Tuesday, August 31, 2021

अंतर्विरोधों के बीच सहयोग

मीना बुद्धिराजा

मनुष्य हमेशा से एक बड़े समूह की इकाई है, जिसके बिना उसकी सामाजिक पहचान नहीं है। लेकिन अपनी वास्तविक क्षमताओं, संभावनाओं और मौलिकता की शक्ति को भीड़ से अलग रह कर ही वह पा सकता है जो उसके स्वतंत्र अस्तित्व को सार्थकता देती है। अपने आसपास के परिवेश से निर्लिप्त न रहने के कारण उसे बार-बार उन चीजों पर गहनता से सोचना चाहिए। उन मूलभूत प्रश्नों से संघर्ष करना चाहिए जो इस समय में उसके जीवित रहने की बुनियादी वजह हैं। इसके लिए संवेदनशील दृष्टि के साथ विचारपूर्ण आत्मालोचन और आत्मविश्लेषण की जरूरत होती है। तभी वह एक सजग व्यक्तित्व के रूप में समाज को कुछ दे पाएगा। नदी और द्वीप की तरह व्यक्ति और समाज का पारस्परिक संबध और द्वंद्व भी अनिवार्य है, जिस स्थिति में दोनों की अपनी महत्ता और सार्थकता है।

किसी व्यक्ति के जीवन का आकलन उसके समग्र कार्यों के आधार पर किया जा सकता है, न कि छोटे-छोटे स्वार्थों और क्षुद्रताओं के आधार पर। उसे अपना लक्ष्य और दृष्टि उदात्त और व्यापक आधार पर केंद्रित करनी होती है जो सबके हित को भी देख सके, क्योंकि आखिरकार उस व्यक्ति विशेष की चित्तवृत्ति के और उत्कट आकांक्षा के साथ प्रकृति भी न्याय करती है। जैसे बहते हुए जल की धारा को तमाम अवरोधों और चुनौतियों के बाद भी निरंतर आगे निकलने के लिए कोई रास्ता मिल ही जाता है जो उसे अथाह समुद्र तक पहुंचाता है।

इसलिए एक सार्थक विचारशील व्यक्ति का उद्देश्य भी सीमित या एकांगी नहीं, बड़े और व्यापक आधार पर आगे बढ़ता है, जिसमें उसे सभी संकीर्णताओं से मुक्त होकर अपनी दृष्टि को भी उदार और प्रवाहमान बनाना पड़ता है। तभी वह खुद को अपने परिवेश और नई संभावनाओं को पहचान सकता है। तब जीवन का अनंत विस्तार सामने दिखाई देता है और इस दिशा में तटस्थ और राग-द्वेष रहित सोच से मुक्त होकर वह कोई प्रयास नहीं करता, बल्कि स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ता है। अपने अस्तित्व को पाने के इस संघर्ष की यात्रा में कई बार उसे अपने घेरे से बाहर आना पड़ता है और अपने स्वार्थों से दूरी बना कर ही वापस नए अर्थ में अपने पास आना पड़ता है, जिसमें उसकी सामाजिक उपयोगिता का अर्थ भी निहित है।

द्वंद्वात्मकता और वैचारिक संघर्ष मानवीय चेतना का आधार होते हैं। कोई भी व्यवस्था, विचारधारा, मूल्य, आदर्श और सिद्धांत अंतिम नहीं होते। समाज, राजनीति के संबंधों और बाह्य-आतंरिक परिवेश में बदलाव के साथ उसमें अंतर्विरोध, टकराव और परिवर्तनों से ही नए विचारों और विकल्पों का आगमन होता है। व्यक्ति और व्यवस्था का यह द्वंद्व प्रत्येक युग की प्रवृत्ति होती है, जिसमें परंपरा और आधुनिक बोध में परस्पर संघर्ष से ही नई सोच और दृष्टि का प्रसार संभव होता है।

यह मूल्य अधिक प्रासंगिक बन कर मनुष्य और समाज को ज्यादा बड़े फलक पर निर्मित करते हैं जो व्यापक सामाजिक चेतना को प्रभावित कर सकता है। उसका लक्ष्य कुछ अलग प्राप्त करने की बेचैनी और अनुभव होते हैं जो दुनिया के साधारण नियमों के आधार पर चाहे महत्त्वहीन हों, लेकिन विशिष्ट, मौलिक और विरल सोच और कार्य ही कालजयी उपलब्धि बन कर कितने नए रास्ते मानवता को दिखाते हैं। आत्मकेंद्रित परिवेश में निर्मम, हिंसक और संवेदनहीन समय के बीच रहने के लिए सब विवश हैं। तेजी से बदलते जटिल यथार्थ में किसी दूसरे के लिए सोचने के लिए समय नहीं और बाजार व वस्तुएं संवेदनाओं को अपदस्थ करके अपनी जगह बनाने की प्रतिस्पर्धा में हैं। इन अंतर्विरोधों को सूक्ष्म दृष्टि से देख कर मानवीय नियमों के विरुद्ध उसे उपभोक्ता समुदाय होने से बचाने और सामाजिक मूल्यों को स्थापित करने की चुनौती भी सामने है।

व्यक्ति और समाज के संबंधों में ये सभी बदलाव भी अपनी भूमिका निभाते हैं। इसलिए इस समय और युगबोध को किसी एक प्रवृत्ति और सीमित कोण के आधार पर नहीं ग्रहण किया जा सकता। इस गतिशील, अस्थिर यथार्थ में ही किसी सार्थक और स्थायी मूल्य के विकल्प की खोज भी व्यक्ति और समाज के परस्पर संबंधों पर निर्भर करती है, क्योंकि दोनों का अस्तित्व एक दूसरे से जुड़ा है। व्यक्ति की मुक्ति का संघर्ष या उसकी सफलता अकेले नहीं होती। उसमें समाज की मानवीय मुक्ति का सूत्र भी अभिन्न रूप से निहित है।

जीवन के सभी अनुभव अच्छे-बुरे और अंतर्विरोध आपस में गुंथे हुए और अनिवार्य उपस्थिति के साथ शामिल होते हैं और व्यक्ति के विशाल जीवन का हिस्सा बन कर व्यक्त होते हैं, जिसमें सब कुछ घटित होता है, क्योंकि जीवन और यथार्थ ही इतना बहुस्तरीय और संश्लिष्ट है, जिससे समाज भी प्रभावित होता है। सच यही है कि कोई भी संकट, दुख, त्रासदी का अर्थ मनुष्यता की पराजय नहीं है। यह सामूहिक चेतना के अस्तित्व का आधार है। भावनाओं से विचारों तक पहुंचने की यह सच्चाई ही अपने समय की चिंताओं और प्रश्नों को नए संदर्भों में मूल्यांकित कर सकती है, जिसमें व्यक्तिगत लाभ से उपर एक सार्वभौमिक मानवीय दृष्टि और समाज के लिए दायित्वपूर्ण, स्थायी, करुणा समन्वित, विवेकपूर्ण और बहुआयामी विचारधारा का समावेश होता है।

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From: Jansatta

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