अब राष्ट्रीय रक्षा अकादमी यानी एनडीए का प्रवेश द्वार भी लड़कियों के लिए खुल गया है। अभी तक सेना के गैर-लड़ाकू विभागों में ही लड़कियों के भर्ती की अनुमति थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे भेदभावपूर्ण नीति बताते हुए आदेश दिया है कि एनडीए में भी उन्हें प्रवेश मिलना चाहिए। इस तरह नवंबर में होने वाली एनडीए की प्रवेश परीक्षा में वे हिस्सा ले सकेंगी। सेना के लिए युवाओं को तैयार करने के मकसद से देश भर में सैनिक स्कूल हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय मिलिट्री अकादमी है। अब तक इनमें लड़कों को ही दाखिला मिलता रहा है। इन संस्थानों से निकले बच्चों को सेना में प्राथमिकता दी जाती है। मगर एनडीए में उन बच्चों को दाखिला मिलता है, जो बारहवीं करने के बाद लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित प्रवेश परीक्षा पास करते हैं। एनडीए में मुख्य रूप से सेना के तीनों विभागों की लड़ाकू शाखा के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। यह प्रशिक्षण काफी कठोर होता है।
आमतौर पर एनडीए से निकले अफसर ही सेना के बड़े और निर्णायक पदों पर पहुंचते हैं। उन पदों तक पहुंचना बहुत सारे युवाओं का सपना होता है। मगर एनडीए में लड़कियों को प्रवेश की अनुमति न होने से स्वाभाविक ही उनमें असंतोष देखा जा रहा था।दरअसल, माना जाता है कि महिलाएं कोमल स्वभाव की होती हैं, वे जल्दी भावनाओं में बह जाती हैं, इसलिए उन्हें युद्ध जैसे कामों में भेजना ठीक नहीं होगा। देश की सीमाओं पर अक्सर तनावपूर्ण स्थिति बनी रहती है, जिसमें कई बार कठोर फैसले भी करने पड़ते हैं, वहां भावनात्मक निर्णय प्रतिकूल भी साबित हो सकते हैं।
इसके अलावा तर्क दिया जाता रहा है कि जब दो देशों के बीच युद्ध हो रहा हो तो सैनिकों के दुश्मन देश की सेना के हाथों में पड़ जाने का खतरा भी रहता है। ऐसे में अगर कोई महिला सैनिक या अधिकारी उनकी गिरफ्त में आ जाएगी, तो उसके साथ दुश्मन सेना क्या सलूक करेगी, कहा नहीं जा सकता। वह देश के लिए शर्मिंदगी का विषय होगा। फिर लड़ाकू शाखाओं में जिस तरह का कठोर प्रशिक्षण दिया जाता है, उससे लड़कियों के शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है, जिससे उनकी प्रजनन शक्ति भी प्रभावित हो सकती है। जब लड़कियों को एनडीए में प्रवेश की अनुमति देने संबंधी याचिका पर बहस चल रही थी, तब सेना के वकील ने भी यही दलील दी थी। मगर अब बदलती स्थितियों में ऐसी दलीलों का बहुत मतलब नहीं रह गया है।
पिछले कुछ सालों में सेना के कई जोखिम भरे कामों में भी महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा चुकी है। पहले युद्धक विमान उड़ाने के लिए महिलाओं को नहीं चुना जाता था, मगर अब इस काम के लिए उन्हें भी चुना जाने लगा है। युद्धक विमान उड़ाने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से ज्यादा चुस्त चालकों की जरूरत पड़ती है। जब वे ऐसे कठिन काम अच्छी तरह कर पा रही हैं, तो दूसरी युद्धक शाखाओं में उन्हें भेजने में भला क्यों हिचक होनी चाहिए। फिर, युद्धक शाखा में काम करने का यह अर्थ कतई नहीं होता कि उसके हर सैनिक को सीधी लड़ाई पर भेजा या सीमा पर उसकी तैनाती की जाए। आजकल युद्ध के तरीके काफी बदल गए हैं। अब तकनीकी रणनीति के जरिए युद्ध अधिक लड़े जाते हैं। उनमें वायुसेना की भूमिका अधिक हो गई है। जिस तरह आज अंतरिक्ष से लेकर तमाम दूसरे क्षेत्रों में लड़कियां अपने कौशल का लोहा मनवा रही हैं, युद्ध की रणनीति में भी निस्संदेह वे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
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From: Jansatta
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