई हैं। अब यह इस पर निर्भर करेगा कि उदार रुख अपनाने के अपने आश्वासनों को लेकर तालिबान कितना गंभीर रह पाता है और ऐसा नहीं होने की स्थिति में दुनिया के दूसरे प्रभावशाली देश उस पर कितना दबाव बना पाते हैं। इतना तय है कि अगर स्त्रियों को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित किया गया और उन्हें गुलामी जैसी जीवन-स्थितियों में डाला गया तो तालिबान न अफगानिस्तान को एक सभ्य समाज दे पाएगा और न ही अपने लिए कोई सम्मान हासिल कर पाएगा।

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From: Jansatta

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