Thursday, August 26, 2021

सतह पर कलह

देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस जिस दौर से गुजर रही है, उसमें यह आशंका पैदा हो गई है कि आने वाले दिनों में वह अपने सामने खड़ी चुनौतियों से कैसे निपटेगी! दरअसल, राष्ट्रीय स्तर पर महामारी की वजह से पिछले करीब डेढ़ साल से एक तरह का ठहराव कायम है, जिसमें विपक्षी पार्टियां चाह कर बहुत कुछ नहीं कर पा रही हैं। अलग-अलग मुद्दों पर सरकार के विरोध और आंदोलन में वह तीव्रता नहीं दिखती है, जिससे कोई पार्टी अपने कार्यकर्ताओं के बीच उपस्थिति बनाए रखती है। जबकि मुख्यधारा की राजनीति में अपनी मौजूदगी के लिए मुद्दे चुनना और उस पर सक्रियता बनाए रखना किसी भी पार्टी की जरूरत होती है।

इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दों पर जनमत निर्माण के लिए जितने जतन करती दिखती है, उससे ज्यादा वह आंतरिक कलह से परेशान है। हालांकि यह ठीक वही समय है, जब पार्टी को अपनी गतिविधियों के जरिए जनता के सामने यह संदेश देना चाहिए था कि सरकार की रीति-नीतियों के बरक्स वह मजबूत विपक्ष की भूमिका में मौजूद है। लेकिन पिछले कुछ महीने से लगातार ऐसा चल रहा है, जिससे निपटना कांग्रेस के लिए मुश्किल साबित हो रहा है।

गौरतलब है कि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और राज्य में पार्टी के नए अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के बीच काफी खींचतान चल रही है। दोनों खेमे केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद कुछ देर के लिए शांत पड़ते हैं, लेकिन फिर एक दूसरे पर हावी होने की कोशिश में टकराव की हद तक चले जाते हैं। हालत यह है कि हर कुछ दिन बाद पार्टी के विधायकों के असंतोष या फिर बगावत की खबर आती है और उसे शांत करने के लिए केंद्रीय नेतृत्व को अतिरिक्त ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।

पंजाब में जब नवजोत सिंह सिद्धू को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष पद सौंप दिया गया, उसके बाद अमरिंदर सिंह के रुख में आई नरमी से यह लगा कि अब कलह का दौर शायद खत्म होगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यों पार्टी की ओर से यह घोषणा की कई है कि पंजाब में भावी विधानसभा चुनाव कांग्रेस अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में ही लड़ेगी। सिद्धू और उनके खेमे में इस पर सहमति बनी तब शायद कांग्रेस को थोड़ी राहत मिलेगी, लेकिन महत्त्वाकांक्षाओं का टकराव उभरा तो समूची पार्टी को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

दरअसल, कांग्रेस अभी पंजाब में आंतरिक कलह से जूझने की कोशिश में है तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में भी वह पहले के एक तय शर्त के व्यूह में फंसी दिखती है। छत्तीसगढ़ में सरकार बनने के समय मुख्यमंत्री पद के लिए ढाई-ढाई साल का फार्मूला तय हुआ था। उसी संदर्भ में पिछले कुछ महीने से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को टीएस सिंहदेव के समर्थकों की ओर से वह शर्त याद दिलाई जा जा रही है। ऐसा नहीं है कि पार्टी में शीर्ष स्तर पर पंजाब या छत्तीसगढ़ की इन स्थितियों के नफा-नुकसान का आकलन नहीं किया जा रहा होगा, लेकिन राजनीति में सही समय पर जरूरी कदम उठाने पर ही नतीजा निर्भर होता है।

ध्यान रखने की जरूरत है कि आपसी मतभेदों और टकराव के चलते ही कांग्रेस मध्य प्रदेश की हाथ आई सत्ता गंवा चुकी है। राजस्थान में पार्टी के आंतरिक झगड़े जगजाहिर रहे हैं। पार्टी के भीतर महत्त्वाकांक्षाओं के टकराव की वजह से आज दशा यह है कि कांग्रेस राष्ट्रीय फलक पर खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में पेश नहीं कर पा रही है। जबकि मौजूदा वक्त में एक सशक्त विपक्षी पार्टी या गठबंधन की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है, जो आम जनता के अधिकारों को आवाज दे सके और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर न होने दे।

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From: Jansatta

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